कवि ह्रदयानन्द विशाल जी के लिखल कुछ कविता

कवि ह्रदयानन्द विशाल जी
कवि ह्रदयानन्द विशाल जी

चिरुआ भर पानी मे डुब मरऽ

माई के माई काहला के कीमत
शुध बेयाज सहीते अशुले लगलअ
दुध के धोवल तुहुँ नइखअ
कवना घमंडे फुले लगलअ

तहरे उपर नाज रहे तु ये
बुढ़ी समइया मे का कइलअ
साँचका लोग मुह पर थुके लागी
तु एहु के फिकीर ना कइलअ

सब निमानका के ठोकर मार के
घटिया काम सब कबुले लगलअ
दुध के धोवल तुहुँ नइखअ
कवना घमंडे तु फुले लगलअ

हमहुँ त भगवाने बुझ गइनी
ताहरा जइसन बलातकारी के
आँख चिदोर के देखतारअ
इजत लुटाता महतारी के

तहरे माई के निंगा कइलस
ओही से मिले जुले लगलअ
दुध के धोवल तुहुँ नइखअ
कवना घमंडे तु फुले लगलअ

घीव के लडडु टेढ़ो भला बाकी
तु त गोबरो से भी गइल बाड़अ
माई के रच्छा तु का करबअ
खुदे बलात्कारी भइल बाड़अ

भेद खुली त बासाये लगबअ तु
आइल बुढ़उती झुले लगलअ
दुध के धोवल तुहुँ नइखअ
कवना घमंडे तु फुले लगलअ

ह्रदयानंद विशाल भरत सरमा
अब तहसे नाता ना रखिहें
लाजो के अब लाज लागता
तहरो लाज बिधाता ना रखिहें

भिखारी गुलाब सुखनंदन के गोड़ के
धोवनवो मे नइखअ इ भुले लगलअ
दुध के धोवल तुहुँ नइखअ
कवना घमंडे तु फुले लगलअ

कंजुस होखे त अइसन ना त ना होखे

एक समय कंजुसी मे
मशहूर महोदय मुल्ला जी
दोसरा के रस पी जईंहें पर
आपन ना दिहें गुल्ला जी

एक बार कुछ लोग पधरले
मुल्ला जी के दुवारे
घर छोड़ के मुल्ला जी
भगले लगले बाग बहारे

शोचले घरे रहब सभे आई
जेब के दमड़ी जाई
केहु ना केहु कहबे करी
की एक कप चाय पियाईं

ए से निमन ईहंवे बाटे
चाय लागी ना पानी
कुरसी खटिया के तुरवाई
निचवे बइठतानी

एतने देर मे सारा लोग
मुल्ला के पास पहुंचले
कवना कारण आगमन भईल
मुल्ला जी तब पुछले

सभे कहल कब्रिस्तान के
रचछा कईल जरुरी बा
कब्रिस्तान के चारो ओर
बाउंडरी भईल जरुरी बा

गांव के नाते निमन बाउर के
खोज खबर त लिहल जाव
ऊहां बाउंडरी बान्हे खातिर
कुछउ चन्दा दिहल जाव

मुल्ला कहले कब्र मे जे बा उ
कसहुं बाहर आई ना
बाहर वाला जीयत भर मे
कब्र के अंदर जाई ना

चोर चोराई ना गोसयां पुछी
कईसन खबर लिहीं
ह्रदयानंद विशाल बतावअ
काहें चन्दा दिही

लापरवाह मास्टर साहेब के उपर एगो भोजपुरी कविता

सुनी कहानी एगो देवरिया,
खामपार थाना के,
मासटर साहब रहलें एगो
पुरनका जमाना के,

कईले लापरवाही उ त,
जवाईनिंग के डेट से,
रोज उ पढ़ावे जास,
आधा घंटा लेट से,

एक दिन लेट भईल,
खोजत मे जुता,
एके गो रहे एगो लेके
चल गईल कुतता,

जहॉ रहे रेंगनी उ
पहुंच गईले ंहां,
देखले सब कपड़ा,
कतरले बा चुहा,

साईकिल उठवले त
माथा गरम बा,
नजर परल पहिया के
हावा खतम बा,

गईले बाजार बिच ,
रहे अकुताई
लंगड़ी ना रहे सोचले,
साईकिल कहां लगाईं,

लगले निहारे जब उ
पेंचर के दोकान पर
रेकसा खड़ियाईल एगो
परल धेयान पर

साईकिल के छुछी उपर रहे
रेकसा के छुछी निचे
ओही मे कस के
लगले पंप खिंचे

पांच पंप मरले तबले
रेकसा भड़क गईल
देखले त मासटर के
धोती सरक गईल

लगले निहारे अब त
दुख भईल दुगनी ,
लगहीं रेकसवा वाला,
खात रहे घुघनी

कहलस की सब ई
अब राउरे बाटे
टायर टयुब के दाम देदीं
नाहितअ बाउरे बाटे

पाई पाई भर दिहले
लईले नाही बहस,
आपन गवांवल अब
केकरा से कहस,

ह्रदयानंद विशाल जी
एही से त कहिले
डिवटी पर जाये के चाहीं
टाईम से पहिले

इहो पढ़ी: कवि ह्रदयानन्द विशाल जी जी के कुछ भोजपुरी रचना
ध्यान दीं: भोजपुरी कथा कहानी, कविता आ साहित्य पढ़े खातिर जोगीरा के फेसबुक पेज के लाइक करीं

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

4 × one =