रवि सिंह जी के लिखल आपन पहचान

सारिका बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के रहली। पढ़ाई लिखाई के संगे ही खेल कूद में भी अव्वल रहली।उनकर पढ़ाई लिखाई के रुचि देखी के माई-बाप तंगी रहला के बावजूद उनका पढ़ाई लिखाई से कवनो कोताही ना बरते। सारिका भी माई बाबूजी के मेहनत के पाई के मरम बुझस आ खूब मन लगा के पढस।सुरु से ही बाबूजी के इच्छा रहे कि “हमार बेटी पढ़ लिख के आपन पहचान अपने बनाओ लोग खाली ओकरा हमार बेटी, केहू के मेहर आ केहू के पतोह एह से ना
जानो”।बेटी के पढ़ाई के प्रति तल्लीनता देख के उनकर मन खुश हो जाओ दिनभर के थकान बेटी के मुसकान देख के ओरा जाओ।

रवि सिंह जी
रवि सिंह जी

दिन बीतत गईल आ सारिका के बी.ए हो गइल रहे आ अब उनकर वकालत खातिर एडमिशन भी हो गईल रहे।आपना मेहनत आ लगन से उ वकालत के पढ़ाई पूरा क लिहली आ
शहर के एगो लीगल फर्म में काम भी करे लगली। उनका काम से सब केहू बहुते खुश रहे। बाबूजी के भी गर्व से छाती फूल जॉव आपन वकील बेटी के देख के आ फुलबो काहे ना करित उनकर
छोट चुकि सारिका अब वकील नू हो गइल रहली।

समय बीतत गईल अब सारिका ला बियाह योग्य बर के तलाश होखे लागल रहे। सारिका के पढ़ाई के नाव चर्चा त गांव भर पसरल रहे।पंडिजी जल्दिये एगो निमन घर-बर के रिश्ता लेके
अइनी।रिश्ता बड़ घर से आईल रहे ई सुन के सब केहू खुश हो गइल आखिर बेटी के माई-बाप खोजबो का करेला इहे नु की ओकरा बेटी के कबहुँ कवनो चीज के कमी ना होखो। सारिका के रिश्ता जहवाँ से आईल रहे उ गावँ के खूब नामचीन हस्ती ठाकुर बलवंत सिंह के घर रहे। ठाकुरजी आपन बेटा खातिर सारिका के हाथ मंगले रहनी।

बातचीत आग़ा बढ़ल आ बियाह हो गईल।सारिका बियाह खातिर महीना दिन के छुट्टी ले  लिहले रहली। ससुराल में हर सुख सुविधा रहे जेकर चाह लोग राखेला। सारिका भी ससुराल के प्यार-दुलार से बहुत खुश रहली। नया परिवार में महीना दिन कब बीत गईल पते ना चलल। साँझ खानी सारिका ससुरजी से कहली बाबूजी हमार आफिस के छुट्टी अब खत्म हो गईल आ बिहान से हम आफिस जाए चाहतानी। बाबूजी हंसते-हंसते कह दिहनी “तहरा कवनो चीज के कमी होता त बताव आ जाइ, ई आफिस- वाफिस गइला के कवनो जरूरत नईखे। अब इहे बाकी रह गईल बा कि पतोह के कमाई खाईं। हमनी जमींदार हईंसन हमनी के घर के बेटी-पतोह आफिस ना जाले काम करे”।

ससुरजी के ई बात सारिका पर बिजली बन के गिरल रहे।ई सुनते उनका आँखि से लोर रोकला से ना रोकाबाकिर उ क भी का सकत रहली रोवाला के अलांवा उ रोवते आपना घर मेआ गईली। रोवत देख पतिदेव पूछे लगनी का भईल??? सारिका सब बता दिहली बाकिर पति के सोंच भी उहे रहे कि मेहरारू जात घर के चारदीवारी में ही ठीक बा,बनाव खा आ परिवार के ध्यान राख।

रात भर सारिका सुत ना पवली इहे सब सोंचत रहली अब कईसे उ आपन पहचान बना पइहें?? बाबूजी के सपना कईसे पूरा होई?? उनका सामने बार बार बाबूजी के कहल उ बात ईयाद आवे “हमार बेटी के पहचान खाली केहू के बेटी, केहू के मेहर आ केहू के पतोह एतने ना रही लोग ओकरा के ओकरा काम से जानी”. आज सारिका के सामने दूर-दूर ले अंधार ही अंधार रहे कहीं कवनो उम्मीद के किरण ना रहे।

सारिका दुनिया के रित से भी परिचित रहली अगर उ नइहर चल भी जईहे त लोग तरह-तरह के बात कही आ समाज मे रहल मुश्किल हो जाई उनका बाबूजी के। भोर होत हीं हवेली में शोर हो गईल छोटकी दुल्हिन कही चल गईली।पूरा हवेली खोजा गईल बाकी उनकर कवनो ठिकाना ना रहे जाये के पहिले उ एगो चिट्टी लिख के सिरहानी राख गईल रहली।सारिका के पति उ चिट्ठी ले जा के बाबूजी के हाथ मे दे दिहलें बाबूजी आपन चश्मा लगाके पढ़े लगनी चिट्ठी में लिखल रहे-

आदरणीय बाबूजी (ससुरजी),
हम ई घर आ परिवार हमेशा- हमेशा खातिर छोड़ के जातानि आ एकरा अलावा हमरा लगे कवनो रास्ता नईखे। महीना दिन में जवन प्यार-दुलार मिलल हम कहियो ना भुलाएम बाकिर मेहरारू जात खाली चूल्हा लिपे आ बर्तन धोवे खातिर बनल बा ई हमरा मंजूर नईखे। हम एगो नारी के संगे इंसान भी हईं आ नारी के जरूरत खाली साड़ी, कपड़ा, सोना, चांदी, पुआ-पकवान आ साज-श्रृंगार एतने पर खत्म ना होखेला।हम ऐ जिंदगी में कुछ क के नाम बनावल चाहतानी आ

“जिंदगी खाली केहू के बेटी,केहू के मेहर आ केहू के पतोह “एतने पहचान के साथ नईखी जी सकत। हमार पहचान हमरा काम से होई एहि लागि माई-बाबूजी वकील बनावल लोग आ बड़ी मेहनत से हमरा के पढावल लोग।हमरा के खोजें के कोशिश मत करेम बिना बतवले जाए खातिर सब केहू से कर जोड़ के माफी।

राउर पतोह
एडवोकेट सारिका”
ई पढ़ते ठाकुरजी के ठकुआ मार दिहलस आ उ ओहिजा थहिया के बइठ गईनी।

रवि सिंह
सिवान-बिहार

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