सिमट रहल लोकराग कजरी : जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

कजरी
कजरी

लइकइयेँ से सुनत आवत बानी सन कि हमनी के देश क अतमा गाँवन में वास करेले। बाकि गाँवन के अतमा …? एकर उत्तर हेरे के जरुरत नइखे, काहें कि एकरा उत्तर सभके मालूम बा। रउवा के बतावे में हमरा कवनो संकोच नइखे। राउर चाहत बानी कि हमही बताई , त लीहल जाव , हम अब्बे बता देत बानी —– “गाँवन क अतमा ओकरे लोक संस्कारन आउर ओकरे संस्कृति में बसेला .”

जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

गाँव हमनी के आपन माटी आउर ओकर सोंधी महक के संगे संगे रीति–रेवाजन से आउर ओहमे बसल नेह – छोह से रससिक्त कर देवेला। प्रकृति के अंचल में जब लोक रंगत के त्रिवेनी बहे लागेले त सभे ओहमे गोता जरुर लगावल चाहेला। एही कुल्हि रेवाजन में कुछ खास बा कजरी भा कजली तीज, जवन ख़ाली एगो परंपरा भा त्योहरे नइखे, बाकि अपने माटी में रचल बसल मन के बृतांत बा। अइसन बृतांत जवना के सुने भा जीये खातिर मन आतुर हो जाला। भोजपुरिया संस्कृति भा पूर्वांचल के इ अइसन धरोहर बा, जवने के महक अजुवो ले जस के तस बा।

कजरी, जवना के आधार विरह होला, अइसन कहल जाला कि पुरातन काल में मध्य भारत के लोकप्रिय राजा दाडुराय के मृत्यु से दुखी होके उनुकर रानी नागमति सती हो गइनी। राजा आउर रानी के अकाल मृत्यु से उनुका राज के परजा ढेर दुखी रहल। ओहिके विरह में परजा एगो राज के जनम दीहलस, जवना के कजरी कहल जाला। कजरी अलग अलग रुपन में सगरों गावल जाले, बाकि बिहार आउर उत्तर प्रदेश में एकरा ढेर लोकप्रियता हासिल बा। एही से आजो कहल जाला —

“ लीला रामनगर की भारी / कजरी मिर्जापुर सरदार |”

पुरबी उत्तर प्रदेश में में ढेर प्रचलन आउर दखल ३ गो जिला के बा, ओही से उहाँ गाये जाए वाली कजरी ओही जिला के नाँव से जानल जाले– मिर्जापुरी कजरी, बनारसी कजरी आउर गोरखपुरी कजरी। कजरी के प्रचलन सबसे बेसी मिर्जापुर से भइल, एही से इहो कहल जाला कि मिर्जापुर कजरी के नईहर बा, आउर बनारस ससुरार। कजरी गायन आउर संगीत के ए विधा के पूर्वांचल से निकार के राष्ट्रीय स्तर पर पहिचान दियावे में बनारस के संगीतकारन के ढेर योगदान बा।

आजो छन्नू लाल मिसिर , गिरिजा देवी , विस्मिल्ला खां के नाँव कजरी के पर्याय के रूप में लीहल जाला। कहल त इहों तक जाला आउर इ साँचो बा कि उस्ताद बिस्मिल्ला खां के शहनाई पर आके कजरी ढेर मीठ हो जाले। कजरी आउर गिरिजा देवी एके सिक्का के दू गो पहलू लेखा बुझानी। कजरी के देश –विदेश ले जाए वाली गिरिजा देवी आउर गिरिजा देवी के मान –सम्मान दियावे वाली कजरी, इ दुनो एक दूसरा के बिना पूरा ना बुझाली।

कजरी के विरह – वेदना के पर्याय भी मानल जाला, काहें कि इ पूर्वी उत्तर प्रदेश आउर बिहार के ओह कुल्हि मेहरारुन के विरह वेदना क साथी बिया जेकर मरद पइसा कमाए खाति परदेश चल जालें। जब मेहरारुन से उनुकर प्रियतम चार गो पइसा कमाए ला दूर होखस आउर साल दू साल में एकाध बेर आवत होखस त गरमी के बाद बरसात के शीतल बूंद विरहिन के शीतलता ना देस, उलटे विरहिन के विरहाग्नि बढ़ा देवेले। आपन उहे कुल्हि दरद मेहरारू कजरी में गावेली। विरह आउर प्रतीक्षा कजरी में खूब दिखाई देवेले —

“सखी हो श्याम नहीं घर आये
बरखा बरसन लागे ना |”

मिरजापुरी कजरी में सावनी घटा आउर विरहिन के व्यथा के रूप अलगे होला —

“आई सावन की बहार पिया
परेली फुहार पिया ना।
आवे सुधिया बस तुम्हारी
लगे अँखिया ना हमारी
सुनी सेजिया पर आवे न करार पिया
परेली फुहार पिया ना॥”

जवने विरहिन के प्रियतम उनुसे इ कहले होखस कि असों सावन में जरुर आइब , उ अइसना में दिने गिनेलीं —

“पिया खाति तरसे ले हो गुजरिया
कबले सावन अइहें ना।
कहिके गइलें सावन महिनवां
गिनत बानी तबहीं से दिनवाँ
पुरुब से घेरे लागल हो बदरिया
कबले सावन अइहें ना॥”

कजरी के स्वरुप गते गते विस्तार ले रहल बा। विरहिन के विरह से निकल के बाहर झांके लागल तबे नु एगो इहो रूप मिलल —

“हिन्दी के कइला बेड़ा पार हो,
भोजपुरिया के मार देहला रजऊ॥
दिन दिन बढे अनुसूचिया से दुरिया
ओही से घरवा में तलफे भोजपुरिया
इज्जत भइल मोर उघार हो
भोजपुरिया के मार देहला रजऊ॥”

कजरी में रिस्तन के मिठास भी मिलल होला :

“पिया सड़िया लिया दा मिर्जापुरी पिया
रंग रहे कपूरी पिया ना |”

कजरी मिर्जापुर आउर बनारस के अइसन जोडले बिया कि दुनो के अलग क के देखबो कठिन होला —

“मिर्जापुर कइला गुलजार हो,
कचौड़ी गली छोड़ गइला बलमू |”

बनारसी आउर मिर्जापुरी कजरी से परे गोरखपुरी कजरी के अलगे रंग होला —

“हरे रामा , कृष्ण बने मनिहारी ,
पहिर के साड़ी , रे हरि |”

विरह के बाद होखे वाला मिलन में अलगे आनंद होला —

“पिया मेंहदी लिया दा मोतीझील से
जाय के सायकिल से ना |”

परिस्थिति आउर पलायन से कजरी विधा गते गते मृतप्राय हो रहल बिया, जवने के दरद आजु-काल्ह के कजरी में दीखहूँ लागल बा —

“आपाधापी में सबकुछ बिलाय गइल
गउवाँ हेराय गइल ना॥
बुढवा पीपरो सुखाइल
गांछ निबियो के कटाइल
झुलुवा झूले के जगहों बटाय गइल
गउवाँ हेराय गइल ना॥”

प्रकृति आउर पर्यावरण के चेतना जवने लोक संस्कृति में मौजूद रहल बा, अगर उ विधा मृत हो जाय भा मृत होखे लागस, त संस्कृति आउर समाज मृत हो जाला। आज जरुरत बा आपन मूल्यन के संजोवे के, रिस्तन के खनक बचावे आउर सँवारे के , प्यार– मनुहार के जीवनदान देवे खातिर हमनी के चेतना के परिचायक कजरी ए धरती पर जीयत रहो, एही शुभकामना के संगे विश्राम ले रहल बानी।

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