हरेश्वर राय जी के लिखल लूटीं लूट मचल बा

लूटीं लूट मचल बा सगरो
लूटीं लूट मचल बा।

बाढ़ लूटीं, सूखा लूटीं
राहत के लूटीं मिठाई,
भूख लूटीं, पियास लूटीं
लूटीं थोड़की महंगाई।

वोट लूटीं, नोट लूटीं
लूटीं चकाचक नारा,
रैली लूटीं, रैला लूटीं
गटकीं देशी ठर्रा।

राज लूटीं, लाज लूटीं
लूटीं तनिका मह्मारी,
जात लूटीं, पाँत लूटीं
लूटीं मौत बीमारी।

दिल्ली लूटीं, पटना लूटीं
लूटीं छपरा आरा,
गोर लूटीं, करिया लूटीं
लूटीं दखिन दियारा।

पगड़ी, चूड़ी, साड़ी लूटीं
लूटीं गुलाबी वादा,
लूटीं सभे लूट मचल बा
नर होखीं भा मादा।

डॉ. हरेश्वर राय, सतना, मध्य प्रदेश

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