लुतुकी – लमहर जिनगी के लमहर अनुभूति

लुतुकी
लुतुकी

लुतुकी भोजपुरी साहित्य – जगत के में जरावल गइल ओह जोत के नाम, जवन बहुते कम लोग जरइले बाटे।

दीयट त रहले रहे आ दीया भी। बाकि दीया के बाति से अगिआये ओला लुतुकी ना रहे। दीयट पर दीया कवना काम के कि ओकरा बाति में अनमोल चीझ लुतुकिये ना होखे। तन में मोल साँस – प्रान के होला।

तसहीं लुतुकी के। लुतुकी बिना सब फुसार। सेही कमी महसूस के हृदय में उमगल भाव पाँच सात पाँच के बन्हन में बान्ह के हुलस के हाथे विभिन्न विषयन प मजगूत पकड़ के साथे डॉ0 शारदा पाण्डेय जी सहुर के लुतुकी प्रस्तुत कइले बानीं ।

विद्या शंकर विद्यार्थी जी
विद्या शंकर विद्यार्थी जी

समीक्षा नारी के कइल जाव कि लुतुकी के आकि चिनगारी के। इहे नइखे बुझात। एह बदलाव के जुग में ( समय में ) एतना नू बदलाव हो गइल बा कि बेशी से बेशी लोग चिनगारी से ही परिचित बाटे आ भोजपुरी के माटी में उपजल विरासत के शब्द लुतुकी से अनभिग हो गइल बाटे।अइसन बात एह से कहे के परता कि नयका लहू के लोग जे अंगरेजी के मिनिंग रट लेताटे आ माई के दूध के संगे सिखावल भाखा के अभिव्यक्ति नइखे दे पावत। का ई महतारी के दिहल भाखा के घोर अपमान, अनादर आ उपेक्षा नइखे ।

जदि जिज्ञासा बा जाने के त जान लिहीं जइसे आज काल्ह भागम भाग के दौर में लोग मोट बड़ विधा के साहित्य से समयाभाव में कटल चाहता बाकि कटे के कमी भी खलता ओकरा। एह से एकरा के कटल ना कहल जाई। पिया परदेस चल जालन। उनुकर इयाद सतावत रहेला आ आँख उन्हुका आवे के बाट जोहत रहेला, रहेले एकदम बिरह में बेचैन आ अकुलाइल।

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अदिमी संगे परछाही भी चलत रहेला। माई से मिलल गुनगर भासा के लगाव राखहीं के परी। तबे नू लुतुकी के प्राक्कथन में सुप्रसिद्घ साहित्यकार भगवती प्रसाद द्विवेदी जी जवन ना जानकारी देबे के तवन दिहले बानी। कहीं चुक नइखीं कइले, उहाँ के। आ आपन बात में कवयित्री डॉ0 शारदा पाण्डेय जी तह कइसे उघरल के बात खोलले बानीं।

लुतुकी के श्री गनेश माई सुरसती के वंदना से भइल बा। जवना में अपना पाले कुछो ना होखे के बलुक माइए लागे सब होखे के बात बड़ी ढंग से कहल गइल बा आ मांग लिहल गइल बाटे मुँहे – मुसकान। ई साधारन चीझ ना बलुक चातुर्य भाव हउए।एह से अंदाज लगावल जा सकेला कि मध आ अंत कइसन सोहावन होई। पूरा बोरा के चाउर के थाह बानगिये न देला।

लुतुकी बारह कविता के संग्रह बिया आ हाइकु में सजल धजल।एगो हाइकु खतम होखता कि दोसरका के पढ़े जाने के जिज्ञासा जाग उठता। कवना के बड़ कहल जाव छोट कवना के अपराधे बिटोरला के बराबर बा। भाव भी ओसहीं बनल बा आ बन्हन भी ओसहीं। कहीं घसकाव नइखे । चौबीस करेट सोना के चौबीसे कहल जाई। बाकि हँ ‘देश चिंता ‘ पेज उनचास क्रमांक 432 से 438 के हाइकु संग अउर आउर प्रेस ओला अइसन इहो प्रेस छपाई छोड़े के खेल से बाज नइखे आइल।

लुतुकी
लुतुकी

अध्याय 2 में मन – दमके के बात बेलकुल सांच बाटे। बरतन के छोड़ दिहला पर काई के मौका मिलेला आ मन से काम ना लिहला प असकतिआये। ई दूनों के हमला के घात नइखे भइल । जिनगी में – बिकलता सहित सच्चाई के मार्मिक चित्रण – कब सोचनी / आपन सांसो होई / भारी ढोवे में ? उकेराइल बा। पानी के धार / पत्थर डुबावेला / करे चिक्कनो। दर्शन के समझदारी के उक्ति कढ़ावल गइल बाटे। अध्याय 5 प्रकृति के हाइकु – नहाला जग, आ राति पारेले में अभिव्यक्ति उच्चकोटि के बिया। होली, राजनीति, देश चिंता, अन्ना के सत्याग्रह, विविध आ विश्वास सहित कामना के कवनो हाइकु बेअसरदार नइखे ।

सब मिला के इहे कहल जाई कि डॉ0 शारदा पाण्डेय जी के ई लमहर जिनगी के लमहर अनुभूति बा आ बूँद में समुन्द समाये के प्रयास भी सुफल। कामना बाटे अइसन अनमोल नीधि सभे अपनावे।

प्रकाशक – तख्तोताज 105 एफ /4 ॅ गायत्री नगर इलाहाबाद । जवन
विद्या शंकर विद्यार्थी

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