जगदीश खेतान जी के लिखल भोजपुरी कविता हमहूं लूटीं तेहू लूट

जगदीश खेतान जी
जगदीश खेतान जी

हमहूं लूटीं तेहू लूट।
दूनो पहिने मंहग सूट।

उपर वाले के भी खियाव।
अपने पीअ आ उनके पियाव।
अईसे जो कईले जईब त
रिश्ता हरदम रही अटूट।
हमहूं लूटीं तेहू लूट।

अंगरेजन के हवे सिखावल।
आ हमनी के ई अपनावल।
शासन अगर करे के बा त
जनता मे डरले जा फूट।
हमहूं लूटीं तेहू लूट।

अगर करे केहू कंप्लेन।
साहब के द तू सैम्पेन।
उनसे मिल-जुल मौज उड़ाव
साथे उनके ल दूई घूंट।
हमहूं लूटीं तेहू लूट।

आदिकाल से चली आईल बा।
केहू न येसे बच पाईल बा।
केहू के मान के ना बा रोकल
जे रोकी हो जाई ठूंठ।
हमहूं लूटीं तेहू लूट।

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