माई के अंचरा मे

Dr. Rabi Chaurasiya
Dr. Rabi Chaurasiya

लुकाके देख अंचरामे, माई के बबुवाँ पजरामे।
मिलेला सकून केतना, माई के बोली डटलामे।।

माईके ममता का जानी, जे बोतलके दुध पियले बा।
बिना माईके छत्रछाँव मे, जे बचपन घुटघुट जियले बा।।

सायद ओकरो बाटे माई के ममताके बन्धु मलाल।।।
तबही त साँवनके रिमझिम मे सुखल बाटे गाल।।।।

अपने माहुर खाई माई, अमृत बरसावेली।
मिलेला हियाके ठण्डक, छतियाँ लगावेली।।

माईके परतर एह जगमे के कर पाई?।।।
माईके आगु सगरमाथा बौना पर जाई।।।।

माई त बस ममताके भण्डार लुटावल जानेली।
सन्तानके सुख शान्ति भगवानजीसे माङगेली।।

अपना खातिर कहवाँ कबहु कुछवो माङगेली।।।
सन्तान जब देवे दुःख दर्द, हँसीके सह जाली।

कभी कभार बनके लोरवाँ, आँखियाँसे बह जाली।।
सोचस ना कुभाला कबहु, जियाके टुक्रा खातिर।।।

अपने शूलिपर चढस निश दिन माई माकिर।।।।
माईके ममतापर नाही लागल आजुले दाग हो।

माईके कहवाँ कबहु जरा पवलस तपत आग हो।।
माईके ममता जेतने धधकत अगियाँमे परे।।।

सोना निहन ओतने मिन्टे मिन्टे निखरे।।।।
सोनवाँसे भैयां हो सुचमुझ कुण्दन बने।।।।।

डा. रबि भूषण प्रसाद चौरसिया

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