प्रिंस कुमार ओझा जी के लिखल कुछ भोजपुरी रचना

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काहे ओराइल जाता बा पहचान
बदल गइल बाड़े सब इन्सान।।

सब खेल करावत बावे पइसा
मिल जात बाटे जइसा के तइसा।।

लोगवा त रहे सभे पहिले मिल-जुल
अब तऽ बढ़ल जाता बा बात फिजुल।।

बिलाइल जाता दिन पर दिन संस्का
बदलल जाता बा लोगवा के ब्यवहार।।

नइखे मिलत अब दही के भात
ना खियावे लोगवा बइठा के पात।।

नइखे जोतात अब तऽ बैलवा से हर
नाही लउकत बा कहीं फुस के घर।।

ओरा गइल बा बड़ छोट के लेहाज
नीचे तऽ भइल जाता बा सब समाज।।

बढ़ गइल अब चोरी डकइती
खाली माँगता अब फिरउती।।

डेगडेगे बढ़ल जाता खातरा
सब जगह होत बावे लफड़ा।।

प्रिंस हो अब होत नइखे बरदास्त
कब का होई इहे नइखे बुझात ।।

का करबऽ ऐतना कमाई
घरवा तुहू आवऽ ऐ भाई।।

रोअत बाड़ी घरवा में माई भौजाई
आसरा लगवले बहनिया भाई कब आई।।

भलही तू गइलऽ भइया दुर नूं हो
रहे सब केहू ओह घड़ी मजबूर नूं हो।।

प्रिंस कुमार ओझा जी
प्रिंस कुमार ओझा जी

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हमरो पुरा भइल मनवा के आस
तहरा बिनू लिआत नइखे सांस।।

दुनो भाई घरवा नूं रहल जाई
दर दोकान ऐहीजा कइल जाई।।

अब त ना होई कबो बुरा हाल
हर दम रहल जाई खुशहाल।।

पटी पटीदार तरक्की देखि जरबे करी
बढ़ल देखी के अब उ हहरबे करी।।

जग परोज में बहुत छुटत बा नेवता
बड़ी मुश्किल से पुजात बाड़े घर के देवता।।

केहूं दितऽ प्रिंस के समुझाई
घरवा आ जइतs ऐ मोर भाई।।

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अब सब छोड़ी किनाई अब लंहगा
गहना के आस छोड़ी सोना भइल मंहगा।।

नाही किनाई अब गरदनवा के हार
सब छोड़ी राजा किनदी ना ऐगो कार।।

सोना के पानी चढ़ावल जाय
कवनो नइखे दोसर उपाय।।

नाही किनाई कान के बाली
राजा रूपया बचाई खाली।।

रखल रखल बेकार होई गाहना
राजा मानऽ ना हमार काहना।।

दमवा त चढ़ल जाता रोजे आसमानवा
कइसे किनाई तहरो सिंगार के समानवा ।।

का करबू बनवाई ऐतना गाहनावा
मान जा तुहू प्रिंस के काहनावा।।

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जोधपुर से शाल बलमजी दिल्ली से ओठलाली।
मंगाई दिहीं जयपुर से चुनरिया लाले रंग वाली।।

सिल्कवा के सड़िया बनेला राजा हो आसाम
मिलेला ओहपर कइल सुनर सुनर काम।।

राजस्थानी लंहगा मंहगा ब्लाउज लागल जाली।
मंगाइ दीहीं कोल्हापुर से सैण्डिल हाई हिल वाली।।

गोरखपुर के बिंदिया चमचम धनबाद से बाली
मंगाई दीहीं नागपुर से नांरगी हाली हाली।।

रायपुर से कंगना बालेश्वर से बाला
छपरा मे मिले ला मोतियन के माला।।

हथुआ से हार ,हसुलिया सिवान वाली
मंगाई दीहीं बम्बे से मोबाईल नेट वाली।।

आरा से बिछीया गाजीपुर से गोड़हरा
मोतीझील से मेहदी मंगाई दिहीं कजारा।।

किरीम पाउडर मंगइति जिला बलिया
लागित खूबे भोरभोरे गोरे गोरे गलिया।।

पहिरी संवर के आइब तोहरे पंजरा
प्रिंस हो ओढ़ाइब तोहे आपन आँचरा।।

खुशी से नाची मनवा नेहिया बजाई ताली
मंगाई दीहीं आलता बंगाल लाल वाली।

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कहँवा से आइल इ सिसटम बफर !
खतम भइल जाता,पॉति के सफर ।।

लोगवा रहता हरमेश ताडातडी मे !
खा तालो खाना खडे हडबडी में !!

कहँवा खियावत बा लोग अब पूछ के !
बेसी बा कि कमी बा रउरा अउरी कुछ के !!

ना अब केहू चलावता पानी !
दिन दिन नाया नाया लउके कहानी !!

पुरी कहीं नइखे लउकत भर दउरा !
गीति मॉगर गारी सुनात नइखी गउरा

भाग दउड़ के सबकर होखता खाना
बूढ लइका नवहा मेहरारू मरदाना !!

नइखे मिलत भोज खाये के सुख
प्रिंस हो का करब भइल बड़ी दुख।।

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