प्रिंस कुमार ओझा जी के लिखल कुछ भोजपुरी कविता

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कंहवा बिला गइल दीया दियरखा
लउकत नइखे अब दियठ ताखा।।

भुलाइल जाता पहिलका दिन
एक दुसरे के बुझत लोग हीन।।

बैल रोकात ना कहऽ के हेव
खेत जोताय ना अवगार सेव।।

नइखे उड़त गांव मे अब धुरा
बइठले काम होखे सब पुरा।।

गांव होखे भा होखे शहर
सगरो बा बेरोजगारी के कहर।।

कंहवा भेजात बा अज्ञा बीजे
लोग तऽ खड़े खड़े लागल खींचे।।

सभ्यता मिटल जाता गांव से
वंचित लोग गछियन के छाँव से।।

दुअरा अब कूदे ना बाछी
सुनसान खरिहान आ गाछी।।

बोले ना लोग भोजपुरी भाषा
प्रिंस कइसे सुधरी एकर दाशा।

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बीतल होली तीज दसहरा।
पियउ कब ले रहबऽ तु बहरा।।

नियरा आइल पर्व दिवाली।
रहतीं तऽ रहित सुख खुशहाली।।

बीतिहें दिवाली आई छठ।
बतिया मानऽ पिया छोड़ि न हठ।।

आई पर्व गंग असनाना।
करिहे माई पितु संग नहाना।।

लागी ददरी छतर मेला।
भीड़ भाड़ में होई रेला।।

अक्षय नवमी पर्ब पुजाई।
अंवरा गाँछि बनि रसोई।।

मानि लऽ बतिया हमरो जाना।
छाड़ि द कइलऽ तुहूं मनमाना।।

खेती बारी दिन नियराई।
रहबऽ तबे गंहू बोआई।।

बिया बाल आ खाद किनाई।
*प्रिंस से कहऽ खेत जोताई।।*

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अब आईल दशहरा के पूजा।
मतारी बिनु कोई ना दूजा।।

घरे घरे भइया धराइल बा कलसा।
मइया पूरइहें भगतन के ललसा।।

नव दिन भजन होई नवरात में।
दसईं पुजाई मिली सुख गात में।।

मइया के कृपा जाने जहनवा।
अन्न धन सोना आ देली ललनवा।।

माई जी रउआ माया मयरिया।
दुअरा प भगता करे करजोरिया।।

नव दिन पूजनवा हो धूमधाम से।
लोगवा भजेला माई के निष्काम से।।

अंबे जी हरिना दुःखवा कलेसवा।
दुनिया के दिहिना सांति सनेसवा।।

हथवा में तेगा त्रिशुल गदाधारी।
शेरेवाली करेली शेर के सवारी।।

मइया के दुअरा प आसीस बँटाला।
जे केहे आवे लवटि के न जाला।।

*दीनहीन प्रिंसवा करेला गोहार।*
*माई जी पूरा करीं असरा हमार*

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बीतल कुवार पावन कातिक आइल
आजा परदेशी गॉवे छठ नियराईल !!२!!

अंगना दुआर घरवा सगरो लिपाता
पूजा के समान घरे घरे किनाता
तोहरा त आजुले ना इहो बुझाईल
आजा परदेशी गॉवे छठ नियराईल !!२!!

जोग सनजोग बनित घरवा जे अइतऽ
मथवा उठा के दउरा घाटे लेके जइतऽ
तीनि बरिस भखला भइल ना कोशी भराइल
आजा परदेशी गॉवे छठ नियराईल !!२!!

अम्मा जी कहतानी बाबु के बता दऽ
बात कके केहू तरेे प्रिंस के बोला दऽ
टिकट कटाल कहॉ बाड अझुराइल
आजा परदेशी गॉवे छठ नियराईल !!२!!

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