दिलीप पैनाली के लिखल कुछ भोजपुरी कविता आ गीत

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कउआ लाला

कउआ का उड़े पर अपना भइल बहुत गुमान,
हंस से लगाएम बाजी मन में लिहलस ठान।

कहलस कउआ एक दिन, हंस का लगवा जाई,
के बा बीर धरा पर ,जे बाजी हमरा से लगाई।

आजी बाजी बेकार बा सुन कउआ भाई,
बेमतलब में के आपन उड़ देह ठेठाई।

हंसवा रे धमधुसर बारे, जल्दीए थक जइबे,
हमरा संगे उड़े में, तें कबहीं ना पता पइबे।

सुनत-सुनत हंसवो का , क्रोध एकदिन आइल,
सागर पार करेला, दिन एगो रोपाइल ।

दहिने बांवे ऊपर नीचे , कउआ खूब करे,
कोस-भ, उडला का बाद, लागल पियासे मरे ।

बुद्धि बिसरल ,बिश्राम ला खोजे लगलें ठेकाना,
उड़ऽ-उड़ऽ कउआ लाला, हंसवा मारे ताना ।

देह देहलस जबाब, जब सागर में समइलें,
लम्हर बने में कउआ आपन जान गवंइलें।

कहे पैणाली जान-बुझके, मत बनिहऽ घचाक,
देह देख कबो केहू से, जनि करिहऽ मजाक।

दिलीप पैनाली जी
दिलीप पैनाली जी

गीत

सास सबेरहीं मंदिर चलि जास,ससुर सिंझवात दाना,
मरदाना नाहीं दुख मोरा बुझे सखिया—

बकरी छेड़ गाही के गाही,चउमास चरवावस,
निकसत भन्सा घर से, चीपरियो पथवावस।
सुख तन रहेठा भइल पचत नइखे खाना,
मरदाना नाहीं दुख मोरा बुझे सखिया—

झूला झूलत कटल दिन, माई का घरवा,
सरग के सुख रहे मिलत,हमरा नइहरवा।
उत्साह उमंग के भइल खाली खजाना,
मरदाना नाहीं दुख मोरा बुझे सखिया—

दुई दिन के कनियो बस गइल सहरिया,
जींस टॉप झमकावस हमरा तन लुगड़िया।
अंसो नाहीं छोड़ब साथ जाइब हवाना,
मरदाना नाहीं दुख मोरा बुझे सखिया—

घूम के आइब त इंग्लिश में बतिआइब,
एसी फ्रिज टीवी, इन्वर्टर लगवाइब।
काम के बेरा बनाइब नव गो बहाना,
मरदाना नाहीं दुख मोरा बुझे सखिया—

साझ-पाझ में रहि,नइखे तन लसरावे के,
ठान लीहले बानी, नाया घर बनावे के।
समझइले समझुस ना बदल गइल जबाना,
मरदाना नाहीं दुख मोरा बुझे सखिया—

का कहेले कोइलिया?

ए नानी नाना कहाँ, कहेले कोइलिया?
भोरभोरे गीत, सुनावेले कोइलिया।
पोतवा के बात ई, आजी बतावेली,
चिड़ई चुरूंग से, परिचय करावेली।

ए मामी मामा कहाँ गावेले कोइलिया?
भोरभोरे गीत, सुनावेले कोइलिया।
बबुनी के बात ई माई बतावेली,
चिड़ई चुरूंग से, परिचय करावेली।

दिन धराई

रिश्ता के टंगरी टूटल, गिर गइल खाई में,
कुंभ जस लागऽत मेला,ए घड़ी दिन धराई में

खेत पड़ती, अमराई उजड़ल, गाएब बथान,
लोशन लागत सेल्ह क दाढ़ी,बिलाइल मचान।
सभकर ध्यान लागल, लहंगा कोट टाई में,
कुंभ जस लागऽत मेला,ए घड़ी दिन धराई में।

सास का पतोह ना भावत,पतोहा का सास,
दहेज दे आइल कनिया, ढ़ीलत नाहीं रास।
सोंचल होत कहाँ? जोजना पड़त खटाई में,
कुंभ जस लागऽत मेला,ए घड़ी दिन धराई में।

जग जुप में पट्टी पट्टीदार, कुटुबं जस आवे,
घरवइया बस गिने मुड़ी, आ भरहा खिआवे।
फाटल कुर्ता पैनाली, बुफे का लड़ाई में,
कुंभ जस लागऽत मेला,ए घड़ी दिन धराई में।

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सांवा कोदो, मरूआ टांगुन,
देख परास, दुअरा से पाहुन

सांघर घोंघर लउकत परिवार,
बेटिहा भागत छोड़ि दुआर

बइठन के मिलल,बँसखटिया,
अगुआ भागल,ले फटफटिया।

चपरासी के, अभियंता बताई,
ठगत बा बेटहा, जाल बिछाई।

दहेज क हाल, कहीं का भाई?
रोअत उ जेकरा सिरे जाई।

आवल करिहऽ

भोरहीं आके पंजरा निंन से, जगावल करिहऽ,
मोरे सजनिया सपना में रोजो आवल करिहऽ।

पलके पर रखिहऽ बबुनी के, जीतिहऽ माई के दिल,
घर आंगन बेरा पर करिहऽ तनिको दीहऽ जनि ढ़िल।
रूस जाए जो आजी कबहूँ त पोल्हावल करिहऽ,
मोरे—

कगजलही खाता खरीद बबुआ के भेजिहऽ पढ़े,
डांट देवे माई कबहूं त बात जनि दीहऽ बढ़े,
थाक जाए माई जो कबो गोर दबावल करिहऽ।
मोरे—–

जानते बारू सेवा सेना क बा कतना महान,
पहरा दीहले से हमनी का बा सुरक्षित सेवान।
खाता नागा होखो ना, बन्नी गोहरावल करिहऽ
मोरे——

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