रवि सिंह जी के लिखल भोजपुरी कहानी छत के घर

रवि सिंह जी
रवि सिंह जी

केदार बाबा आ बलिराम बाबा अपना समय के नामी भूमिहार (भूंजार) रहे लोग। बियाह के बाद बड़ा शान से खूब निमन खापरापोश वाला घर बानावल लोग । वो जमाना में सवा लाख ईंटा लगाके, जोड़ाई त गिलवे माटी के रहे तबहुँ देखनिहार लागे वो घर के। दूर-दूर से लोग देखे आवे आ गाँव मे चार-पाँच गो निमन घर मे उहो शामिल हो गईल रहे। बाकी समय के रफ्तार बढ़ल आ नयका जमाना के घर बने लागल । अब उ दुनु बाबा लोग के उमिर ढले लागल रहे । बाकि उनकर पटीदार रिटायर मास्टर साहेब के छतदार घर देखके अब ईआ के मन मे एगो आस समा गईल की हमरो एगो छत के घर रहित।

केदार बाबा के पाँच गो बेटा तीन गो बेटी बाकी एकहूँ बेटा के दईबा ना बकसलें आ सबके बोला लिहलें, बलिराम बाबा के चार बेटा बाकी केहू वो लायक ना भईल की छत के घर बना के आस पूरा क दिहित। देखते-देखते दुनु बाबा लोग चल बसल लोग छोटकी ईआ भी चल बसली बाकी बड़की ईआ के अबहुओं छत के घर के इन्तेजार रहे। आपन बेटा लोग के गईला के बाद बड़की ईआ एहि चारो जाना के बेटा मान के संतोष क लिहली। जब-जब ईआ लोग के छतदार घर देखस उनका मन मे एगो आस जाग जाए हमरो छतदार घर रहित त धान सुखइतीं आ छठ के अछूता चूल्हा अपने छत पर बनइतीं। देवता गोहरावत कहती, “हे महाबीरजी, पंच बराबर करी”.

रवि सिंह जी के लिखल भोजपुरी कथा बेटी के भाग

दिन बीतत गइल अब त बड़की पतोह भी चल बसली बाकी छत के सपना ना पूजल। दुसरकी पतोह बोल मारस “छत-छत करते कलाऊती देई चल गइली अब इहे बाकी बारी” बाकी बड़की ईआ के आपना महाबीरजी पर भरोसा रहे जय महाबीरजी – जय महाबीरजी कहि के रह जास।दूर- दूर ले कवनो आस ना रहे छतदार घर के बाकी महाबीरजी पर भरोसा रहे। बड़का बेटा के बेटा (परपोता) जब कबो शहर से घरे आवस त दादी ईआ के ई सब बात सुनके दादी के ईच्छा पूरा करे के चाहस बाकी एतना कम उमिर में संभव कइसे होइत आ उनकर साथ देवे खातिर केहू ना लउके आपन बापो ना। सब केहू अपने मे तबाह रहे।

घर के इच्छा त सबका रहे बाकीर सब केहू मुहे से ताजमहल बनावेवाला रहे, पईसा के नामे से छटक जॉव लोग। लेकिन अब ई सब परपोता के बरदास्त ना होखे ओकर मन इहे कहे आउर सब काम त बादो में हो जाई बाकिर दादी-ईआ फेरु ना अइहे,इंसान के जन्म चौरासी लाख योनि में भटकला के बाद मिलेला। इहे सोंचके उ आपन सब कुछ दाव पर लगा देहलें दिन-रात मेहनत क के घर के नीवं दिवा दिहलें। लोग के भरोसा ना होखे की ई लईका अकेले कइसे घर बना लिही।

दादी-ईआ जब देखली की ईंटा गिरे लागल,बालू गिरे लागल,छड़ आ गइल,मुशहर लोग के ठीका दिया गईल उनका त खुशी के ठिकाना ना रहे।महाबीरजी के गोहरावत आँगना से दुआरा करस ,जेकरा घरे जास कहस , “हमार परपोता छत के घर बनवावता,अब हमरो धान सुखी छत पर, हमहुँ छठ के अछूता चूल्हा पारेम छत पर। बाकिर मझिलो पतोह फेरु बोल मरली” बहुते आदमी के घर के नेवं दिआइल आ भस गईल,बन जॉव तब नुजानि” ।

बाकिर दादी-ईआ के आशिर्वाद आ उनकर महाबीरजी पर भरोसा के आगा सब कठिनाई छोट परे लागल।परपोता के एगो तनि आस देहले ओकर छोटका चाचा। बिना केहू के साथ दिहले अब त लिंटर कसा गईल, छतो पिटा गईल आ धूमधाम से घरभोज भईल,अष्टजाम भईल।दादी-ईआ के खुशी के ठिकाना ना रहे । अब त उमिर बेसी भईला के चलते देह कमजोर हो गईल रहे बाकिर छत के सापना पूरा हो गईल रहे । कुछु दिन बादे दादी-ईआ चल बसली मानों छत के घरवे देखेला भगवान से लड़ के जिअत रहली ह।

रवि सिंह
सिसइं-सिवान

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