केहू से कहिह मत | डॉ. आशारानी लाल

“केहू से कहिह मत” इ एगो चिट्ठी ह जवन लेखिका डॉ. आशारानी लाल जी अपना इया के लिखले बानी। डॉ. आशारानी लाल जी के चिट्ठी संग्रह के नाव ह काहे कहली-ईया

चिट्ठी क शकल में लिखाइल एह संग्रह में लेखिका डॉ. आशारानी लाल शिक्षा-साहित्य-संस्कृति का बीचे सेतुबद्धता कायम करे के कामयाब कोशिश कइले बाड़ी आ इहां के शिक्षक, साहित्यकार आ संस्कृतिकर्मी रूप एके संगे परिलक्षित भइल बा। ‘काहें कहली ईया’ के सार वाक्य इहे बा कि मनई चाहे कतनो तरक्की आ विकास भलही क लेख, बाकिर ओकरा अपना सुदीढ़ परिपाटी, संस्कृति आउर संस्कार से कबो कटे के ना चाहीं। ———- भगवती प्रसाद द्विवेदी

हम जेतना चिट्ठी लिखले बानी ओतने काफी नइखे, अबे त बहुते बात बाड़ीस जवना के फेरू दूसरा चिट्ठी में लिख के अपना ईया लोगिन के बताइव। हमरा अन्देसा रहल ह कि कहीं ई कुल चिट्ठी ईया लोगिन के कुफुत न बन जाव, एहिसे चुपा गइनी हँ । हमार ई चिट्ठी बाउर बाड़ीस कि नीक एके त अब रउरा भोजपुरिए पाठक लोग न बताइव-तऽ बताइव जरूर-इहे हमार विनती बा। रउरा लोग के मुँह ओरी हम जबाब खातिर ताकत रहब। ———- डॉ. आशारानी लाल

ए ईया तोहार उज्जर लुगा के पहिरावा, उज्जर बरौनी आ उज्जर बार जब इयाद आवता त एह मन में भक्क से अँजोर हो जाता। तू हमरा सोझा अपन गुड़गुड़ी लेले बइठल बाड़ इहे लउकता-तऽमन करता कि तोहसे लपिटा के खूब रोईं। ईया तू कहाँ चल गइलू आ कहाँ जाके लुकाइल बाड़ कि अब एह जमाना के तोहार धाहो नइखे लागत। केहू तोहके अब ईयाद कइल नइरवे चाहत । तोहार कुल बतावल बात पुरान-चिरान कहातारिस का कहीं तोहके इयाद कइला पर तऽ अब केनियो से अँजोर आवते नइरवे। चारों ओरी बात-बात में अँन्हेर आ घुप्प अन्हारे लउकता।

केहू से कहिह मत | डॉ. आशारानी लाल
केहू से कहिह मत | डॉ. आशारानी लाल

देख न अब अगर कवनो बेटा-बेटी से ओकरा बियाह के बात ओकर बाप-महतारी चाहे ओकर बड़ जेठ कइल चाहता तऽ ओह लोग के इहे जबाब होता कि-रउरा लोगिन ने काहे एकर फिकिर-चिन्ता धइले बा, वियाह होई नऽ। अब त जाति-पाँति के कवनो सवाले नइखे रह गइल-त सिनेमा में जइसे एक-दूसरा के दिल दिहल आ लिहल जाला, ओसहीं सब कुँआर बार लड़िका लड़की एक दूसरा के बहुत पहिलहीं से अपन दिल देत-लेत रहता आ ओही बीचे कबो केहू के वियाहो-शादी हो जाता। तऽ अब तूं ही बताव कि कवनो वियाह मे पित्तर-न्योतनी के जरूरते कहाँ बा आ एह बियाह खातिर तूं काहे इयाद कइल जइबू।

हमरा त इहे बुझाता कि तोहार मनवो अइसन वियाह देखे के कबो ना करी। तूंहूँ डेरात होखबू कि तोहरा उज्जर साड़ी लुग्गा में ओने तकला से कहिं न कहीं करिखा लाग जाई, एही से तू कहीं लुकाइल होइबू, चाहे अपन मुँह चोरवा के केनियो बइठल रहत होइबू।

ए ईया आजकाल के अइसन बियाह में तोहार बतावल कुल-खान्दान देखे आ समझे के त मोके केहू के नइखे मेंटात। लड़िका लोग अपना माइयो-वाप के कुल रसमो-रिवाज करे से बचा देता लोग। अपना घर परिवार के लोग के कवनो रसम-रिवाज के टोटरम करेके मोका अब केहू देते नइखे। पंडित बाबा अपन पतरा अबे उचारिए नइखन पावत कि बियाह के दिन आ तारीख कोर्ट-कचहरी मे तय हो जाता। कोहॉर कलशा देवे खातिर अपन आस लगवले बइठले रहतान आ कबो-कबो इहो पूछ लेतान कि मड़वा कहिया बा, तऽ नाउ आ धोबी लोग अपन जजमानी उजड़त देख के आगे बढ़ जाता आ जाके अपना सैलून आ ड्राई-किर्नस के दुकानी में बइठ जाता लोग। दुलहा नोह आ बार कटवावे सैलून में चलल जातान, तऽ उनकर किमती जोड़ा-जामा ड्राई-क्लिनर्स के घरे सजावल आ तहियावल जाता। एह कुल काम में एगो अच्छा आ ठोस पइसा के नेग ई ना आ धोबी कमातान।

त ए ईया अब त तूं बुझिए गइल होइबू कि एह जमाना के बियाह बिना पांडे-वाबा, कोहरा भाई, नउवा आ नउनिया आ धोबी-धोविनिया के अइला बिना, चाहे अवरी कवनो पवनी-पझारी के नाहियो रहला पर धूम-धाम से हो जाता आ वियाह के बाजा अपने बाज जाता। काहे कि अब एह वियाह में अग्नी-माता आ कुटुम्ब के भाई-बन्धु-परिवार चाहे आसमान में उगल ओह सुकवा-तारा के देखे के केहू के जरूरत पड़ते नइखे। अब आज के वियाह शादी कइल आसान हो गइल बा-काहे कि ई वियाह त अव जनम-जनम के बन्धन त बा ना।

अब तनी वियाहे के बेरा मेहरारु लोगिन ओरी देख-ईया। आज के मेहरारु हर रसम के गीत गावे जनते नइखी-काहे कि सब लोग बहुते पढ़ल लिखल रहता। अइसहूँ अब के मेहरारू के मोके कहाँ भेंटाता कि रसमो-रिवाज के लोग जानो। ई मेहरारु लोग त वियाहे के दिने दिन भर सजे-सजावे वाला दुकान में जेके पार्लर कहल जाला, ओहिजा लाइन लगा के बइठल रहता। ओह लोग के दिन बीत जाता, मेंहदी लगवावे, बार सेट करावे, आ अपना चेहरा के चमकावे में काहे कि एह लोग के या-त वराती वन के जाए के रहता चाहे वरातियन के अइला पर उन्हन लोग के साथे नाचे गावे का खाए-पीए अवरी मस्ती करे के मनसा रहता। सब कर एही में विश्वास वा कि जिनगी में आइल मस्ती के मोका छोड़े के ना चाँहीं।

ईया हो एगो अवरी बात बतावल चाहतानी। अइसे त एह बात के सब जानते बा, बाकी हमरो बिचार इहे वा कि अब बियाह-शादी में हमनियो के अपन पुरनका रसम-रिवाज सब छोड़ देवे के चाँहीं। अगर अइसन ना कइल जाई त एह जमाना में केहू कहाँ से ओखर-मूसर ले आई कि भड़वा में घराई, आ चाउर छंटाई। अब त मिक्सी जवन घर-घर के चउका के सिंगार बनल बा ओके छोड़ के सील आ लोढ़ा केहू कहाँ पाई कि पित्तर नेवतनी करी आ लोढ़ा से दुलहा परिछी। मानतानी कि सिललोढ़ा कहीं जाके खोजलो जाई त बैल के कान्हा पर के जुआठ त कहीं केहू के घरे नाहिए भेंटाई। जुआठ ना रही त दुलहा चाहे दुलहिन के नहछू-नहान कइसे करावल जाई। एही सब बात से कहे के परता-ईया कि इहे बुझाता कि तोहरा जमाना में अब घून लाग गइल बा। ई सब मजबूरी बा, जवन तोहके हम बता दे तानी

आज विज्ञान आ मशीन के जमाना आ गइल बा, त अब तुहूँ अपन सोच बदल द। कुल नया-नया बात देख के हँसत-हँसावत रह, तबे तोहरो मान जान बनल रही।

साँच पूछ त हमरा कहे के ईबा-ए ईया-कि अब तू केहू के कबो रोकिह ऽ टोकिह मत। जानतारु न कि किचड़ में ढेला फेंकला से छींटा अपने उपर परेला। तोहार पुरनकी बतिया केहू के सोहाई ना। अइसनो केहू-केहू होई कि चाहे तोहके ढ़केल दी चाहे तोहार फोटउवो के फाड़ के फेंक दी। एही से कहतानी कि अपन इज्जत अपना हाथ में राखे के चाँही।

ईया हम जानबूझ के तोहार पुरनकी बतिया केहू के कबो ना बताइलाँ कि अब लोग के मशीनी अक्किल बुद्धी ढेर हो गइल बा, बतावे के कवनो जगह केनियो रहिए नइखे गइल। हमरा इहो चाहीं कि अब तोहरा के हम भुलवइए दीं-एही में हमरो भलाई बा । तोहके ई चिट्ठियो हम चोरवाइए के लिखतानी । केहू से कहिहऽ मत ।

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