महेन्दर मिसिर

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पुरबी सम्राट महेंदर मिसिर
जन्मतिथि – 16 मार्च 1886
पुण्यतिथि- 26 अक्टूबर 1946

महेन्दर मिसिर मिश्रवलिया (नैनी, छपरा) के रहने वाले थे। मिसिर जी की शिक्षा दीक्षा तो बहुत नहीं हुई थी परन्तु निरन्तर लोकचित्त और भोजपुरी भाषा से जुड़े होने के कारण उनकी रचनाओं में मार्मिकता बहुत थी। मिसिर जी रसिक स्वभाव के कला प्रेमी थे।

महेन्दर मिसिर
महेन्दर मिसिर

लोक-नृत्य एवं लोकगीत में इनकी गहरी दिलचस्पी थी। इनके गीत बहुत सरस, सुन्दर और प्रेममय होते थे, इसलिए लोक में बहुत जल्दी प्रचलित भी हो जाते थे। इनके मधुर और मार्मिक गीतों का प्रचार छपरा और आरा की वेश्याओं द्वारा भोजपुरी क्षेत्र में खुब किया गयागहरी राग चेतना से सम्पन्न होने के कारण ये गीत सुनने वाले को बहुत प्रभावित करते थे।

सन् 1920 के लगभग इनकी कविताएं शाहाबाद, छपरा, मोतीहारी, देवरिया आदि जिलों में प्रेम से गाई और चाव से सुनी जाती थीं। इन्होंने अनेक तर्जा के गीतों की रचना की है। इनकी रचनाओं में ‘मेघनाद बध’ ‘महेन्द्र मंजरी, ‘कजरी संग्रह’ जैसी कृतियों के अतिरिक्त रामायण का भोजपुरी अनुवाद भी सम्मिलित है –

एके गो मटिया

एके गो मटिया के दुइगो खेलवना
मोर सँवलिया रे, गढ़े वाला एके गो कोहार
कवनो खेलवना के रंग बाटे गोरे-गोरे
मोर संवलिया रे, कवनो खेलवना लहरदार
कवनो खेलवना के अटपट गढ़निया
मोर संवलिया रे, कवनो खेलवना जिउवामार
माटी के खेलवना एक दिन माटी मिलि जइहें
मोर सँवलिया रे, आखिर माटी होइहें बेकार,
कहत महेन्दर मिसिर, अबहू से चेतऽ
मोर सँवलिया रे, मानुष तन मिले ना बार-बार ।

राग कीन्हों रंग कीन्हों, चातुरी अनेक कीन्हों
संग आ कुसंग कीन्हों लागे हाथ झोली में
सास्तर की पुरान पढ़े भाषा सब देसन के
विजय पत्र लिहलों जाई देस-देस बोली में
महल आ अटारी तइयारी सब भांति कीन्हों
अइसे ही बितायों निसिबासर ठिठोली में
द्विज महेन्दर घोड़ा रथ हाथी क पीठ चढ़ि
अन्त में चढ़ेंगे आठ काठ की खटोली में ।

हमनी के छोड़ि स्याम गइले मधुवनवों से, देइ के गइले ना
एगो सुगना खेलवना, राम देइ के गइले ना
हम विरहिनियाँ के जियते जरवले से, देइ के गइले ना
दिल में विरहा के अगिया, राम देइ के गइले ना
उनहीं कारन हम लोकलाज छोड़नी से, होइए गइले ना
स्याम गुलरी के फुलवा, राम होइए गइले ना
बंसियाँ बजाके स्याम पगली बनवले से, फसए गइले ना
ओहि कुबरी का सँगवा, राम फसिए गइले ना
बालपन के नेहिया भुलवले कन्हइया से, तेजिए गइले ना
स्याम भइले निर्मोहिया, राम तेजिए गइले ना
कहत महेन्दर स्याम भइले निरमोहिया, से मुलिए गइले ना
मोरा नान्हें के पिरीतीया स्याम भुलिए ‘गइले ना ।

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