अमरेन्द्र जी के लिखल घसगढ़ी के पढ़ाई | एगो हास व्यंग

हम का हईं।
अभी हमरे खुद पाता नइखे।
तबो हम अपना के बिदवान से उपर ना,त नीचहूं ना बुझीं। इसकुल चलाइना, ठठ्ठे बात नइखे,बुझनी।
हमरा खुदसर के गेआन होखो चाहे ना होखो,बाकीर हम खुल्लमखुला गेआन बाँटिना चाहे बेंचि•••••।

अइसे हम हईं त ना बाकी बहुते लोग कहेला कि हम बुधीजिवी हईं,त गते-गते हमरो भरम हो गइल कि हो सकेला हमहु एह किसीम के जीव होखीं। जर जवार के मीटिंग-सीटिंग में हम जाए लगनी।अचरज त तब भइल कि इसकुलिहा लरिकन के पढ़ाई के सरकारी सिलेबस प आपन बिचार देबे खातीर एगो सरकारी परोजन में हमरो नाम आ गइल।

अब त भइल फेरा।भला हम एह बिसय में का कह सकत बानी। बहुत सोंचनी, बिचरनी।तब जाके, हमार धेआन एह बात प गइल कि गुलामी के दुरदिन से लेके आजु तक कतने चीझु भा बिसय के पढ़ाई के बेवस्था भईल। जइसे निजियरिंग, बनियादम, डक्डरी, लोल बनाई आ ना जाने कतने।देस में कतने लइका आ लइकी किसानी, मछुअई, चीकधंधी, दरब शास्त्र आ समादभेजिया अइसन नवका पढ़ाई कइके छिछिआइल चलत बा लोग। किछु लो के कामो लागल बा। बाकी उ लोग,अपना काम-कमाई से कतना संतुष्ट बा। उहे लो बता सकेला।

जइसन कि हम बतवनी हा कि हमरा एह सब बिसय के जानकारी त नाहिए रहे।बाकी एनो-ओनो अपने से सोचनी,समझनी,तकनी,झंकनी त एगो बात दिमाग में आईल कि इ चारो ओरो मारि घाँस फूस उगल बा।जेने देख ओने।

गली में, नली में, देवाल प,अंगना में बहरी, भीतरी, सहर में, पहाड़ पर।आने कि चारो ओर घसवारि हो गइल बा।रउआ एकरा के घासीकरण चाहे घासिनाइजेसन भी कह सकेनी। बहुत दिमाग लगवनी।तब जा के बुझाईल कि देस के सब लोग नोकरी चाकरी करे लागल।

लोग माहटर, फरफेसर, निजियर, डगधर, ओकिल, फउजी आ ना जाने का का बनि के गाँव में से भागि गइल।किछु अनपढ़,जाहिल आ चउपट लो रहे।उहो लो नेता हो गइल।ना त ई लोग त जरूरे घास छिलितन।एह तरह से घसगढ़न के एकदमे से कमी हो गइल।आ जेने देखे ओने घासे घासे हो गइल।

काहे ना एगो अइसन जोजना बनावल जा कि घास छिले के गेआन इसकुलन के सिलेबस में सामिल क लेल जाव।एह से घास के बढ़ल भी रूकी आ साथे साथे देस में घसगढ़न के संतुलनो मानक स्तर तक चहुँप जाई।

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अगिला दिन ठीक टाएम प हम बोलावल जगह प गइनी।बहुते बिदवान लो की जमघट लागल रहे।सब लोग आपन-आपन बाति राखत रहे। आ सुनवइया लो सवाल प सवाल दागत रहे।माएक से जइसहिं हमार बोलाहटा भइल, हम इस्टेज प गइनी।आ सर सलाम के बाद सीधे आपन बात आ देस के समसेआ बतवनी। आ कहनी कि बिना घसछिली के सिलेबस में सामिल कइले इ घसवारि खतम ना हो सके।आ दोसर बात कि घरसगढ़न के अलोपित होत परजाती के बचाव भी हो जाईत। भइलि हाला। आरे भाई इ दुनिआ चान से दूरि मंगर आ सनिचर के फेरा में परल बा।त रउआ घसगढ़ी पढ़ा के नवका पीढ़ी आ देस के आगे बढ़ावल चाहत बानी। आछा, तऽ आपन जोजना के बारे में पूरा जानकारी दिहीं।

हम बतावे सुरू कइनी।सुनि जा।सबसे पहिला बात त इ रही कि आखिर इ घास हउवे का ?
एकर परिभाषा का हो सकेला?
घासि,फेंड़ से अलग कइसे बा ?
घास कइसे जामेला?
कहंवा जामेला आ कहंवा ना जामेला।
ना जामेला त आखिर कांहे?

घास कब कटाला? घास में कवन-कवन जीवा जनावर रहेलन?का घास के परयोग आदमी के एक बेरि के खाए में हो सकेला? घास के इमिदी प साएड एफेट का होई? आखिर जनावरन के ब्रेकफास्ट, लंच आ डीनर सभ में घासे काहे निक लागेला?

घास के संबंध देस के दाव पेंच चाहे राजनीति से का बा? कमनिस्टन के झंडा प हँसुआ रहते ममता के घास आतना कइसे बढ़ल?

घास के बाजार भाव का बा?देस के सभ घरवहिआ उत्पादन में एकर का जोगदान बा?

का धान-गहूँ के घास कहल जा सकेला?

घास के बारे में सरकारी नीति का बा?

एकरा के जीएसटी में लेआवल जायज रही कि ना?

घास के शास्त्र आ नीति का अभिओ ओइसहिं बा?

तृणं न खादन्नपि जीवमान:।
एकर धर्म आ अध्यात्म का बा? का अभिओ सही बा कि
मानवः तृणवत भवति?
साथ ही एकर कटाई आ लोक प बिचार होई कि का गीत में इ अभिओ गवात रही कि
गढ़े द रहरिये में हो घास?

कोर्स चरसाला होई।। अडमिसन नवका साल से।डोनेशन चाहें उपरवार किछुओ ना लागी।काबिल आ चल्हाक घसगढ़न के बिलाएत भेजि के नाया नाया टटका टोटका में टरेनी दिआई।जवना से देस के घसगढ़न के इसकिल बढ़ सको।आ हं,एमें कबनो जात पात के चकर ना रही।

आखिर देसवा के बिकास ना होई त निमन दिन कइसे आई।

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