संघतिया | भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव

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परनाम ! स्वागत बा राउर जोगीरा डॉट कॉम प, रउवा सब के सोझा बा भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव “भानु” जी के लिखल संघतिया , पढ़ीं आ रउवा सब से निहोरा बा कि एह रचना के शेयर जरूर करी।

परम उदार उर प्यार से भरल रहे,
बोलिया मधुर मन-मोहिनी मूरत्तिया ।
सादा भेस-भूसा साढा रहन-सहन रहे,
चान के समान जोत जरत सूरतिया।
लेखक महान, हास निपुन कहानीकार,
सरस सुगम उच्च कोटि के कवितिया ।
आगर सरब गुन विमल विवेकशील,
भाग से मिलल “भानु” रहले सँघतिया ।।

पर उपकार हार हियरा हिलत रहे,
दुखिया के दुख देखि फाटि जात छतिया।
परला ५ केकरो सटत जाइ झट सेनी,
रहले गिनत नाहीं बड़-छोट जतिया ।
सुनते गोहार धाइ रहले जुटत जाइ,
रहत रहले कइले एक दिन-रतिया।
चांव के ना भुख सुख कइले मितल रहे,
होत ना विमुख कभी रहले संघतिया ।।

संघतिया | भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव
संघतिया | भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव

देह दुरबल बल साहस बेजोड़ रहे,
आहस लागत ना बोले में साँच बतिया ।
नीमनका सोझा सिर झकल रहत रहे,
सहल ना जात रहे कइल अनेतिया।
लुटत बहार उर भरल उमंग रहे,
मनवा मुदित नित डबल पीरितिया।
दुनिया सिहात “भानु” रहीं अगरात हम,
सगिनी सुधर पाइ जीवन-सँघतिया ।।

चितवे में हमरा रहत दिन-रात “भानु”
बिसरत छनो भ ना रहली सुरतिया ।
कमवा अरमव। के करत समय पर,
रहले तनिक ना करत असकतिया ।
वीतत समय रहे खुसिया का गोदिया में,
दिनवा हॅसत विहँसत रही रतिया।
पुरुब जनम के कमाई के मिलल फल,
रहले विमल “भानु” मिलल संघतिया ।

जवना रे देहिया के नेहिया से सींचि-सींचि,
सुधर बनावे के राखत रहले चेतिया।
भारी ना उठावे देत रहले जिनिस कौनो,
अपने से फींचे देत रहले ना धोतिया।
हथवा प हरदम रहले रहत लेले,
कहे के ना कौनो परत रहे बतिया ।
ओही ‘भानु” देहिया के नेहिया बिसारि कहु,
केकरा प छोड़ि चलि गइले संघतिया ।।

अब ले रहल ठीक कमी ना बुझइले रे,
होखे के ना आगहूँ बुझात बाटे खोतिया ।
देहिया आपन बाकी अपने रे दिन-दिन,
ठसकत जात बा बढ़ल असकलिया।
बल होत कम जाता मल के बढ़त कोप,
भोगे के बा बिझिला लिखल दुरगतिया।
लिखल करमवा के मेटे ना मेटवला से,
एहि से बुझाता छोड़ि गइले सँघतिया।

बिछुड़ि गइल जोड़ी बईठल हरवा रे,
पालो से अलग भइली जोड़िया के जोतिया।
जिनिगी के खेतिया के कमवा हो गइले ठप
जोतला बेगर खेत रहिहें परतिया ।
अन्नवा के दाना मुहे लगिहें कहां से आइ,
महंगी बढ़त जात बिया खुरफतिया।
भइले बेपानी पानी रोपलो में रहले ना,
पानी सब संग लेइ गइले संघतिया

शोभवा बढ़ाइ देत जाइ सम्मेलनवा के,
रहले पावत खुब सगरे इजतिया ।
मन-श्रोतागन देत रहले विमुग्ध कइ,
सुर में सुनाइ निज सरस कवित्तिया ।
गोलवा हँसाइ देत मेलवा लगाइ ‘भानु’
चेलवा बनाइ लेत रहले युवतिया ।
जोड़िया के चरचा रहल अब रही नाही,
खुटवा तुराई के परइले सँघतिया ।।

सुनले कथा ना भागवत गीता मानस के,
भुखले एकादसी ना कवनो बरतिया ।
जोग-जाप कइले ना गइले तीरिथ धाम,
लवले धेयानवा ना मलिके भभूतिया ।
बिना गेंठ जोरले कइले हो बेरथ जाला,
मनसा ना पूरे नाहीं मिलेली मुकुतिया ।
छोड़ि आधा अंगवा के झूठे “भानु” जंगवा में,
गंगवा नेहाये चलि गइले सँधतिया ।

जेकर सुकृति मान बरत मसाल अस,
करत अॅजोर बाटे साहित्त-जगतिया।
पढि-पढि लोगवा निहाल होत रात-दिन,
चरचा चलत हर घर में बा गीतिया।
घर के मुरूगिया के दलिया समान बुझि,
कइली इजतिया ना साहित्त-विभूतिया।
रहला प हिरवा के मोलवा ना बुझली रे,
गइला प सालता करेजवा सँघतिया ।

ध्यान दीहल जाव : इ रचना भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव “भानु” जी के लिखल किताब रंगमें भंग से लिहल गइल बा।

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