कविवर भोलानाथ गहमरी

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स्वर्गीय भोलानाथ गहमरी भोजपुरी के साहित्यिक जगत के अप्रतिम व्यक्तित्व रहले । बीसवीं शताब्दी के पिछला पचास बरिस के दौरान, भोजपुरी के जइसन निष्ठापूर्ण सेवा कइले, अपना कलम से भोजपुरी के जे अनमोल अवदान दिहले, अपना मधुर व्यवहार, संगठनात्मक युक्ति-कौशल आ अद्भुत आयोजन-क्षमता से समय-समय पर आ जगह-जगह पर भोजपुरी के जे विशिष्ट आ अभूतपूर्व आयोजन कइले- करवले, आ भोजपुरी के रचनात्मक आन्दोलन के जे बल आ प्रेरणा देत रहले, अपना-आप में एगो इतिहास बन गइल बा ।

कविवर भोलानाथ गहमरी जी
कविवर भोलानाथ गहमरी जी

भोजपुरिये नाहीं, हिन्दियों के बहुत आ बहुबिध सेवा करत रहले । हिन्दी आ भोजपुरी के सामंजस्य आ सौहार्दवाला समन्वित सक्रियता में उनकर जिनिगी बीतल रहे । ई उनके व्यक्तित्व रहे कि अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के पहिला अधिवेशन, हिन्दी के गढ़ इलाहाबाद में, हिन्दी साहित्य सम्मेलन : प्रयाग का मंच पर 1975 में आयोजित भइल रहे । ई उनके व्यक्तित्व रहे कि हिन्दी साहित्य सम्मेलन; प्रयाग के प्रधानमंत्री श्री श्रीधर शास्त्री ओह अधिवेशन के व्यवस्था में ओही तरे लागल रहले, जवना तरे हिन्दी साहित्य सम्मेलन के समारोह में सक्रिय रहेले । ओह अधिवेशन में, इलाहाबाद में रहे वाला हिन्दी के डॉ. रामकुमार वर्मा जइसन अनेक मूर्धन्य विभूतियन के भोजपुरी के मंच पर उतार के गहमरी जी भोजपुरी आ हिन्दी के परस्पर सद्भाव आ सहयोग के जे माहौल खड़ा कइले, आ अधि वेशन के उद्घाटनकर्ता के रूप में मॉरीशस के राजदूत श्री रवीन्द्र घरभरन के बोला के भोजपुरी के विश्वव्यापिनी स्वरूप के ध्वनित-प्रतिध्वनित कइले, भोजपुरी खातिर आ एह सम्मेलन खातिर बहुत अनुकूल आ लाभदायक साबित भइल

उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिला हिन्दी आ भोजपुरी के विकास आ संवर्द्धन के साथ, एह दुनू भाषा के बीच सौहार्द के भावना विकसित करत रहे में विशिष्ट योगदान देले बा । डॉ. विवेकी राय, श्रीकृष्ण राय ‘हृदयेश’, भोलानाथ गहमरी, गिरिजाशंकर राय ‘गिरिजेश’, सरोजेश गाजीपुरी, प्राध्यापक अचल, गजाधर शर्मा ‘गंगेश’, रामवचन शास्त्री ‘अँजोर’, आनन्द सन्धिदूत, हरिवंश पाठक ‘गुमनाम’, वंशनारायण सिंह ‘मनज’, विनय राय आउर ना जाने कतने साहित्यकार गाजीपुर जिला के देन हवन । ओहू में, खासकर गाजीपुर जिला के गहमर गाँव हिन्दी आ भोजपुरी के विकास में बहुत योगदान कइले बा । गोपाल राम गहमरी से लेके भोलानाथ गहमरी तक ओही गहमर के देन ह, आ ई सिलसिला आनन्द सन्धिदूत, ललन सिंह गहमरी आ मिथिलेश गहमरी का रूप में आजो प्रवहमान बा, जेकरा अवदान से हिन्दी आ भोजपुरी के साहित्य भंडार समृद्ध होत रहल बा ।

गहमरी जी के बचपन वर्मा में बीतल रहे, जहाँ उनकर पिताजी मांडले आ टांगू में प्रथम श्रेणी के न्यायिक पदाधिकारी रहले । छठवाँ दर्जा तक गहमरजी वर्मा में पढ़ले । इहे वजह रहे कि बर्मी भाषा मातृभाषा खानी लिख-बोल संकत रहले । आगे के शिक्षा उत्तरप्रदेश में भइल, आ विज्ञान से इंटर कइला का बाद उत्तरप्रदेश सरकार के विद्युत विभाग में नोकरी करे लगले आ इलाहाबाद में पदस्थापित हो गइले । सेवा-निवृत्ति के कुछ साल बाद तकले इलाहाबाद में जमल रह गइले, बाकिर फेर अपना गृह-नगर गाजीपुर आ गइले, जहाँ उनका जिनिगी के शेष समय बीतल । गाजीपुर में आयोजित अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के पन्द्रहवाँ अधिवेशन उनके सत्प्रयास के प्रतिफल रहे ।

गहमरीजी के जनम 17 दिसम्बर 1923 के भइल रहे आ उनकर देहावसान 8 दिसम्बर 2000 के भइल । नौ दिन कम सतहत्तर बरिस के उनका जिनिगी के लगभग पचास बरिस साहित्य के साधना आ भोजपुरी के सर्वतोभावेन विकास के काम में लागल रहे । बचपन में मिलल बर्मा के प्राकृतिक परिवेश उनका भावुक आ कल्पनाशील मन के गुनगुनाये पर मजबूर क देलस, आ गीत लिखे लगले । उनका हिन्दी गीतन के पहिलकी किताब ‘मौलश्री’ के प्रकाशन 1959 में भइल रहे, आ हिन्दी में लिखल उनकर नाटक ‘लम्बे हाथ’ 1967 में आ ‘लोहे की दीवार’ 1972 में प्रकाशित भइल रहे ।

गहमरी जी के भोजपुरी में गीत-लेखन हिन्दी का साथ-साथ शुरू भइल, बाकिर लोकगीतन के शिल्प-शैली उनका के भोजपुरी में रचना करेके ओर जादे प्रवृत्त कइलस, आ आगे चलके उनका गीत-रचना के प्रमुख माध्यम भोजपुरी हो गइल । 1969 में भोजपुरी के उनकर पहिलका गीत-संग्रह ‘बयार पुरवइया’ प्रकाशित भइल, जवना के भूमिका आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखले रहले । उनकर दोसर भोजपुरी गीत-संग्रह ‘अँजुरी भर मोती’ 1980 में प्रकाशित भइल । एह किताब के भूमिका लिखले रहले उर्दू के मूर्धन्य शायर रघुपति सहाय ‘फिराक’ गोरखपुरी । फिराक साहब गहमरी का गीतन से एतना प्रभावित रहले कि आपन भूमिका भोजपुरी में लिखले । गहमरी का गीतन में उनका भोजपुरी भाषा के मिठास के असली स्वाद भेंटाइल आ अपना भूमिका में इहाँले लिख गइले कि “…..जवन मिठास भोजपुरी भाषा में बाटे दुनिया के कवनो भाषा में नाहीं बाटे, एके नोट कर लीं ।”

गहमरी जी के भोजपुरी गीतन के तिसरका संग्रह “लोक रागिनी” बड़ा सज-धज के सन् 1995 में प्रकाशित भइल गायन का दृष्टि से विरचित एह संकलन के गीत भोजपुरी के लोकगीतगायक कलाकारन के जरूरत सोच के रचाइल रहे । गायकी के सुविधा के ध्यान में राख के भोजपुरी के खास-खास प्रचलित धुन पर रचाइल एह संग्रह के गीत लोकगीतगायकन का बीचे लोकप्रिय त भइबे कइल, लोकगायकी के स्तर उन्नत आ साहित्यिक बनावे में बड़ा उपयोगी साबित भइल । एह संकलन के गीतन के वर्गीकरण भी धुनन के आधार पर कइल गइल बा, जइसे- पूरबी, कहरवा, झूमर, खोमटा, बिदेसिया, होली, चैती, कजली वगैरह । एह प्रकाशित किताबन का बादो, उनकर काफी साहित्य अबहीं ले प्रकाशित नइखे हो सकल । भोजपुरी में लिखल उनकर कइ एक नाटक बा, बहुत-सारा गीत बा, कुछेक निबन्धो बा, जवना के विधावार प्रकाशन कई एक किताबन के रूप ले सकत बा ।

एह साहित्यिक कृनियन का अलावे, गहमरी जी फिल्म खातिर गीत आ संवाद भी काफी लिखले रहले । ‘सजना के अंगना’, ‘बबुआ हमार’, ‘बैरी भइल कंगना हमार’, ‘बहिना तोहरे खातिर’ आदि भोजपुरी फिल्मन का अलावे, उत्तरप्रदेश सरकार के चलचित्र विभाग के फिल्म ‘विवेक’ आ ‘सबेरा’ के गीत आ संवाद उनके लिखल रहे, जवना खातिर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी आ उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल बी. सत्यनारायण रेड्डी का हाथे पुरस्कृत भइल रहले ।

भोलानाथ गहमरी के अधिकांश गीत-सृजन लोक-धुनन पर होत रहल । लोकधुन के मर्म आत्मसात कके अपना गीतन के रचना करत रहले । इहे वजह बा कि उनका गीतन में उहे मोहकता आ खिंचाव बा जवन कवनो मार्मिक लोकगीत में होखेला । गायन खातिर, मंच पर साज-बाज का साथे गवायें खातिर, आपन हर रचना सँवरले रहले । साहित्यिक दृष्टि से उनका गीतन के जे महत्व मिलल, ओकरा से तनिको कम महत्व ओकरा गायन-प्रस्तुति के ना मिलल । भोजपुरी के सुप्रसिद्ध लोक-गायक मुहम्मद खलील जिन्दगी-भर गहमरी के गीत गवले । खलील गहमरी के आपन गुरु मानत रहले । गीत-लेखन आ गीत-गायन खातिर गहमरी-खलील के जोड़ी अद्भुत रहे । खलील धुन देस त ओपर गहमरी गीत लिखस, गहमरी गीत लिखस त खलील ओकर धुन देस । एह प्रक्रिया के अपना के गहमरी के कलम भोजपुरी के अद्भुत आ अमर गीतन के अवदान देले बा । ‘भीजे जो अँचरा त भीजे हो, कहीं भींजे ना कजरा’, ‘गोरिया कवना घाटे दुइ-दुइ भरेलू गगरी’, ‘एक साँस झाँके खिड़की खोलि हबेली, गंध छितिरावे जइसे चम्पा-चमेली’ केतना गीतन के गिनावल जाय । रूप-रस-गंध के सप्राण गीतकार गहमरी पर युगीन चेतना आ भाव-बोध के भी प्रभाव पड़ल बा, आ नवगीत भी काफी लिखले बाड़न, बलुक भोजपुरी नवगीत के एगो प्रमुख कवि के रूप में मानल-जानल गइले, बाकिर उनकर कवनो गीत-नवगीत गेय धुनन खातिर अपेक्षित अनुशासन से परे नइखे जा सकल ।

गहमरी के साहित्यिक सक्रियता के दोसर पहलू रहल बा नाटकन के रचना आ मंचन । उनका हिन्दी नाटकन के चर्चा ऊपर आइल बा । ओकरा अलावे, भोजपुरी में कईगो नाटक लिखले आ अपना निर्देशन में इलाहाबाद में आ उत्तरप्रदेश के दोसर-दोसर शहरन में मंच पर प्रस्तुत करावत रहले । अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के बिलासपुर (मध्यप्रदेश, आ अब छत्तीसगढ़) में आयोजित आठवाँ अधिवेशन में भी उनकर लिखल एगो भोजपुरी नाटक उनके निर्देशन में मंचित आ जनता का बीचे प्रशंसित भइल रहे । उनकर लिखल कवनो भोजपुरी नाटक प्रकाशित नइखे हो सकल, जे कि भोजपुरी नाटक साहित्य के अनमोल निधि बा ।

भोलानाथ गहमरी के संगठनात्मक आ आयोजनात्मक सक्रियता का बारे में ऊपर कहल जा चुकल बा । अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के स्थापना से कईबरिस पहिले, अपना गाँव गहमर में भोजपुरी संसद् (वाराणसी) के ऐतिहासिक अधिवेशन करवले रहले, जेकर इयाद भोजपुरी से जुड़ल पुरान साहित्रूकारन के मन पर आजो ले ताजा बा । अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के ना सिर्फ पहिलका अधिवेशन इलाहाबाद में आ पन्द्रहवाँ अधिवेशन गाजीपुर में करवले, बलुक एह सम्मेलन के आरम्भिक संगठन खड़ा करे में उनकर बड़ सहयोग रहल बा । एह सम्मेलन के शुरूआती दौर से लेके अपना जिनिगी के आखिरी दम तक एह सम्मेलन से कवनो ना कवनो रूप में सक्रिय रूप से जुड़ल रह गइले । एह सम्मेलन के कई सत्र में प्रवर समिति के सदस्य, पहिलका दू सत्र (1975-77) में कला मंत्री, छठवाँ-सातवाँ सत्र (1981-83) में महामंत्री, बारहवाँ-तेरहवाँ सत्र (1993-95) में उपाध्यक्ष आ चौदहवाँ सत्र में अध्यक्ष का रूप में आपन सक्रिय सेवा समर्पित कइले रहले ।

रचनाधर्मी कवि भोलानाथ गहमरी ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘आज’ आ ‘भारत’ जइसन पत्र-पत्रिकन में जमाना से छपत रहले आ कवि सम्मेलन में आपन रंग जमावत रहले । आकाशवाणी आ दूरदर्शन पर उनकर कार्यक्रम अक्सर होत रहल । आकाशवाणी के स्वर-परीक्षक आ सलाहकार के भूमिका एगो लम्बा अरसा तक निभवले रहले । अपना पुस्तक का अलावें, ए सब माध्यम से जनता के बीच पहुँच के जनता के हृदय में आपन जगह बना लेले रहले ।

भोजपुरी के दीर्घकालीन विशिष्ट सेवा खातिर उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान भोलानाथ गहमरी के ‘राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार’ से सम्मानित कइले रहे । भोजपुरी अकादमी (पटना) उनका गीत-संग्रह ‘अँजुरी भर मोती’ पर उनका के पुरस्कृत कइले रहे । हिन्दी साहित्य सम्मेलन : प्रयाग, भोजपुरी-भाषा-साहित्य के विशिष्ट सेवा के उपलक्ष्य में उनका के ‘साहित्यवारिधि’ के मानद उपाधि के सम्मान दे चुकल रहे ।

गहमरी जी के व्यक्तित्व उनका गीतन खानी मोहक आ मधुर रहे । उनका गीतन में जे विलक्षण सिम्फनी बा, उहे उनका मधुर आ शालीन आचार-व्यवहार में परिलक्षित होत रहे । फिराक गोरखपुरी के शब्दन में “गहमरी जी के कवितन में एक नई उपज, गजब के उर्वरता आ नदी के कल-कल नाद के साथ बहाव और रवानी बाय । उनकर कल्पना रंगारंग, बहुत नाजुक और मन के मोहेवाली हव ।”

कुछ समय से गहमरी जी अस्वस्थ रहे लागल रहले । उनका भोजन-नली में कैंसर हो गइल रहे, जेकर पता बहुत दिन बाद चलल, तब तक बहुत देर हो चुकल रहे ।

जन्म: 19 दिसम्बर 1923
निधन:  2000
जन्म स्थान:  गहमर, गाजीपुर, उत्तरप्रदेश

ध्यान दीं: इ आलेख पाण्डेय कपिल जी के लिखल किताब लेखाञ्जलि ले लीहल बा।

कविवर भोलानाथ गहमरी जी के बेहतरीन रचना कवने खोंतवा में

कवने खोंतवा में लुकाइलु, आहि रे बालम चिरई,
वन-वन ढूँढलीं, दर-दर ढूँढलीं, ढूँढलीं नदी के तीरे,
साँझ के ढूँढलीं, रात के ढूँढलीं, ढूँढलीं होत फजीरे,
मन में ढूँढलीं, जन में ढूँढलीं, ढूँढलीं बीच बजारे,
हिया-हिया में पैंइठ के ढूँढलीं, ढूँढलीं विरह के मारे,
कौने सुगना पे लुभइलु, आहि रे बालम चिरंई……….

गीत के हम हर कड़ी से पूछलीं, पूछलीं राग मिलन से,
छन्द-छन्द, लय ताल से पूछलीं, पूछलीं सुर के मन से,
किरण-किरण से जाके पूछलीं, पूछलीं नील गगन से,
धरती और पाताल से पूछलीं, पूछलीं मस्त पवन से,
कौने अंतरे में समइलु, आहि रे बालम चिरई…………

मन्दिर से मस्जिद तक देखलीं, गिरजा से गुरद्वारा,
गीता और कुरान में देखलीं तीरथ सारा,
पण्डित से मुल्ला तक देखलीं, देखलीं घरे कसाई,
सागरी उमरिया छछनत जियरा, कबले तोहके पाई,
कौनी बतिया पर कोहइलु, आहि रे बालम चिंरई……..

भोलानाथ गहमरी जी के रचना उठेला करेजवा में पीर

उठेला करेजवा में पीर बारी धनियां
उठेला…

तोहरे कारन गोरी घर बार छोड़लीं
छोडलीं नगरिया के लोग
ओही कलकतवा के छोड़लीं नोकरिया
माटी भइलें सोना के सारी बारी धनियां।
उठेला…

सोनवां के पिजरा सबुज रंग सुगना
बोलेला पिरितिया के बैन
नित गोहरावे तोरे नान्हें के नइयां
टपके नयनवां से नीर बारी धनियां।
उठेला…

कंचन काया मोरा हो गइलें पराया
जियरा भइल बदनाम
चढ़ती उमिरिया में भभुति रामवलीं
तोरा पीछे हो गइलीं फ़क़ीर बारी धनियां
उठेला…

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