जयकान्त सिंह जी के लिखल भोजपुरी कहानी ढाल

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टहलुआ भीतर जाके प्रोफेसर श्रीवास्तव के खबर देलस- ” हुजूर, छट्ठू राम डी टी ओ साहेब आइल बाड़ें।” प्रोफेसर श्रीवास्तव चिहइलें-” डी टी ओ छट्ठू राम! हमरा इहाँ! अच्छा ठीक बा। बइठाव, आवS तानी।” कुछ देर बाद अतिथि घर में प्रोफेसर श्रीवास्तव के पहुँचते डी टी ओ आगे बढ़ के उनका से हाथ मिलावत पूछलें -” पहचननी ?

प्रोफेसर साहेब चेहरा पर चवनिया मुस्कान लेआवत कुछ भटभटाये के भाव – भंगिमा दरसावत बोललें – हम कुछ भटभटात बानी। माफ करब, ठीक से पहचननी ना।”
प्रोफेसर श्रीवास्तव के बात बीचे में काटत डी टी ओ साहेब कहलें – आरे हम पैंसठ में ओही इस्कूल से मैट्रिक कइनी, जवना से रउआ मैट्रिक कइनी।अब त पहचानी। “प्रोफेसर श्रीवास्तव बोललें- आरे भाई, रउआ पैंसठ में मैट्रिक कइनी आ हम साठ में। कबहुँ के भेंटो नइखे बुझात तब कइसे पहचान लीं।

आपन पूरा परिचय दीं तब अंदाज लागी।” एतना बतकही तक दूनो जने ठरे बतिआवत रहलें।एकर भान होते प्रोफेसर श्रीवास्तव उनका के बइठे के कहके अपनहुँ कुर्सी पर बइठत टहलुआ के आवाज देत कहलें – जो दू प्याली चाय बना के ले आव।

जयकान्त सिंह जी
जयकान्त सिंह जी

फेर डी टी ओ साहेब कावर मुँह कके आपन पूरा परिचय देवे के कहलें। “एह पर डी टी ओ साहेब बोललें -” हमरो घरे रउरे गाँवे बा। बाकिर रउरा हमरा बाबू के नांव से ना चिन्हब।माई के नांव धरेब त जरूर चिन्ह जाएब। काहेकि हमार माई अँजोरिया रउरा किहाँ बरतन- पोछा करत रहे।

“अँजोरिया नांव सुनते प्रोफेसर साहेब के स्थिति स्पष्ट हो गइल। मुस्काकहलें – अच्छा त तूँ अँजोरिया चाची के बेटा हउअ।” एतने में टहलुआ दूनो जाना के आगु चाय रख दिहलस आ दूनो जाना आपन – आपन प्याली उठा के चाय सवादत परिवार, पड़ोस, मुहल्ला के हाल- समाचार बतिआवे लागल लोग।

बतकही खतम होते डी टी ओ छट्ठू राम प्रोफेसर श्रीवास्तव से निहोरा करत कहलें – “हमार इच्छा बा कि रउरा काल्ह हमरा कार्यालय में आईं। इंकार जन करब। “प्रोफेसर श्रीवास्तव ना, ना कह पवलें आ अगिला दिन डी टी ओ छट्ठू राम के कार्यालय में पहुँचले त डी टी ओ छट्ठू राम अपना बड़का हाकिमी कुर्सी से उठके उनका से हाथ मिलवलें। सामने वाली कुर्सी पर बइठे के इसारा कइलें।

जलपान – ठंडा सब चलले रहे कि डी टी ओ छट्ठू राम के किरानी कुछ फाइल उनका दस्तखत खातिर ले आके उनका आगु धइलस। ओकरा फाइल धरते पूछलें- “कएगो दरखास्त बा।” किरानी बाबू कहलें – “हजूर, बारह गो।” डी टी ओ – हुरुकलें, तब एकर पइसा। हमार दस्कती ? “किरानी बाबू प्रोफेसर श्रीवास्तव के ओर देखके डी टी ओ साहेब के कान में गँवे से फुसफुसइलें- ” हजूर, ओकर चिन्ता मत करीं। राउर गिनके मिल जाई।सामने के साहेब सुनिहें त जुलुम हो जाई।”

किरानी बाबू के बात सुनते ठठाके हँसत कहलें – “आरे ई घर के आदमी बाड़न। फाइल इहँवे रहे दS आ पहिले हमार दस्कती ले आवS।” ना त बाद में सब आपुस में बाँट लेबS लोग आ हम हाथ मलते रह जाएब।” जइसे किरानी बाबू बाहर गइलें कि प्रोफेसर श्रीवास्तव डी टी ओ छट्ठू राम से बोललें – “आरे सभका सोझा अइसन जन करS भाई। केहू सुन ली त तोहरा खातिर आफत हो जाई।” प्रोफेसर श्रीवास्तव के बात सुनके डी टी ओ छट्ठू राम कुटिल मुस्कान छोड़त बोललें – ” हमनी का दलित हईं।

हमनी के खिलाफ केहू अइसन आरोप लगाके कुछ ना बिगाड़ सके।उल्टे ओकरा पर नाजायज ढंग से से एगो दलित के फँसावे के आरोप लाग जाई आ हरिजन एक्ट में अइसन फँसिहें कि जल्दी बेलो ना होई। एह से हमनी अइसन डर- भय से प्रायः निफिकिर रहिले। खैर, आरे हमनी कहँवा अझुरा गइनी। एक- एक प्याली चाय बनवाईं ।” एह पर प्रोफेसर श्रीवास्तव इंकार करत कुर्सी से खड़ा होत कहलें – “अब ना, बहुत हो गइल।”

रउवा खातिर:
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