सिरिजन तिमाही भोजपुरी ई-पत्रिका के तीसरका अंक रउआ सोझा बा

सिरिजन तिमाही भोजपुरी ई-पत्रिका के तीसरका अंक रउआ सोझा बा। सिरिजन भोजपुरी भाषा साहित्य, लोक चेतना अउर समाज के विकाखातिर तत्पर पत्रिका ह । पुरूखा पुरनिया के थाती जोगावे के साधे साथ नवकी कलम के मुख्य धारा से जोड़ला के जुगत में जोरदार ढंग से लागल बा। आपन भाषा आ भोजपुरिया समाज के पुरहर विकास एकर असली लच्छ ह ।

इतिहास गवाह बा, अइसन कवनो क्षेत्र नइखे जहवाँ भोजपुरिया भाषी लोग के योगदान ना होखे। बाकी, एगो सोचल- समझल राजनीति के चलते भोजपुरिया समाज के हमेशा किनारे राखल गइल बा । कारण, हमनीं में एकता के बरियार अभाव रहल बा। भोजपुरी में जवन सिरिजन भइल बा, ओकर आजुले निष्पक्ष मूल्यग्रेकन केहुवो ना कइला कारण भा स्थिति चाहे जवन होखे, भोजपुरी समाज के अपने आप पर पूरा भरोसा राखि के आपन आ अपना समाज के मूल्यएँकन को के पडी।

तिमाही भोजपुरी पत्रिका सिरिजन
तिमाही भोजपुरी पत्रिका सिरिजन

कवनो भाषा के पहिचान आ विकास ओकरा साहित्य से ही होला। भोजपुरी में रोज लिखल पढ़ल जाता, भोजपुरिया साहित्य में खूब बढ़ोतरी होता। एकरा बादो एकर पहिचान अश्लील गीतन से कइल जाता। कुछलोग खुश होके भले केतनो अगरा जाव कि भाषा के विकास में साहित्य की तुलना में गीत गवनई आ सिनेमा के ढेर लमहर हाथ बा। भोजपुरी भाषा के विकास एही से हो रहल बा लेकिन, कुफुत के कारन त ई बा कि नाम से जियादा बदनामी होता।

तिमाही भोजपुरी पत्रिका सिरिजन के दुसरका अंक

फिलिम त अइसन बनता को मार काट आ उधार देहि के अलावा- अउरी कुछो ना रहेला। बम्बई से घेटुआ के निकालल लोग भोजपुरी में आ के अपना के स्वयंभू स्टार घोषित क दिहले बा लोग।

समय आ गइल बा कि अब भोजपुरी में गीतन के गिरत स्तर आ दुअर्थी सम्वाद के कडेर विरोध होखे के चाहीं। सुखद समाचार ई बा कि धीरे धीरे भोजपुरिया समाज एकरा विरोध में मुखर हो रहल बा ।

लोक संस्कृति के बचाने वाला लोक गीत गवनई से मनोरंजन कइल जावा भोजपुरी में सुघर सिगार गीतन के अभाव नइखे। सब परयोग में लिआवे के पडी। तब्बे तू दुनिया समुझी कि भोजपुरी के जरि-सोर केतना गहिराह बा। फुहरपन परोसेवाला गीत से लुहेड़पन भीड के जुटान त हो जाला, फेरु वोही हल्लुकपन से भोजपुरी के कपार पर बदनामी के करिखा लागि जाला।

भोजपुरी के लीले खातिर तैयार राहु केतु लोग के चिन्हल जरूरी बा। आयी ऐसे बचावे के संकल्प लिहल जाव, आयोजक जदि पहिलहीं धिरा देव कि अनर्गल नइखे गावे के, तबे बदलाव हो सकेला।
पुरान भीत गिरी तल्ले- तू नई भीत उठी।

डॉ अनिल चौबे
सम्पादक “सिरिजन”

जनवरी- मार्च 2019 / अंक 3 – सिरिजन पत्र संख्या – 4 | तिमाही भोजपुरी पत्रिका सिरिजन के डाउनलोड    करे खातिर इहवा क्लिक करीं

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