लोक गीत गाईं : डॉ. चम्पा देवी

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डॉ. चम्पा देवी का जनम 22.6.1941 के ग्राम अमहरा, पटना में भइल रहे। इहाँ के लोकगीत के बढ़िया गायक बानी! इहाँ के मुख्य रूप से मगही भाषी रहीं, बाकिर भोजपुरी क्षेत्र में विवाह के कारण भोजपुरी के लेखक बन गइनी! इहाँ के एगो सफल ‘स्त्री रोग विशेष’ डॉक्टर बानीं। इहाँ के मुख्य रचना  गाँवन के जगाई जा  निबंध संग्रह बा। ई संग्रह 1976 में छपल रहे। ई पाठ एही संग्रह से लीहल गइल बा।

लोक गीत गाईं : डॉ. चम्पा देवी
लोक गीत गाईं : डॉ. चम्पा देवी

गाँवन के बोली में, लोक भाषा में; जुग जुग से, समय-समय पर, जवन गीत गवात चल आइल बा, ओकरे के लोक गीत कहल जाला। अपना देश में रंग-रंग के बोली, रकम-रकम के भाषा बोलेवाला लोग बाड़े। अपना बिहार राज में भोजपुरी, मगही, मैथिली, बज्जिका, अंगिका आउर-संथाली आदि बोली भाषा बोलेवाला इलाका बा।

बिहार राज में भोजपुर, रोहतास (आदिवासी छोड़ के) सारन (छपरा), सीवान, गोपालगंज, पुरुबी चम्पारन, पच्छिमी चम्पारन, मुजफ्फरपुर के पच्छिमी भाग, आधा हजारीबाग, राँची जिला के कुछ भाग, पलामू अवरु उत्तर-परदेश में बलिया, देवरिआ, गोरखपुर, जौनपुर, आजमगढ़, बस्ती, गाजीपुर, बनारस, मीरजापुर जिला आउर मध्ध-प्रदेश के कुछ भाग में करीब चउआलिस हजार वर्गमील तले भोजपुरी बोलेवाला लोग पसरल बा। करीब पांच से छव करोड़ का बीच के जनसंख्या के लोग भोजपुरी बोलेला। इहे खांटी भोजपुरी इलाका के साधारन परिचय भइल। दुख के साथ कहल जा सकेला कि एह इलकन के भारी-भारी विद्वान लोग हिन्दी भाषा में महान स्थान बनावल, बाकी अपना भोजपुरी लेखा धनी, सम्पन्न बोली में रचना करे में ना जाने कवन मान-हानि के भय रहे ? हर्ष के बात बा कि आज-काल्ह एकरा पऽ कुछ नेह आइल बा।

भोजपुरी अतना रूचिआवन, भरल-पुरल अवरु धनिक भाषा वा कि एकरा के सुनते-सुनते बोले के मन करे लागेला! इहे कारन बा कि भोजपुर के जवान सेना-सिपाही, कल-कारखाना के इलकन में जहाँ-जहाँ गइले, अपना भाषा के कायम रखले अवरु ओहिजा के लोगन पऽ एकर असर डाल के भोजपुरी बोलले एहतरे भोजपुरी के शब्द हर हालत में, हर समय पऽ, हर हाव-भाव के परगट करे खातिर अपना-आप मे पूरन बाडेसन।

ग्रियर्सन साहेब भोजपुरी, मगही अवरु मैथिली तीनों के बिहारी-बोली के नाँव से इआद कइले बानीं। एह तीनों भषवन के संबंध एके परिवार लेखा बा। मगही अवरु भोजपुरी के सनेह तऽ मेहर-मरद लेखा देखल जाला। खाली इची भऽ के कीरिआ पद में अंतर होला।

बिहारी बोली के एगो झाँकी देखीं।

भोजपुरी में कहल जाई- ‘‘सुनतानी जी! रावा इची बोलीं ना ? का करतबानी ?”
मरद कहीहें- “का कहतारू! देखत नइखू कि काम में बाझल बानीं।”
इहें बात मगही में- ‘सुनइत न ही जी! अपने तनी बोलू न ?”
मरद कहतन- ‘का कहिथी ? देखित न ही कि काम करीत ही।”
मरद कहतनकहिथी इहे बात मैथिली में- “सुनइछी जी! अहाँ तनी बाजु न ?
मरद कही हे- ‘की कहिछी! देखइत नइछी कि काम करइछी”

एही तरे एह बोलिअन में लोक गीतन के भी परंपरा एक-दोसरका के साथ-साथ मिलते-जुलते बा, सगरे बीध-बेवहार, चलन अवरु समय के अनुसार गीतवन में समानता बा। मगही, मैथिली, अवरु भोजपुरी तीनों इलकवन के गीतगवनी लोग तनी भऽ के अंतर कके एके गीत के अपना-अपना बोली के अनुसार अपना-अपना भासा में जोर-जोरि के गावेली। ये लोग के भोजपुरी में ‘गीतगवनी”, मगही में ‘गीतहरिन” अवरू मैथिली में “गाइन” कहल जाला। तीनों में कवनों के ओछ कहल आपन छोटापन बा। बाकी अपना नइहर के भाषा मगही के छोड़ के हम ओहि तरे ससुरा के भाषा, भोजपुरी के बखान करतबानी, जइसे सब अवरतन के ससुरे के चीज पऽ अधिकार हो जाला, आपन होला।

ई बड़ी मजदार, लोचदार, ओजदार, रसदार, भरल-पूरल, अवरु रुचि आवन भाषा बा। एकर भारी खूबी ई बा कि कठोर बोले खातिर पथलो ले ठाँय-ठाँय होला। ओहितरे मधुर बोले के बेरा मिसिरिओ ले मीठ। जइसे- “मनबु कि ना, लउरिन ढेढा देव। अवरत हऽ कि फेंकारिन” नीक से बोले के होई तऽ“मनबू ना होऽ। जे कुछ करत बानीं, सब तोहरे खातिर हूँ करत बानीं। काहे रीसिआइल बाडू ? साफ-साफ कहऽ, तनी बिहँसत रहऽ।” इजत करे के होई तऽ- ‘सुनतानीजी! रावाँ बानी तऽ हमार परान बा। जिअत बानीं तऽ जहान बा।”

अब आईं लोक-गीत के ऊपर विचार कइल जाव। लोक गीत लोक कंठ से निकसल लोक भावना अवरु परंपरागत संस्कृति के रछ्या करेवाला एगो उद्गार हऽ। एकरे में लोक जीवन के इतिहास छिपल रहेला। लोक गीत के उतपत्ति के दूगो परधान कारन बा- मन के उद्गार (भावातिरेक) अवरु का

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