रमा शंकर तिवारी जी के लिखल भोजपुरी लघु कथा टेलिग्राम

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जइसहीं मोहन सीट पर बैठ गइलन रेलगाडी़ सीटी बजावत धीरे धीरे आगे बढे लागल …

रमा शंकर तिवारी जी
रमा शंकर तिवारी जी

“बाबुजी रउवा जल्दी से नीचे उतर जाईं ” कुछ उदास मन से मोहन अपना बाबुजी ( फुलेसर ) से कहलन.. फुलेसर भी जल्दी से डिब्बा से उतर के ट्रेन के साथे साथे आगे चले लगलन आ खिड़की से अपना बेटा मोहन के कई तरह के निर्देश भी देवे लगलन.. ट्रेन धीरे धीरे स्पीड पकडे़ लागल..

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फुलेसर भी ओकरा साथे भाग भाग के कोशिश कइलन कि सब कुछ आजे बता दीं लेकिन थोडे़हीं देर मे खडा़ होके हाँफे लगलन .. ट्रेन पुरा गति के साथ धीरे धीरे फुलेसर के आँख के सामने से दूर होत गइल .. फुलेसर भी चुपचाप खडा़ टकटकी निगाह से देखत रह गइलन .. पीछे के सारा दृश्य फुलेसर के आँख के सामने एगो सिनेमा अइसन घुमे लागल …

खुद फुलेसर के एको अक्षर से भेंट ना हs बाकि मोहन के पढावे लिखावे मे कवनो कसर ना छोड़लें.. पढ़ लिख के आज मोहन नौकरी करे सेना मे जब जाए लगले तब फुलेसर उनका के स्टेशन छोडे आईल रलs हन.. एगो बाप के बेटा के प्रति प्रेम के एह से बढके उदाहरण ना लउकल… ..

खैर उदास मन से धीरे धीरे घरे पहुँच के फुलेसर चुपचाप बिस्तर पर लेट गइलन आ कब आँख लाग गईल उनका पता भी ना लागल ….

दोसरका दिन फुलेसर सबेरहीं उठ के दुआर पर छोट मोट काम मे लागल रहलन तले राम औतार दूर से हीं जोर से आवाज देके कहलन ” अरे ओ फुलेसर .. तहरा बेटा किहाँ से टेलिग्राम आइल बा ” … टेलिग्राम के नाम सुनते हीं फुलेसर के धक्क से लागल … उ छाती पकड़ के बइठ गइलन आ जोर जोर से चिल्लाये लगलन ..” आरे बाप रे बाप ! हमरा बेटा किहाँ से टेलिग्राम आईल बा .. पता ना हमरा बबुआ के का हो गइल हो दादा … अभी परसवें तs बाबु के ट्रेन मे बैठा के अईनी हो दादा … ”

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फुलेसर के चिल्लाईल सुन के फुलेसर ब बाहर अइली आ उहो जोर जोर से चिल्लाये लगली …

” आरे माई रे माई .. हमार बबुआ कइसन बाड़न हो माई ..” दुआर पर एकदम कोहराम मच गइल …

फुलेसर आ फुलेसर ब दूनू बेकत एकदम लिख लोढा पढ पत्थल रहे लोग … टेलिग्राम के नाम सुनते हीं कवनो घटना के आशंका के डर के मारे दूनू बेकत चिल्लाये लागल लोग ..

चिल्लाहट सुन के फुलेसर के बहू चंदा भी बाहर आ गईली आ कारण पुछे लगली …जब उनका टेलिग्राम के बारे मे पता लागल तs उ टेलिग्राम हाथ मे लेके पढे लगली … पढ़ते हीं चंदा जोर जोर से हंसे लगली .. हँसत देख के फुलेसर उनकर मुँह ताके लगलन .. ” काहे बहू, हमार जान जाता आ तूँ हँसत बारू ” फुलेसर चंदा से खिसियाईले पुछलन …

चंदा हँसते हँसते कहली .. “मोहन ठीक से पहुँच गइल बारन … उनकर सब समाचार ठीक बा .. हमहीं मोहन से कहले रहीं कि पहुँचला के समाचार टेलिग्राम से भेज दीह ”
अतना सुनते हीं एकदम से कोहराम बंद हो गईल…फुलेसर आपन हाथ बहू के सिर पर रख के कहलन ..” खुश रह बेटी ..आज हमरा आपन बहू पे बहुत गर्व बा ..आज हमरा शिक्षा के महत्व समझ मे आ गइल … अशिक्षित भईल साँचहूँ बहुत बडा अभिशाप होला ..खासकर आजकल हर स्त्री-पुरूष के शिक्षित भइल बहुत जरुरी बा ..”

चंदा के आज अपना उपर बहुत हीं गर्व महसूस होत रहे …मन ही मन उ अपना माई-बाप के भी धन्यवाद कईली कि उनका के शिक्षित बनावे खातिर उनकर माई-बाप कवनो कसर ना छोड़ल लोग ….

रमा शंकर तिवारी ” भटकेशरी”

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