नाच भिखारी नाच भोजपुरी कि पहली फिल्म जो पहुंची इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ़ इंडिया में

गंदगी और अश्लीलता का प्रायः बन चुकी भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के लिए ये अच्छी खबर है कि नाच भिखारी नाच भोजपुरी कि पहली फिल्म जो पहुंची इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ़ इंडिया में, टीम जोगीरा इसके लिए जैनेंद्र कुमार दोस्त और उनकी टीम को बधाई देती है

छपरा या भोजपुरिया समाज ही नहीं बल्कि सभी बिहार वासियों के लिए गर्व की बात है कि International Film Festival of India (Goa) में पहली बार किसी भोजपुरी फ़िल्म ने मजबूती से Indian Panorama में अपनी जगह बनाई है।

वो समय आ गया है भिखारी बाबा अब यूपी, बिहार, बंगाल या यूं कहें कि भारत से आपका नाम निकल कर पूरी दुनिया में फैल रहा है एवं विद्वान लोग आपके सामने नतमस्तक हो रहे हैं।

भारत के 49 वे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह, गोवा केभारतीय पैनोरमा में दिखाई गई जैनेंद्र कुमार दोस्त और शिल्पी गुलाटी की भोजपुरी फिल्म ” नाच भिखारी नाच ” भोजपुरी के शेक्सपीयर कहे जानेवाले महान लोक कलाकार – नाटककार भिखारी ठाकुर ( 18 दिसंबर 1887- 10 जुलाई 1971) को उनके जीवित बचे चार कलाकारों के माध्यम से एक सिनेमाई श्रद्धांजलि है। इन्ही में से एक रामचंदर माझी (बड़े) को हाल ही में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला है । 92 साल की उम्र में रामचंदर माझी का लौंडा नाच कई नये मिथक गढ़ता है ।

शिवलाल बारी (75 ) , लखीचंद माझी (80 ) और रामचंदर माझी छोटे (70) ने दशकों भिखारी ठाकुर की नाच मंडली मे काम किया । फिल्म इन चार कलाकारों की यादों, उनका वर्तमान जीवन और भिखारी ठाकुर के नाटकों की ठेठ प्रस्तुतियों पर आधारित है ।

जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय के स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स में पाँच साल के सघन शोध के बाद जैनेंद्र कुमार दोस्त यह फिल्म बना सके है । वे अपने सिनेमैटोग्राफर उदित खुराना के साथ इन चार कलाकारों के गाँवों और भिखारी ठाकुर के नाटकों के लोकेल मे गए। कैमरा आमतौर पर साइड एंगल्स शॉट लेता रहा इसलिए सामने से कोई चीज सीधी नही दिखाई देती। बहुत सारी कहानियाँ और इतिहास क्लोज अप शॉट्स कह देते है । 1920 से शुरू होकर आजतक की ये दास्तानें कई पीढ़ीयों से गुजारती है । यह भी पता चलता है कि इन कलाकारों का अपना भरा पूरा परिवार है पर इनकी पत्नियों और बच्चों में कभी इनका नाच नही देखा । भिखारी ठाकुर के सबसे अधिक खेले गए नाटक ” बिदेसिया ” ” बेटी बेचवा ” और “गबर घिचोर ” को आज भी कई मंडलियां खेल रही है पर उनमें औरतों का चरित्र अब पुरूष नही निभाते ।

शिवलाल बारी 75 साल की उम्र में भी नाटक कर रहे है । फिल्म मे वे कहते है कि उन्होने बिहार के मुजफ्फरपुर में अपनी आँखों से शादी के लिए बच्चियों (बेटियों) की मंडियाँ सजते देखी है जिसपर भिखारी ठाकुर ने ” बेटी बेचवा” नाटक लिखा । इसमे पशुओं की मंडी की तरह पिता ज्यादा पैसा देने वाले अधेड़ – बूढ़े को शादी के लिए अपनी बेटी दे देता था । भिखारी ठाकुर नीची जाति के थे।उन्हे उँची जातिवालों का विरोध सहना पड़ा था।

रामचंदर माझी छोटे (70) एक जगह भिखारी ठाकुर की बात याद करते है। भिखारी ठाकुर कहते थे कि यदि कोई उँची जातिवाला आपको बैठने के लिए कुर्सी या गद्दा दे तो भी आप नीचे चटाई या दरी पर बैठिए । आप जितना नीचे बैठेंगे उतना ही जीवन मे उँचाइयों तक जाएँगे। शिवलाल बारी के लिए नाच भगवान है । नाच से ही उन्होने बच्चों की शादियाँ की , घर चलाया ।
दिल्ली मे जब रामचंदर माझी बड़े 92 साल मे लौंडा नाच करते है तो उनकी तुलना श्रीदेवी और अमिताभ बच्चन से की जाती है । वे मंच से शरमाते हुए लालू प्रसाद यादव का नाम लेते है जिन्होने उनकी सदा मदद की।

दरअसल भिखारी ठाकुर की नाट्य प्रस्तुतियों की रिकार्डिंग दुर्लभ है । जो कुछ बचा है वह उनके कलाकारों में बचाया है । यह फिल्म एक विलुप्त होती लोक कला को बचाने की कोशिश भी है । भिखारी ठाकुर पर हृषिकेश सुलभ का नाटक “बटोही ” और संजीव का उपन्यास ” सूत्रधार” हिंदी साहित्य जगत में काफी लोकप्रिय है , पर एक मुकम्मल फीचर फिल्म की जरूरत अभी भी बनी हुई है ।

रउवा खातिर:
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