भिखारी ठाकुर जी पऽ लिखल संजय सिंह जी के एगो आलेख नचनिया

संजय सिंह जी
संजय सिंह जी

18 दिसम्बर 1887 । देश सुनुगत रहे । बिहार 1857 से गंगा किनारे जरत चिता के आगि में आपन भविष्य देखत रहे । रोज कुछ माई बिन बेटा के हो जा सन । कुछ बहिनन के कपार पर से भाई के कलाई उठ जाव । कुछ सुहागिन के सेनुर पोंछा जाव । गंगा किनारे के चिता के आग कबो मद्धिम ना पड़े । 30 बरिस हो गइल रहे क्रांति के । कुँवर सिंह के कथा एक एक जबान पर नाचत रहे । गांव गांव में क्रांति आ आजादी के बात होखे । अइसने समय में कुतुबपुर दियरा में जनम भइल भिखारी के । जनमते हाथ मे छूरा आ कइंची मिल गइल । देश अंग्रेजन से लड़े वाला योद्धा जोहत रहे ।

बिहार ढोंग आ कुरीतियन से लड़े वाला नचनिया दिहलस । नचनिया – सांस्कृतिक योद्धा- भिखारी ठाकुर । इहे नचनिया मर चुकल उम्मेद में उल्लास के बिया बोवलस । डेरा के अपना पलानी में सिपुटल लोगन के पंचलैट के रोशनी में खींच लियाइल । ओहि रोशनी से निकलल रहे राह समाज सुधार के । राजा राम मोहन राय आ ईश्वर चंद्र विद्यासागर जवन काम गंगा सरजू के किनार पर ना कर सकल लो, भिखारी चुटकी बजा के क दिहलन । घरे घरे जा के ना । अपना लगे बोला के । आपन नाच देखा के । आपन नौटंकी देखा के ।

भिखारी ठाकुर
भिखारी ठाकुर

जहँवा नाच नधाव । कोस भर ले हाला हो जाव । गांव के गांव खाली । “बिदेशिया” के बिदेशी जब अपना प्यारी सुंदरी से कलकत्ता जाए के जिद करे नू त चोंप पकड़ के बइठल भुलेटना के रोंवा सीहिर जाव । ओकरा याद परे लागे दू दिन पहिले के बात जब अपना बिंदिया से कलकत्ता जाए के जिद पर अड़ गइल रहे । जइसे जइसे कथा आगे बढ़े उ डूबत जाव उतरात जाव । पूरा कलकत्ता देख लेव अपना आंख से । शहर के ताम झाम, ताश के खेला, रखेलिन के माया , मेहरारू के वियोग सब कुछ ओकरा सामने झलक जाव । नाटक खतम भइला के बाद उ रुकल ना । ओकरा गोड़ में जइसे बिजली के करंट लाग गइल होखे । सीधे अपना बिंदिया के लगे गइल । अँकवारी भर के करेजा फार रोआई रोवलस । जइसे जिनगी खतम होखे वाला रहे आज के बाद । लोर पोंछत बस अतने कह पइलस बिंदिया से- हम तोरा के छोड़ के कहीं ना जाएब….कब्बो ना जाएब ! कोस भर दूर भिखारी आपन गाजा बाजा समेटत मुस्की मारत रहले । उनका पता ना रहे कि आज एगो प्यारी सुंदरी के वियोग हर लेले बाड़े उ !

भाई बिरोध के खेला जइसहीं शुरू होखे । पुतुल काका के बहार आ जाव । नाटक खतम भइला के बाद महीना दिन ले कउड़ा बइठ के गांव भर के समझावत रहस । कवनो कुटनी के फेरा में मत रहिहs लो । ना त भिखारी बाबा के भाई बिरोध वाला हाल होई । देखलs लो नू – तीन गो भाई । आपस में भयंकर प्रेम । बड़का संत । छोटका बाछी । मझिला डाढ़ी में के झुलुआ । झुलुआ झुलल । मेहरारू के बात में आके भाइये के मार दिहलस । दू हिस्सा संपति के फेरा में जेलो गइल आ भाइयो गँववलस । एगो कुटनी के चक्कर में पूरा परिवार तहस नहस । गांव के कउड़ा से निकलल बात धुंवा बन के हर छप्पर पर जाव । कवनो खल चरित्र जइसहीं घर में आवे ई धुंवा ओकरा के छाप लेव । एह सब से अनजान भिखारी ठाकुर अपना अगिला नाटक के छंद लिखत रहलन ।

बेटी वियोग के पहिला मंचन रहे । बड़का घर में बेटी के शादी तय क के सुरेमन काका के मन हलुक हो गइल रहे । नाटक देखे चल दिहलन । चलत चलत काकी कहले रहली – हम जागले रहब । आएब त हमरो के कथा सुनाएब । महीना दिन बाद हमनियो के त बेटी वियोग झेलहीं के बा । नाटक शुरू भइल । कम उमिर के लइकी । चार गुना उमिर के दुलहा । बेटी दुलहा के झुलल चाम देख के चीत्कार उठतिया । बाबूजी के कान्ह पकड़ के विलाप क उठतिया – “चेरिया के छेरिया बनवलs हो बाबूजी !”

सुरेमन काका गमछा से लोर पोंछत दउरत रहलें । काकी जइसहीं किल्ली खोलली करेजा फार के रोवे लगलन । काकी अतने पूछले रहली -” का भइल ! ढेर रोआ दिहलस का बेटी वियोग !” काका कहले रहलन -“उ बेटी वियोग ना रहे रे बुचिया के माई ! बेटी बेचवा रहे । कुल खानदान आ पइसा रुपिया देख के हम अपना बेटी के बेमेल बियाह ना करब रे ! हमार आंख खुल गइल हो भिखारी बाबा ! बेटी के बियाह ओकरा लाएक बर से करब ! अपना चेरिया के छेरिया ना बनाएब ।” बिना कवनो हो हल्ला के मल्लिक जी गुहाटी के ट्रेन में चद्दर तान के सुतल रहलन ।

10 जुलाई 1971 के महान सांस्कृतिक लोक नायक भिखारी ठाकुर समाज के ठहरल पानी में ढेला फेंक के हमनी के बीच से विदा लिहलें । पुण्यतिथि के अवसर पर नमन बा भिखारी बाबा के । एगो अइसन योद्धा के जवन अपना गोड़ में घुंघरू बांध के अपने नाचल आ जकड़ल समाज के अपना ताल पर नचवलस ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

five + 7 =