दसईं आ भूत : दिलीप पैनाली

परनाम ! स्वागत बा राउर जोगीरा डॉट कॉम प, आयीं पढ़ल जाव दिलीप पैनाली जी के लिखल दसईं आ भूत, रउवा सब से निहोरा बा कि पढ़ीं आ आपन राय जरूर दीं, अगर रउवा दिलीप पैनाली जी के लिखल दसईं आ भूत अच्छा लागल त शेयर जरूर करी।

लइकाईं में दसईं चढ़े का रात में आजी बस एकही चिन्ते सुते। चिन्ता रहे रतिगरे हमनी का नाभी, तरूआ,बाँह, गरदन आ आँख में काजर लगावल। आ ओने माई करिया कपड़ा में लहसुन गुंथ के गरदन में पहिरावे का चिंते सुते। हाईस्कूल में गइला का बाद लड़ लड़ ई बंद करवइनी सऽ।

दसईं चढ़ला का बाद मुरघटिया का ओर गइल साफ मना रहे। अकसर आजी कहे जे दसईं में डाइन मुर्दा उखाड़ के खेलावे ली सऽ ,अगर जो केहू गलतियो से देख लिहल त पागल हो जाला।

दिलीप पैनाली जी
दिलीप पैनाली जी

आईं सभन अइसने एगो घटना सुनावे जा रहल बानी।बात सन 1988 ई.के हऽ, इहे दसई चलत रहे। अगौथर बाजार पर दुर्गा जी धराइल रहली। बबन काका का निर्देशन में एगो नाटक बाजार पर होत रहे। हम आ बबलूआ नाटक देखे गइल रहीं सऽ। हमरा घर से बाजार एक किलोमीटर ले पड़ी।नाटक खत्म होखे से पहिलहीं लगभग रात के सवा बारह बजत होई घरे चल दिहनी सऽ।

तिराभांती रास्ता धइले जब अपना घरारी का बेल का लगे पहुँनी स त बेल पर चिड़ई का फड़फड़इला के आवाज सुनाइल। अइसे त अंजोरिए रात रहे बाकिर अन्हरिया रात में कुछ खड़खड़इला पर जइसन डर लागेला अउसने डर ओह बेल तरे लागल। केहू केहू से कुछ ना कहल आ आगा बढ़ चलल। हर साल जस ओहू साल चँवर में बरारी आ गइल रहली सऽ। बबलूआ दँवरी लगइले रहे। माने लम्हर डोरा के दू गो खूँटा में बान्ह ओह में आठ गो बंशी बनहले रहे।

जब घर का लगे पहुँचल त कहलस हो भाई चलऽ ना मोहार पर बंशिया देखले आवल जाव। बेल आला घटना से मन डेराइल रहे त हम मना कर दिहनी। लेकिन ओकरा जिद्द प जाए के पड़ल।मन में सोचहूं लगनी जे बेल पर त चुड़इल रहेले लेकिन हे चँवर का रास्ता में त भूत प्रेत के बात नइखीं सुनले। एह से एने जाए में कवनो खतरा नइखे,निडर हो चलल जाव। कुछे दूर आगे बढ़ल रही की बिनेसर बाबा से सुनल कहानी मन पड़ गइल। कइसे उनका के एगो प्रेत चँवरा से पीठिआवत खिल्ली खेत ले आइल रहे। ताले हमनी बढ़त जरठुआ पर का इनार का लगे पहुँच गइनी सऽ।

दसईं आ भूत
दसईं आ भूत

ओजा के दृश्य बरणन करे में रोंवा ठाढ़ हो रहल बा। अचानक ओह इनार से डेरावन आवाज निकले लागल। बुझाय की आदमी पागल हो जाई। समझ में ना आइल जे आखीर ओह इनार में का रहे जवन अइसन आवाज उत्पन्न करत रहे। ई उहे इनार रहे जवना में देवलाल महतो बो गिरियो के बांच गइल रही। हमरे बाबू जी बिसन बेर ढ़ुक के जवना इनार के उड़ाह कइले रहस ओह में अइसन का समाइल बा ! तरह तरह के बिचार मन में आवे लागल। ओने आवाजो पहिले से तेज होखे लागल। मति का, का जाने का हो गइल, बस मुंह से अतने निकलल भाग बबलू भाग ना त जान ना बांची। एके सांस में दुआर पर पहुँच चुपचाप सुत गइनी सऽ।

पढ़ाई लिखाई ला हम छपरा रहे लगनी। ओने बबलूआ पगला गइल। आजो अउसने बा। भेंटइला पर आजो परणाम दिलीप भइया कहेला। ना खाए के सुध ना पहिरे के सुध सब इलाज बेकार हो गइल। सायद ओकरा पर कवनो आत्मा के छाया पड़ गइल,बा कवनो डाइन कऽ दिहलस हम आजो इहे सोचेनी!!!

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