देवेन्द्र कुमार राय जी के लिखल कुछ भोजपुरी कविता

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— सुसुकत नदी —

रहे पानी जबतक हमरा में
सभ तन धोके सिंगार कइल,
जल आंचर में मुंह पोंछि के
के ना हमसे प्यार कइल।।

लचकत कमरिया जब तक रहे
पानी के तन हिल हिल बहे,
अइसन रहे सुघराइ एकदिन
कवन सोनभद्र ना अलबत्त कहे।।

जलप्रपात जस जोबन प
सभ प्रेमी डीठ गड़वले रहन,
बहत जल के अंकवारी में
सभ आपन हीक मिटवले रहन।।

तन वसन जस पानी सुखल
अब लगे ना केहू आवेला,
जेकरा प नेह में रहीं नेवछावर,
अब उहो जीभ बिरावेला।।

सभके चढ़ल जवानी ढरकी
कड़गर चाम जरुरे लरकी,
भइल उतान जीनीगी में छोड़
बल के ढेरी एकदिन भरकी।।

— ठूँठा पीपर —

रहे जबाना हमरो एकदिन
जब लहकत हावा भीरी आवे,
कर हथजोरी अउर चिरौरी
छांह खातीर देंहि दबावे।।

एहवाति से रांड़ हो गइनी
पतई झरल खोंखड़ भइनी,
जेकरा खातीर आपन रहीं
ओकरे खातीर गैर हो गइनी।।

घाम में अतना हिम्मत ना रहे
हाथ जोडि़के उ रास्ता मांगे,
हमरा से लेके उ आदेश
तबे राहि प आगे बढे़।।

चिरईं चुरुंग के गाँव रहीं
जरत प्रकृति के छांव रहीं,
समय गुजरल भइनी ठूँठ
सभके खातीर भइनी झूठ।।

जांगर थाकल का हम बघारीं
अब त खडा़ चुपचाप निहारीं,
शीतल करेके समय बीतल
राय रोवे अब ठूँठा पीपर।।

— गरमी —

गरमी गरम बना लहकता,
चिरईं चुरुंग सभ मरता।

अइसन चलता ता गरम हावा,
खडे़ देंहि भइल बा लावा।

खाएक त रुचिआते नइखे,
अब खाईं का बुझाते नइखे।

घर भइल बा बोरसी जइसन,
लहके देंहि करसी अइसन।

पंखा के हावा से लागे लुक,
अइसन लागे तन जाइ सुख।

सभ हरिअर मउराइल बा,
पछेया से सभे झुराइल बा।

खाए में करे सभ आनाकानी,
मन मांगे खाली ठण्ढा पानी।

सउंसे भारत भइल बेहाल,
कहे का राय गरमी के हाल।

— लुआठी —

करिके दोस बाडे़ खामोश
निर्दोस के देले खोरना खोंस,
लाचार हतास बा सच्चाई
कर्मठ लउके हरदम बदहोस।

खून पसीना से बेवहार जे बोवल
करम से अपना जीनीगी जे ढोवल,
ओकरे चूल्हा चउकी सेराइल
हकछीनवा लउके दूध के धोवल।

कतनो रोइं चाहे कतनो धोइं
चाहे सांचे सांच बात बताईं,
ना केहू सुने ना केहू गुने
दोसरे के सभे दोस गिनाई।

हमरे बोअल सइंचल ह
आजु हमरे चरकल खाटी,
हमरे सुतरी से सेज सजाके
हमरे प फेंकसु जरत लुआठी।

भेसर कहीं कि अधभेसर कहीं
चेतन कहीं कि कहीं अचेतन,
भरम से भरल बा दुनिया
निरोग रही कबहीं ना मन।

— प्रेम के चटनी —

फहरावतारी अइसन बार,
लागता कि हो जाइ आन्हार।

बडुए कटार नीयन मुसुकी
बताव भाई केने घुसुकीं।

पता ना रोज कहां जाली ई अकेला,
पीछे से लागल रहे लइकन के रेला।

झपकत गर्दन झार के बतिआवेली,
पलखत पावत कनखी चलावेली।

केना कहे कि जीअ ए हमार ढाठा,
तोहरा रही खेत हमार रही काठा।

टुनवा कहे हमार हई मुनवा कहे हमार,
प्रेम के चटनी चाटे में हो गइले बेकार।

देखीं मन बढ़ला प इहे होला,
उन्माद के जहिया टुटेला लोला।

— माठा कि चाह? —

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पाठा के माठा सुधार देला देंहि,
मंगरू के चाह बिगाडि़ देला देंहि।

गरम चाह के जीनीगी सभ मानल,
माठा के गंवार सभ जानल।

माठा बिना चैन नाहीं कतनो कमइहे,
चाह पीके कतनो उ सेन्ट मलवइहें।

कहिला रसगर बात एगो सुनी,
चाह के सुरुकेवाला खटिए के चुनी।

छोडी़ं चाह आ माठा पीहीं,
अस्सी बरीस मस्ती में जीहीं।

सपना भइल माठा के मिलल,
कहे राय दुलुम भइल जियल।

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