विवेक सिंह जी के लिखल भोजपुरी कहानी रत्नसागर

विवेक सिंह जी
विवेक सिंह जी

अइसन सायद केहु होइ जे अपना गाँव के याद ना करत होइ। चाहे उ देश मे हो या बिदेश में, हर इंसान के आपन गाँव अउर गाँव से जुड़ल हर उ बात पसन्द होला जवन ओकरा बचपन से जुड़ल हो या उ वो काम में भागीदार हो।

गाँव त एके होला बाकिर गाँव के विभाजन टोला के नाम से हो जाला।की ई, पूरब टोला के हवे त फलांनवा पक्षिम टोला के चिलनवा उत्तर टोला, दख्खिन टोला के। लेकिन गाँव मे होखे वाला कवनो समाजी,धार्मिक या शिक्षित काम हर कोई के अपना साथ खड़ा कर देवे ला। अउर गाँव एक होके टोला,टोली भुला जाला।

“गाँव के समाज द्वारा कइल कवनो काम सबसे गहरा असर केहु पे छोड़े ला। त उ कवनो लईका या लईकी के बचपन पे पड़ेला”।

हर कोई एगो समाज मे पलत बा। उ अपना समाज के का देत बा अउर उ समाज से का लेत बा ई ओकरे पर निर्धारित बा। काहे की समाज आपसे ही बनत अउर बिगड़त बा, भले केहु रहे या ना रहे समाज हमेसा रही। काहे की समाज के कवनो रूप नइखे, ओकर आकर, रूप रेखा एगो समूह ही दे सकत बा।

लोक आस्था के महापर्व : छठ पूजा

हम ना त अपना समाज ना अपना गाँव के बड़ाई करत बानी। हम अपना जिंदगी में बितल एगो सचाई के उगिलत बानी, जवन हमरा साथे साथे चलत गईल अउर बच्चा से जवान भइल
प्रारम्भिक शिक्षा हम अपने गांव के मंटेसरी स्कूल में पइनी। शुरू से हम पढ़ाई के नाम से कोसो दूर भागत रही अउर पढ़ाई हमरा से।

बचपन मे बहुत संघतिया रहले लेकिन एगो अइसन संघतिया रहे, जेकर रिश्ता में हम चाचा लागेनी।ओकरा से उमिर अउर देह में बड़े रहनी लेकिन पढ़ाई में छोट। उ हमरा से एक क्लास ऊपर रहे अउर पढ़े में तेज, जब ओकर माई भिसहरा चार बजे ओकरा के उठा के पढावस त हमनी के कुफुत हो जाये । काहे की हमनी के माई पढ़े खातिर बोले लागे । हमनी सब में हम अउर हमार बड़ भाई, इहो ओकरे साथ यानी कि हमरा से एक क्लास ऊपर उहे मान्टेसरी स्कूल में पढ़ी जा।

इहे नवम्बर के महीना रहे ठंडी अब अगरात रहे। सब कोई आपन देह पर सुबह,साम ऊनी शाल राखे लागल।

हमनी सब नायका चाउर के मार-भात खा के स्कूल चल देनी जा। प्राथना के घण्टी ठीक दश बजे लाग गईल। ओकरा बाद पहिलका घण्टी बाजल हमनी आपन अटेंडेंस के इंतेजार करत रही जा, की कवनो समिति के पांच आदमी आ गइले। हाथ मे कवनो रसीद के पर्चा रहे। प्रधानाचार्य जी (ललन सर जी) स्कूल के प्रणागन में सब बिद्यार्थी के बोला के बइठा देंनी। सब लइका, लईकी के सामने प्रस्ताव रखाइल।।

“हमनी सब नवचेतना सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता करावत बानी जा आप सब छात्र,छात्रा ई प्रतियोगिता में भाग ले सकत बानी”। ई प्रतियोगिता में पांच क्रमांक त प्रतिभागी चुनल जईहे। पहिले लिखित पेपर होइ जवना में *GK* से सवाल पुछाई। ऐमे उतरीं भइला के दु दिन बाद मौखिक परिकक्षा होइ जवना में पाचो टॉपर से पाच राउंड पांच सब्जेक्ट से सवाल पूछाई।

ओकरा बाद सबके नम्बर मिला के देखल जाई। तब टॉपर के चयनित होइ। पाचो टॉपर के उनका योग्यता अनुसार प्राइज, सर्टीफिकेट अउर मेटल से नवाजल जाई। ऐमे नामकरण करावे ला ई रसीद कटाई जेकर शुल्क पांच रुपिया बा। इहे कह के सब कोई हमनी सब के जबाब के इंतेजार करे लागल।

हमरा मन मे डर समागई की कही प्रधानाचार्य जी हमार नाम मत लेली। लेकिन उहा के स्कूल के नाम थोड़ी खराब करे के रहे। उ स्कूल के सब टॉपर लोग के नाम बतावे लगनी। पहिला नाम शशिरंजन दुबे के आई फिर किसन सिंह (प्रेमजीत सिंह), जावेद अंसारी, दिपक सिंह, चंदन सिंह, ऐहि तरी कुछ लड़की सब के नाम बोलल गईल सब के नाम से पर्ची कट गईल खाली हमरे नीयन तेज पढ़ाकू लोग के नाम से पर्चा ना कटल रहे।

डर खाली एगो हमरे ना लागल रे एगो अउर रहे जे अंदर ही अंदर डर से भयभीत हो गइल रहे। अउर मने मने प्रधानाचार्य जी पे कुपित रहे, कि बिना मतलब के हमार नाम दे देनी ह। उ अउर केहु ना रहे उ “किसन” ही रहले। काहे की किसन त पढ़े में ठीक रहे। लेकिन अभी मन अउर शरीर से बच्चा रहे। भले उ पढ़ाई के तेजस्व से उच्च क्लास में आ गईल रहे। लेकिन अभी अंदर के डर ना मिटल रहे।

गोधन : एगो लोक परब

शाम के स्कूल से छुटला पर हम घरे बस्ता रख के किसन के पास खेले खातिर गइनी। किसन साथ में खेलत जरूर रहे लेकिन मन मे बेचैनी के ज्वालामुखी फूटत रहे। उ आज खेले से मना कर देलस फिर दिपक भी आ गईल। उ दिपक से पूछलस की ई प्रतियोगिता खातिर केकरा से पुछल जाव अउर कवन किताब पढ़ल जाव की अच्छा नम्बर आई। दिपक ओकरा के सीधे जबाब में बोल देहलस की शशिरंजन से पुछाव। हमनी तीनों जन शशिरंजन के पास जाके ई बात पूछनी जा त उनकर उतर ओतना कवनो मन के शांत कर जोग ना रहे उ सीधे बोल देले की रत्नसागर के किताब पढ़ल जाई त सब कुछ हो जाई। शशिरंजन तेज छात्र रहले, अउर उनकर घर से पूरा स्पोट रहे। लेकिन किसन के साथ में लाचारी के हाथ रहे।

पहिले के पढ़ाई में कम्पटीशन हर तरह से होत रहल। अब खाली पईसा के खेल बा पहिले केहु केहु के किताब से पढ़ लेत रहे।अब किताब मांगे में लाज लागत बा।

हमनी सब शशिरंजन के पास से अपना अड्डा पर आ गइनी जा। बचपन मे बतकही के अड्डा कवनो गली, मोड़ या केहु के ओसारा के सीडी होत रहे। दिपक, किसन से कहलस “किसन तू अपना टियूसन के सर जी से पूछ ल काहे की उहा के अच्छा से बता सकत बानी।”

स्कूल में भी किसन ललन सर से पुछले रहे उहो के रत्नसागर किताब के ही नाम बतवले रही। किसन के जहन में बस ऐके बात घुमत रहे रत्नसागर । ई शब्द आपन घर बना लेलस उनका मन मे।
जब हमनी सबके टीयूसन पढावे शाम के सात बजे नागा सर (कृष्णकांत सिंह) अइनी त किसन सबसे पहिले अपने बात पूछ देहलस। सर जी सब कुछ अच्छा से समझा देनी।

सब सवाल GK से आई ऐसे तू रत्नसागर के किताब लेल$। अउर कुछ करेंट नियुज में पुछल जा सकत बा,ऐसे नियुज पेपर पढ़त रह$। फिर हमनी के पढाई शुरू भइल अउर हम पकड़ा गइनी हमरा बट्टा पर के जोड़ ना आवे नागा सर जी हम के केतना दिन से सिखावत रही अउर हम सीखे के चाह में सब भुला जाई। हार पाछ के नागा सर जी हमरा के पढावल छोड़ देनी। अउर हमरा के भइ किन के चरावे के राये देंनी। ई हमरा साथ होखे के रहे काहे की हम बहुत तेज बिद्यार्थी रहनी।

सब कोई से बार बार रत्नसागर के नाम सुन के किसन के अब बर्दास्त ना भइल,उ अपना माई से पईसा मांगे चल गईल।
“माई हमरा के सौ रुपिया दे हमरा रत्नसागर के किताब किने के बा।”

माई रोटी बनावत रहली रोटी के तावा पर पलट के बोलली- “ई आज रत्नसागर के किताब का करब$।”
किसन आपन स्कूल से लेके टीयूसन तक के बात अपना माई से बता देले। माई त सब बात समझत रहली लेकिन चाह के भी कुछ ना कर सकली। उनका पास ई सवाल के जबाब सायद खामोसी में रहे। उ चुप होके आपन रोटी बनावे लगली।

परिस्तिथि हर कोई के एक जइसन ना रहे ला। कुछ अइसन लाचारी होला की आदमी अंदर अंदर सुलगेला अउर उ धुवा आखि से वाफ बनके समय के पहलू में धूमिल हो जाला। अइसने कुछ लचारी रहे ओह समय किसन के घर मे की अस्सी रुपिया के एगो किताब ना किन पवली उनकर माई।

धीरे धीरे लिखित परिकक्षा के दिन आइल सब कोई हर्षो उल्लास में परिकक्षा देवे जाता। कोई भगवान के पूजा कइले बा त कोई कवनो देवी के भारा भखले बा। बाकिर आज किसन बहुत डरल अउर उदास बा। ना चाहते हुवे भी उ लिखित परिकक्षा देवे गईल सब दोस्त ओजा एक साथ मिलले। लेकिन जब सबके बईठावल गईल अउर पेपर बटाइल त सब एकरा के छोड़ के तेज विद्यार्थी के पास जाके चिपक गइले।

परिकक्षा के डर अइसन ह की हर कमज़ोर विद्यार्थी इहे चाहेला की हम सबसे तेज अभियार्थी के पास बइठ जाई। ताकि हम पास हो जाएम। किसन डरत डरत सवाल के हल करत गईल अउर टाइम पर पेपर जमा कर के घरे आ गईल। सब दोस्त फिर एक जंगल मिलले त हर कोई एक दूसरा के पुछे की ई सवाल के जबाब का होइ उ सवाल के जबाब का होइ लेकिन किसन खामोस सब सुनत रहे, अउर ओकर डर ओकरा के अउर डरावत रहे।

अगर किसन के हिम्मत केहु बढ़ावे वाला रहे त उ खाली एगो उनकर माई रहली अउर उनका साथ पढ़े वाला हमार भइया चंदन सिंह। चंदन सिंह हमेसा कहस की अरे किसन तू डर मत तोर एगो स्थान रखल बा। बाकिर किसन के ई बात कहा सोहाये काहे की उ अपना के तउल चुकल रहे।

छठ के घाट से लौटानी के बाद सब कोई छठी मइया के गोर लागल। प्रसादी खाके आपन आपन लिखित परिणाम के सुने खातिर चल देलस सब।
लेकिन किसन अभी डर से डरल बा, अउर ओजा नईखे जात। हम त उ प्रतियोगिता में भाग ना लेले रही। लेकिन हम हर उ प्रतियोगिता जरुर देखे जानी जवना में कुछ मिले,जवना से अच्छा सीखल जाव कइल जाव हम किसन से बोलनी।

“”काहो किसन चलब ना का अरे आज मौखिख बा अउर तू एजा बार$।” चल यार तोहर नम्बर जरूर लागि। काहे की हम तहरे खातरी जात बानी।
किसन मन मार के हमरा साथ चल देहलस *कस्तूरबा बालिका इंटर कॉलेज* के प्रणागन के तरफ।
अभी हमनी के रस्ता में रही जा की एगो नाम सुनाई देहल। किसन कुमार सिंह पिता अनिल सिंह 84 नम्बर पा कर 4 नंबर स्थान पर है। ई आवाज *संजय भइया* के रहे।काहे की ओह समय उहे के मंच संचालन करी आसान सवाल में अपना अंदाज से वजन डाल दी, प्रतियोगिता के KBC जइसन रोमांच से भर दी।

जब किसन सिंह के कान में किसन सिंह के नाम गुजल त देह सन देना कर गई। हम अउर उ एक दूसरा के मुह ताकते रह गइनी जा। अब कोई एक दूसरा से नइखे बोलत, जइसे कुकुर के देह पर पेट्रोल डाल देला के बाद कुकुर बेचैन होके भागे ला।ओहि तरी हमनी दुनु जन दउड़त उ प्रतियोगिता स्थल पर पहुच गइनी जा अउर किसन मंच पर चल गइले।

शशिरंजन 95 अंक पाके पहिला स्थान के प्रतिभागी रहले। अब पुरा दर्शक के आँख उ मंच पर रहे जहा KBC जइसन सवाल जबाब होता। बस अंतर इहे रहे कि ई प्रतियोगिता में पांच प्रतिभागी रहले KBC में एगो रहे ले।

किसन के अभी तक विस्वास ना होत रहे कि उ ई प्रतियोगिता में चुनल जा चुकल बा। काहे की ओकर डर अउर बड़ गईल रहे। डर काहे ना बड़ो सब लइकन में उ बच्चा भी लागत रहे। डर से ओकर चेहरा सुख गईल रहे उ आपन मुरी नीचा झुका लेले रहे कि केहु हमरा के देख ना सके। बाकिर सब त खुला रहे ,उ सब के आँख में स्माईल रहे।

संजय भइया के आवाज के वज़न अउर सवाल पूछे के शैली से आसान सवाल भी उ पाचो टॉपर के पसीना छोड़ा देले रहे अउर चेहरा के रंग के साथ साथ गला भी सूखा देव।

शशिरंजन त बहुत तेज रहले उनका से पुछल हर सवाल उनका खातिर एगो खेलवना जइसन रहे। सवाल निकलत कहि की जबाब हाजिर बा। अउर दोसर अभियार्थी से पास आउट भइल सवाल भी शशिरंजन के मिल जाये। लेकिन किसन हर सवाल के जबाब बड़ी मुश्किल से दे पावे।

काहे की जवन भी याद रहे ओकरा उ सब भूल गईल मंच पर जाके अउर भीड़ देख के। चउथा स्थान से खिसक के उ पांचवा पर आ गईल। इहा तक कि उ एगो फिल्म के नाम तक ना बता पावल जवना के गाना मे फिल्म के नाम बा।

मेरे मुन्ने भूल ना जाना मेरे *दूध का कर्ज* निभाना।

ई कमी सायद ओकर ना रहे उ त अपना तरफ से पूरा मेहनत करे कुछ गारजीवन भी आपन रौब चलावे ले।

संजय भइया के द्वारा पुछल पाचो राउंड के सवाल में किसन मुश्किल से पांचगो उत्तर देले होइ। पर शशिरंजन सब सवाल के जबाब देले।

हमरा जइसन अउर लोग रहे किसन के हौसला बढ़ावे वाला। लेकिन किसन के मुड़ी शुरू से अंत तक झुकल के झुकल ही रह गईल।

सब भइला के बाद जब सब के नंबर सुनावल गईल त शशिरंजन प्रथम स्थान पर रहले अउर किसन सबसे अंतिम पांचवा स्थान पर।केहु कवनो स्थान पर रहे लेकिन हमनी प्रधानाचार्य जी खुश रहनी।

सब टॉपर के सर्टीफिकेट अउर मेडल,प्राइज से सम्मानित कइल गईल। सब के प्राइज अलग अलग रहे लेकिन किसन के उनकर सपना उनकर मन मे बसल उ रत्नसागर  ही मिलल रहे। जब उनका हाथ मे उ रत्नसागर के किताब मिलल त आँख में सूरज जस लालिमा अउर ओस के बून्द जस मोती निकल आइल।

जब उ अपना माई के पास आके उ किताब देखइले त उनकर माई उनका के अपना करेजा से लगा लेली। काहे की उनका मालूम रहे ई किताब किसन के पहिले मिलल रहित त उनका के प्रथम आवे से केहु ना रोकित।

कुछ साल बाद किसन पढ़ाई खातिर भिलाई (छतीसगढ़) चल गइले। उहा उ हाई स्कूल में पूरा भिलाई में टॉप छतीसगढ़ राज्य में टॉप 10 में अइले। ओकरा बाद रायपुर से इंजीनियरिंग कॉलेज में टॉप कइले। स्कूल अउर कॉलेज द्वारा भइल हर इभेँट में भाग लेले अउर सब में प्रथम स्थान पइले। अब कुछ साल से खुद के कोचिंग क्लासेस चलावत बाड़े।

जवना के नाम  जीत फाउंडनेसन  रखले बारे। इहे उ डर अउर प्रतियोगिता ह की आज खुद उ एगो मास्टरमाइंड क्योज़ प्रतियोगिता करावे ले 17 नवम्बर के ।अभी हम पिछला साल गईल रहनी जवना में 2300 प्रतिभागी यानी कि छात्र,छात्रा रहले।

नवचेतना अपना चेतना से केतना अभियार्थी रूपी लइकन के जिंदगी बदलत बा ओकनी के डर से लड़े अउर हर प्रतियोगिता रूपी अथा सागर में गोता लगावे के सिखावत बा ई सायद उ भी नइखे जानत। नवचेतना के ज्ञान के सागर से बहुत ही मोती निकलत बा।

ई  नवचेतना सामान्य ज्ञान प्रतियोविता  केकरा दिमाग के उपज ह ई हम नइखी जानत। लेकिन एकर केंद्र बिंदु, प्रकाश पुंज  नवचेतना समिति  द्वारा देखावल बा। हमरा गांव अउर ई सिवान के सब छात्र-छात्रा खातिर एगो मार्गदर्शन शवरूप बा।

आज उहे  नवचेतना के रत्नसागर  ह जवन किसन अइसन रत्न के चमक देहलस।फिर आज उ चमक केतना मोतियान के चमकावत बा।

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