देवेन्द्र कुमार राय जी के कुछ भोजपुरी रचना

देवेन्द्र कुमार राय जी
देवेन्द्र कुमार राय जी

भोजपुरी कविता भोजपुरीया के ठाट

भोजपुरीया जब प्रेम से बोले
हर बात लागे मधुआईल,
आवते भोजपुरीया के ताव में
हर बतीए लागे बघुआईल।।

भोजपुरी के चले जब गोला
सभ जाना छीतरा जाले,
आरा बलिया छपरा के डरे
सभ जाना भीतरा जाले।।

भोजपुरीया तोब छोड़त रहीं
अईसहीं रंग में डंकले रहीं ,
के बा जी जे सोझा आई
अईसहीं रउरा डंफले रहीं ।।

कबहीं हमहूँ जोड़ लगा के
जे आई झटेहेरले रहब,
जतना हांफे के बा हांफे केहु
सही बात हम कहबे करब।।

माॅरीशस गुयाना क्यूबा तक
भाषा भोजपुरीया के हाला बा,
फिलीपींस त्रिनिदाद चिली में
गमकत भोजपुरीया के माला बा।।

शहीदन के सराप

अपना हम खुन से पटवनी ई धरती ,
बंजर से हरिअर बनवनी ई धरती।

हमरे कमाई प राज करे नेता,
हमरे जीनीगीया के राख करे नेता।

सीमवा के रक्षा खातीर हम मरि गईनी,
बाकी सम्मान आजुतक नाहीं पईनी।

शब्दन के घोडा़ चलावे रोज बोल के,
माई के ममता से खेल रोज खेल के।

हमरा ही देंहीया प चले रोज मिसाईल,
गाड़ी प बईठ नेता चले उधीआईल।

नीतीया अनीतीया बनवले स नेता,
माई के सनापन हो गईले बेटा।

नेतवन के बेटा सभ पढे़ले बिदेस में ,
कतना ले बात कहीं अपना सनेस में ।

जरि छरि जासु भले देशवा के नीयम,
हम सात जनम भले गुदरी के सीयम।

गोलिया के बदले गोला ना चलईब,
संसद में बईठलो प सुख नाहीं पईब।

दुश्मन मुदईया के चीर द करेजा,
तब जाके धीर धरी हमरो करेजा।

हमरा शहीदवन के इहे बा सराप हो,
एकदिन भोगब तुं अपने ई पाप हो।

राय देवेन्दर के हहरता जियरा,
रोज रोज लाश देखि तड़पता हियरा।

अगुअई

बीदकल अगुआ देखि के तोसक तकीया के भेस,
साडी़ के खोल लगावल लउके सउंसे शेष।

घर के आगा गा़जल बडुए लउकतरूए घुर,
पाँच लाख के मांग खातीर बवलसि मुंह भरपूर।

सोनपपडी़ आईल सोझा चीमीकी में लपेटाईल,
कईसन बेटहा के तगमा बा एही से बुझाईल।

अजबे कट बार कटवले आईल लइका सोझा,
बीच कपारे लउके जईसे बान्हल मसुरी के बोझा।

देखते लइका कान में कहलस हमार काकावा,
पकवा ई त लागतरूए अपना गांव के बोकवा।

मेहररूई चाल बुझाता कहलसि छोटका भाई,
तिलक लागे तय करी लइकवे के माई।

छउक छउक के फूफा पूछसु कहां अगुआ के गांव,
लागतरूए मउसा करिहें समियाना में मलिकांव।

कतनो फाटी जूता हम गांव गांव के छानब,
अपना सुनर बेटी के एह रेंड़ से ना बान्हब।

भोजपुरी गजल मनवा चकोर

सुरत चान के रहे केशीया लहरा के गईल,
हम सोचहूँ ना पवनी उ होश उडा़ के गईल।

चंचल कजरारी अखियाँ प्रेम के सागर रहे,
मस्त हथीनी के चाल ओठ रस के गागर रहे।

मन में नेहिया के आग सुनुगा के गईल,
हम सोचहूँ ना—————उडा़ ले गईल।

माथे बिंदिया चटक लागे पूनम के चान,
हाथे खनकत कंगनवा सुरताल के समान ।

दिल में हमरा ई बंसुरी बजा के गईल,
हम सोचहूँ ना————–उडा़ ले गईल।

ओढ़नी के हावा बसंत के लहर लागेला,
मनवा चकोर मन ओही ओर भागेला।

चाहत के सीप से मोती चोरा ले गईल,
हम सोचहूँ ना————-उडा़ ले गईल।

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