सरस सलिला माँ गंगा : मणि बेन द्विवेदी

आज हम अपना उ माई का बारे में बतावे जा तानी, जे हमनी के जनम त ना देली बाकिर यह धरती पर के मनुष्य जे भी जाने अनजाने पाप करम करेला, ओकरा पाप के नाश क के ओकरा के पाप से मुक्ति जरूर दियावेली।

रउआ सब अंदाज़ ज़रूर लगा लेले होखब कि हम कवना माई के महिमा वर्णन करे जा तानी। जी हाँ रउआ ठीक जननी उ हवी पाप विमोचनी भगवती भागीरथी माई गंगा जी के कहल जाला कि सूर्य वंश के राजा सगर बहुते बलवान धर्मात्मा, कृतज्ञ, गुणवान, आ बुद्धिमान रहले! बहुते सुनर आ सुरहुर बुद्धि के रहलें आ बलो बुद्धि ओतने रहे। अपना बल से अपना पिता के सब शत्रुअन के नाश कके सगरे धरती पर आपन राज स्थापित क लेहलें।

मणि बेन द्विवेदी जी
मणि बेन द्विवेदी जी

कहल जाला कि राजा सगर के साठ हज़ार एक पुत्र रहलें,बाकिर उ राजा सगर के दुर्भाग्य रहे की उनके सगरी पुत्र नालायक, व्यविचारी, आ दुराचारी रहलें सं,खाली हर समय ऐशो आराम आ दुर्व्यवहार में ही रह सन। आ केहू जो पूजा आराधना,जप.तप करे त जा के ओहमे व्यवधान डाल सन। साधू सन्यासी लोग के चहेट चहेट दउरा दउरा के मार सन,माने एकदम राक्षस प्रवृति के। अब त चारो ओर त्राहि माम मच गइल। देव लोग आ धरती के लोग सब लोग तबाह तबाह हो गइल।

एक बार राजा सगर बहुत बड़ा अश्वमेध जग के अनुष्ठान कइलन सब देवता लोग वो दुष्ट सगर पुत्र से परेशान रहे लोग!बाकिर यह अनुष्ठान में ओह राक्षसन के विनाश के उपाय मिल गइल। फेर का रहे इंद्रदेव के जवन अश्वमेध जग के घोडा रह सन ओकरा के चोरी क के आ पाताल लोक में तपस्या में लीन महान वीतराग महात्मा कपिल मुनि के कुटिया का लगे ले आके बान्ह गइले! अब त घोड़ा के ख़ोजत ख़ोजत सगर पुत्र हार गइले सन बाकिर पृथ्वी पर उ जग वाला घोडा कही ना मिलल! बाकिर उ त राक्षस रहलें सन पूरा धरती के कोड के आ पाताल में चल गइलें सन। आ ओहुमे खोजत खोजत कपिल मुनि का आश्रम में पहुंच गइलें सन। उंहा जा के ओकनी का हज़ारो सूर्य के सामान प्रभावशाली महात्मा कपिल मुनि के दर्शन भइल जे अपना तपस्या में पूरी तरह से लीन रहनी आ चारो ओर एगो दिव्य आभा पुंज पसरल रहे!

अब त ओइजा आपन घोडा बान्हल देख के ोहनी का आग बबूला हो गइलें सन आ एकदम चिचिया के मुनि जी के गरिआवे लगलें सन! मार सन पकड़ सन इहे बूढ़ा हमार घोडा चोरवले बा। ई साधू ना ई चोर ह पापी ह!

बाकिर एने तप में लीन कपिल मुनि जी तनिको ना हिलनी। उंहां का तपस्या में लीन रहनी। बाकिर ई त आतातायी राक्षस रहलें सन जब मुनि जी ना बोलनी त जाके आ उनकर हाँथ गोड़ बान्ह के मारल शुरू कइलें सन। बहुत देर बाद कपिल मुनि जी के ध्यान भंग भइल,उहाँ के ध्यान से वह राक्षस के देखे लगनी। कहल जाला कि कवनो संत पुरुष के ेको जो अपशब्द वह वंश के विनाश अकेले क सकेला। संत महात्मा अगर एक बार भी खीस में केहू के घूर के देख देवे त ओकर भष्म भइल निश्चित बा,कहल जाला की भगवान् संत के अपमान करे वाला के कबो ना माफ़ करेलें। संत महात्मा आ सती लोग सदैव मंगल करे वाल ही होला!

बस इतने पर त सगर पुत्र लोग जल के भष्म हो गइल । कहल जाला की धन आ जवानी के साथ अगर अविवेकता बा त ओकर विनाश भी निश्चित बा! देखते देखत कपिल मुनि जी के आँख से आगि बरसे लागल ओमे दुष्ट सगर पुत्र तुरंत भष्म हो गइलें सन! कहल जाला कि साधू संत के कोप असहनीय होला!एने जब राजा सगर के ई सब पता चलल त दुःख से बेसी उनका ख़ुशी भइल कि उनकर सब नालायक पुत्रन के नाश हो चुकल रहे!

अब राजा सगर कपिल मुनि जी के अपमान जानकेु बहुते ते दुखी भईनी आ अपना पोता अंशुमान के उँहा का लगे भेजनी कि जा के चिरौरी मिंन्ति क के मुनि जी से माफ़ी मांग आ मनाव। राजा सगर के पौत्र “अंशुमान” बहुते बड़का विद्वान्, चरित्रवान आ बड़का भक्त रहलें। अंशुमान खोजते खोजते पाताल लोक में मुनि कपिल जी के गुफ़ा में पहुंचले यहां पहुँच के पूरा प्रेम भाव से शाष्टांग नमन कइले हाँथ जोड़ के कहलें की हे मुनिवर हमरा बाबूजी के ई दुष्ट भाई रउआ के एतना सातवलें हाँ सन हे मुनिवर अब रउआ ओह दुष्टन के माफ़ करीं। रउआ बारे में ओकनी का कवनो ज्ञान ना रहल ह! हे मुनिवर राउर महिमा अपरमपार बा अब रउआ हमरा पितरन के क्षमा के साथे उद्धार करीं!

अंशुमान के चिरौरी मिनती कइला पर कपिल मुनि जी प्रसन्न भईनी आ उनका के इहे आशीर्वाद दिहनि की हे अंशुमान तूँ जा जवन तहार पौत्र होइ उ भगवान् के आराधना क के सबसे पुण्य सलिला गंगा माई के यह धरती पर ले आयी, तब तहार यह पितरन के उद्धार हो पायी आ एकनी के पाप कटी!

ओकरा बाद अंशुमान ई आशीर्वाद आ संगे संगे आपन घोडा ले के राजा सगर का लगे पहुँच गइले। राजा सगर आपन जग पूरा कइनी आ विष्णु जी के आराधना क के बैकुंठ धाम के प्राप्त कइनी। अब आगे देखीं जे अंशुमान जी रहनी उनका दिलीप नाम के एगो पुत्र भइल आ उनका एगो पुत्र भईल जेकर नाव रहे भागीरथ। अब उहे भागीरथ हिमालय पर जा के बहुत ही कठिन तपस्या क के भगवान् ब्रह्मा विष्णु आ शंकर जी के आराधना कइलें। उनका तपस्या से तीनो देव लोग प्रसन्न भइल आ वरदान मांगे के कहल लोग।

भागीरथ हाँथ जोड़ के कहनी कि हे देव लोग हम आपन पितरन के उद्धार खातिर पावन पवित्र मोक्षदायिनी पाप विमोचनी सलिला गंगा मैया के यह धरा पर ले आवे के चाहतानी! तीनों देव लोग आशीर्वाद दिहलें तब जा के त भागीरथ जी गंगा मैया के एह धरती पर ले के अइनी आ आपन पितृ लोग के उद्धार कइनी। आगे हम रउआ लोगन के बतावे चाहतानी कि इहे एगो जगत के पावन करे वाला गंगा सगरी जग के पवित्र करत भागीरथ के पीछे पीछे चल देहली आ सगर पुत्रों के भष्म के बहवावत अपनों बहे लगली ओकरा बाद उ राक्षस भी गंगा जी के स्पर्श पा के वैकुण्ठ धाम चल गइलें सन! तब से ई मैया गंगा हमरा धरती के पाप के नाश कर तानी। वैसे गंगो जी के एगो नाम भागीरथी ह!!

जय गंगा मैया।

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