श्री त्रिलोकीनाथ ब्रत कथा : निर्भय नीर

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प्रथम अध्याय

( दोहा)
गिरिजा नन्दन के चरण, बन्दौं बारम्बार।
कथा त्रिलोकीनाथ के, भाषा देहुँ से सुधार।।१।।

(दोहा)
एक समय शिवगौरी संग, भ्रमण करत मतिमान।
रचहूँ त्रिलोकी नाथ के, होई करत बखान।।२।।
रूचिर सरोवर के निकट, पहूँचे सायं काल।
सन्ध्या करने को चले, शंकर दीन दयाल।।३।।

( चौपाई )
गौरीशंकर बोले हर्षाई।
गंजा भांग बनावहु जाई।।१।।
ऐसे कहिन किन्ह प्रस्थाना।
सर तट पहुँचे कृपानिधाना।।२।।
भांग लाय कर बैठी गिरजा।
भांग मांहि मनुष्यतन सिरिजा।।३।।
आए शंभु, लखो यह करनी।
बोले बचन त्रिविधभय हरनी।।४।।

(दोहा)

श्री त्रिलोकीनाथ ब्रत कथा
श्री त्रिलोकीनाथ ब्रत कथा

सुनहुँ प्रिय मोरे बचन, तुम यह भल नहीं किन्ह।
भोजनार्थ के भाग में, मानुष तन रच दिन्ह।।४।।
तो जिवधारी इनको करो,मोरे बचन प्रमाण।
गए दूसर ढिग तब चलहूँ, कृपा निधान।।५।।

(चौपाई)
अस बार्त्ता सुन हंसी भवानी।
जिवधारी करने को ठानी।।५।।
अमृत छिरिक जियावहुं तोहि।
उठ बैठे त्रिदेव छन्द में ही।।६।।
बहुरि चले तब शम्भू भवानी।
पुलकित गात सरल सुख सानी।।७।।
चले शंभु गिरिजा के आगे।
उठि त्रिदेव पीछे तेहि लागे।।८।।

(दोहा)

निर्भय नीर जी
निर्भय नीर जी

ठाढ़ भए कर जोरी के, बोले गिरा गम्भीर।
नाथ स्वामी तुम दास मैं, देहुँ ज्ञान मतिधीर।।६।।
देव वास करो बिटप पर, भक्त मन करो हुलाश।
शाम ही पहूँचो विप्र एक, अतिशय हृदय उदास।।७।।

(चौपाई)
उनको तहँ पूछऊ देवा ।
जात बतावहूँ मेवा ।।९।।
सुन बोले तब बिप्र सुजाना।
जात हाट कछु किनन समाना।।१०।।
बोले पुनि त्रिलोकि हर्षाई।
मोहि कुछ बस्तु ले आवहुं भाई।।११।।
कहे बिप्र तब द्वौ कर जोरे।
करिहों सकल कार्य मैं तोरे।।१२।।
दीजै दाम बताबहुं नामा।
देर होत है बिगड़ल कामा।।१३।।
नाम कहे तब कृपा निधाना।
गंजा तेल अरु पान समाना।।१४।।
तीन पैसे मँह इनको लावहुँ।
सन्ध्या होत वेग तुम धावहुँ।।१५।।
कहे बिप्र पुनि चलती बारा।
है तुमसे इक अर्ज हमारा।।१६।।
बर्तन देहु तेल कर मोहि।
जेहि लाय सऊपब तोहि।।१७।।
कहे देव मोहि बर्तन नाहिं।
ले आवहुं तु अम्बर मांहि।।१८।।

(दोहा)
दाम लेकर बिप्र तब पहुंचे मांझ बजार।
लगे तेल खरीदने दीन्हौ वसन पसार।।८।।

(चौपाई)
तेली लखि बिप्र को मूर्खा।
दियो तेल वर्त्तन करि उर्द्धा।।१९।।
तेल रहित भयो ताके गागर।
बोले बचन दीन दुखसागर।।२०।।
तेल खरीदो केहि के हेतु।
मोहि बतावहूँ भूसुर केतु।।२१।।
कहे बिप्र सुनहुँ तेलहारा।
देव एक मुझे कोई पुकारा।।२२।।
तिनहूँ करि येह वस्तु ए भाई।
उनहि विनहु मन चित धर लाई।।२३।।
किन्हहुँ अति आरति बानी।
क्षमहुँ नाथ हम अति अज्ञानी।।२४।।
सब सामान उसनेे ख़रीद लीन्हा।
लाई त्रिलोकी नाथ को दीन्हा।।२५।।

( छन्द )
मैं तुमको लखत उदाशा।
हृदय भाव निज करो प्रकाशा।।९।।
मोहि एक नारि औ महतारी।
ओ बालक कन्या असुरारी।।१०।।
तामें रहत कलह के बासा।
ताते मम चित रहत उदाशा।।११।।
गौ बछवा मैं दिन्हऊ खोवू।
कृपा रहे ना नाथ की कोवू।।१२।।

(दोहा)
कहे देव जावो, मंशा होगा पूर्ण।
सब प्रकार के दुःख तुम्हारे, क्षण में होगा चूर्ण।।१३।।
गयो पास जब गांव के, गौ पर परो निगाह।
साथ ही हांको गाय के, मन में भयो उदाह।।१४।।
सुन माता मोरे वचन गौ संग आवत तात।
अस सुनि पत्नी बिप्र की, कही सासु से बात।।१५।।
पुत्र तुम्हारे गौ संग आवत।
मन मंह आज खुशी दरसावत।।१६।।
बिप्र लखि गृह की हाल,मन मुदित भयो।
करि प्रणाम पुनि पुनि देव जस बन्दित भयो।।१७।।
सुमरत देव बार बार अरु गृह गयो।
सबके हृदय आज यह प्रेमालयो।।१८।।

द्वितीय अध्याय

(चौपाई)
मंशा पूर्ण भयो ब्राह्मण के।
एहि विधि पुरहुँ सकल जहान के।।२६।।
श्रीपति कहत सुनहुँ मन लाई।
जेहि विधि सब त्रिदेव बताई।।२७।।
सन्ध्या समय किन्ह असनाना।
पुनि सब लीना सबन समाना।।२८।।
सब सुमिरत एक नाथ त्रिलोकी।
तन मन की काहूँ के हेती।।२९।।
तेहि समीप सरिता एक बहईं।
नौकाश्रय एक उत्तम जहईं।।३०।।
तहसीन बणिक एक धन मन अंधा।
मंहको ताहि गंजा के गंधा।।३१।।
आय लखो बैठे निज मौना।
चिलम उठाई चलो निज ठौना।।३२।।
निज स्थान जब पहुँचे जाई।
तुरते नौका गयऊ बिलाई।।३३।।
मूढ़ भये जनु नेत्र बिहिना।
बिकल भये जैसे जल बिनु मीना।।३४।।
लखि यह दशा वैश्य मन दहे
गये बिप्र जहाँ पूजा करे।।३५।।
बोले बचन दुखित मन बानी।
देव फेर भयो जात न जानीं।।३६।।
कौन देव कर पूजत भाई।
हमहूँ बतावहुँ होत सहाई।।३७।।
पूजत हम त्रिलोकी नाथहिं।
विनती करो हमारे साथहिं।।३८।।
है जैहे त्रिदेव सहाई।
जैहे तुम्हरी पाप नशाई।।३९।।
पुनि वैश्य पूछे हर्षाई।
कितने में ब्रत होय सुखदाई।।४०।।
बोले विप्र सुनु वैश्य सुजाना।
तिन पैसा से कोटिक आना।।४१।।
इतने में ये ब्रत होई ये भाई।
येहि विधि पूजा करे तुम जाई।।४२।।
अस सुनि वैश्य चले हर्षाई।
तुरते नौका गयऊ लखाई।।४३।।
तेहि आरूढ़ गयो निज धामा।
सिद्ध भये सब बिगरल कामा।।४४।।

तृतीय अध्याय

(चौपाई)
सब सामाग्री लिन्ह मंगाई।
स्वजन बन्धु सब लियो बुलाई।।४५।।
करने लगे परम ब्रत हुलासा।
सब समाज बैठे तेहि पासा।।४६।।
तेहि पुरोहित यहं एक गयऊ।
मार नाय कहत अस भयऊ।।४७।।
हे महराज सुनहुँ मम बाता।
हमहूँ करत एक ब्रत बिख्याता।।४८।।
बामे सन तुमसे कुछ नाहिं पूछा।
अबकी बार परो तुम छूँछा।।४९।।
अस कह अब गयो निज धामा।
बिप्र तजो नित अगणित कामा।।५०।।
क्रोध प्रचंड भयो तब उनमें।
पहुंचे तुरंत यज्ञालय में।।५१।।
हम तुमसे न कुछ पुछे बाता।
क्रियाकर्म है फलहिं चखाता।।५२।।
अस कहि बस्तुहि मारहि लाता।
बैश्य देख मन में पछताता।।५३।।
(दोहा)
नष्ट भ्रष्ट करि सब ब्रत के पहुँचे निज धाम।
निज ब्रत के अपमान से,भयो त्रिलोकी बाम।।१९।।

(चौपाई)
दुहुँ तासु बालक मरे घर में।
विधि फेर भये झण भर में।।५४।।
सब पीड़ित हो दुःख से क्षण में।
पहुंचे तब जाई मरघट में।।५५।।
चिंता साज कर बैठे जबहि।
बृद्ध बिप्र एक पहुंचे तबहिं।।५६।।
ब्राह्मण से पूछो सकुचाई।
किसके सुत है दो बताई।।५७।।
मरे हैं दो कवने कारन।
जे तुम कियो चिता पर धारण।।५८।।
ब्राह्मण यह सुन बोले बिलखाई।
हैं मोरे बालक ये भाई।।५८।।
बिन रुज प्राण तजे हैं दो
भाग्य बाम बस चलत ना को ।।६०।।
मैं विध्वंस कियो एक पूजा।
एते अपराध न दोसर दूजा।।६१।।
बोले वृद्ध बिप्र ब्राह्मण से।
हम एक जतन बतावहिं तुमसे।।६२।।

(दोहा)
राख वहाँ के लायकर मर्दहुँ शिशु के गात।
जिहें तुम्हारे बालक दो सच मानहूँ मम बात।।२०।।

(चौपाई)
अस सुनि विप्र चले सरकत।
चलते तासु दांय अंग फरकत।।६३।।
राख वहां से लाय कर मल दिया शिशु के गात।
राम राम कहि उठ बैठे, कथा हुई समाप्त।।६४।।

(दोहा)
ब्राह्मण ने फिर मुदित मन पूजन किन्ह महान।
नाथ त्रिलोकी प्रकट भये पूजत सकल जहान।।२१।।
नाथ त्रिलोकी के कथा,श्रवण करै जो कान।
पावहिं ते वांछित फल, कथा कहे विद्वान।।२२।।
इसमें कुछ संशय नहिं, कलि में विनय प्रकाश।
साक्षी श्री पति कैलाश।।२३।।

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