लोककलाकार भिखारी ठाकुर जी के प्रतिनिधि रचना : बेटी विलाप

लोककलाकार भिखारी ठाकुर जी
लोककलाकार भिखारी ठाकुर जी

गिरिजा-कुमार!, करऽ दुखवा हमार पार,
ढर-ढर ढरकत बा लोर मोर हो बाबूजी।

पढल-गुनल भूलि गइल,समदल भेंड़ा भइल,
सउदा बेसाहे में ठगइल हो बाबूजी।

केइ अइसन जादू कइल, पागल तोहार मति भइल,
नेटी काटि बेटी के भसिअवल हो बाबूजी।

रोपेया गिनाई लिहल,पगहा धराई दिहल,
चेरिया के छेरिया बनवल हो बाबूजी।

साफ क के आँगन-गली, छीपा-लोटा जूठ मलि,
बनि के रहलीं माई के टहलनी हो बाबूजी।

गोबर-करसी कइला से, पियहा-छुतिहर घइला से,
कवना करनियाँ में चुकली हों बाबूजी।

बर खोजे चलि गइल, माल लेके घर में धइल,
दादा लेखा खोजल दुलहवा हो बाबूजी।

अइसन देखवल दुख, सपना भइल सुख,
सोनवाँ में डलल सोहगवा हो बाबूजी।

बुढऊ से सादी भइल, सुख वो सोहाग गइल,
घर पर हर चलववल हो बाबूजी।

अबहूँ से कर चेत, देखि के पुरान सेत,
डोला काढ़, मोलवा मोलइह मत बाबूजी।

घूठी पर धोती, तोर, आस कइल नास मोर,
पगली पर बगली भरवल हो बाबूजी।

हँसत बा लोग गॅइयाँ के, सूरत देखि के सँइयाँ के,
खाइके जहर मरि जाइब हम हो बाबूजी।

खुसी से होता बिदाई, पथल छाती कइलस माई,
दूधवा पिआई बिसराई देली हो बाबूजी।

लाज सभ छोड़ीकर, दूनो हाथ जोडीकर,
चित में के गीत हम गावत बानीं हो बाबूजी।

प्राणनाथ धइलन हाथ, कइसे के निबही अब साथ,
इहे गुनि-गुनि सिर धूनत बानी हो बाबूजी।

बुढ़ बाड़न पति मोर, चढ़ल बा जवानी जोर,
जरिया के अरिया से कटल हो बाबूजी।

अगुआ अभागा रहे बड़ा मुँहलागा रहे,
पूड़ी खाके छूड़ी पेसि दिहलसि हो बाबूजी।

रोबत बानी सिर धुनि, इहे छछनल सुनि,
बेटी मति बेंचक दीह केहू के हो बाबूजी।

आपन होखे तेकरो के, पूछे आवे सेकरो के,
दीह मति पति दुलहिन जोग हो बाबूजी।

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