नचाप के औघड़ स्वामी अलखानंद जी के व्यक्तित्व : निर्भय नीर

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परनाम ! स्वागत बा राउर जोगीरा डॉट कॉम प, आज रउवा के सामने बा स्वामी अलखानंद जी के परिचय। औघड़ स्वामी अलखानंद जी के बारे मे हमनी के बता रहल बानी निर्भय नीर जी। निर्भय जी नचाप के औघड़ स्वामी अलखानंद जी के बारे मे जानकारी इक्कठा क के हमनी के सामने रख रहल बानी। रउवा सब से निहोरा बा कि पढ़ला के बाद आपन राय जरूर दीं आ रउवा निर्भय नीर जी के दिहल जानकारी अच्छा लागल त आगे शेयर जरूर करी।

चोला परिचय

जन्मतिथि- १८६२ ई० (संवत् १९१९)
मृत्यु तिथि- १९३२ ई० (संवत् १९८९)
जन्मस्थान- मकदूमगंज (जिला- सारण)
जाति- कोइरी
गुरू- स्वामी ज्ञानानंद औघड़
भाषा- भोजपुरी, अपभ्रंश हिन्दी,साधुकड़ी।

औघड़ सम्प्रदाय

औघड़ सम्प्रदाय के निरमान कब आ कइसे भइल, आ एकर जन्मदाता के रहे, एह बात के ठीक ठीक पता नइखे चलत। बाकिर सारण आ चम्पारण जिला में सरभंग सम्प्रदाय के एगो साधुअन के जमात पावल जाला। जे लोग अपना के औघड़पंथी साधू कहेलें। ओह लोग के एक जाना गुरू रहनी। जिनकर नांव स्वामी ज्ञानचंद दास रहे। ज्ञानचंद दास जी अपना के औघड़ कह के बतावत रहन। अइसे तऽ औघड़ शब्द अघोर के अपभ्रंश हऽ। आ जवना शब्द के अर्थ शांत भा नीमन होला। बाकिर अब तक ना जाने एकर रूप कइसे विकृत हो गइल आ ओह लोग के आचार विचार कइसे बदल गइल। कहल मोसकिल बा। ओह लोग के खान-पान आ रहन-सहन में सर-सफाई ना रह गइल। सब चीझे लोग खाए पिए लागल लो। ई लोग निरगुन ब्रह्म के उपासना करेलन आ अपना के कबो संन्यासी त कबो वैष्णव कहेलन।

वइसे अपना देश में साधु-संत लोग के रकम-रकम के मत आ सिद्धांत बा बाकिर मतलब तऽ सभे के एके बा। राहता भलहीं लोग के अलग-अलग बा। बाकिर मंजिल सभकर एके बा ।

वैष्णव, रामानंदी, सखी पंथी, शैव, संन्यासी, निर्गुणी, सगुणी, शाक्त, दरियादासी, कबीर पंथी, नानक शाही, शिवनारायणी, आ औघड़ पंथी बैगरह। इहे तेरह तरे के औघड़ पंथी संप्रदाय भी मानल जाला। औघड़ पंथी साधु लोग कबीर दास के मत के खूब मानेलन। जाति-पाति के विभेद ई लोग ना जानेला आ ना मानेला । पूछला पर कहबो करेला कि—–
“जाति-पाति पूछे ना कोई।

हरि के भजे से हरि के होई।।

नचाप के औघड़ स्वामी अलखानंद जी के व्यक्तित्व : निर्भय नीरऔघड़ पंथी लोगन के भेष-भूषा संन्यासी के रहेला। एह लोग के कपड़ा गेरुआ रंग में रंगल रहेला। दाढ़ी, मोछ, आ मुड़ी के केश ई लोग छूरा से छिलवा देला। केश ई लोग लमहर-लमहर ना राखे। छूआ-छूत के भेद ई लोग कबहूँ ना मानस। केहू के बनावल केहू खा लेला। मछरी, मांस, ताड़ी, दारु आ गांजा-भांग से एह लोग के कवनो परहेज ना रहेला। धेयान, भजन आ संगीत से ई लोग निराकार ब्रह्म के भजन करेला। गांव के बाहर चवंर चाचर में समाज से दूर रहि के भजन करेला। एह लोग के मत में बिआह एकदमे बर्जित होला। एह लोग के मृत्यु के बाद शव के जमीन में गाड़ दिहल जाला।जवना के ई लोग समाधी लगावल कहेलन। ई लोग सोहंम् सोहंम् के जाप के परधानता रखेला। अपना के ई लोग ब्रह्म मानेला आ बूझेला कि जीव आ ब्रह्म में कवनो विशेष भेद ना होला।

अलखा नंद जी के जीवन परिचय

श्री अलखानंद स्वामी जी के जन्म १८६२ ई० में सारण जिला के मखदूम गंज नांव के एगो गांव में भइल रहे। इहाँ के कोइरी जाति के बालक रहीं। सुने में आवेला कि १४ बरिस के उमिर में साधु भइल रहनी आ चारो धाम करीब १० बरिस तक घूमघाम के एक ब एक घूमत-घूमत १९२३ में सारण जिला मांझी थाना के नचाप गांव के पछिम एगो आम के गाछ तर रहे लगनी। वोह घरी उनकर उमिर करीब ४५ बरिस के रहे। गांव के लोग जब साधु बाबा के देखल तऽ उनकरा मन के मोताबिक जयगोपाल सिंह,आ सूर्य प्रसाद सिंह , बाबा खातिर कंबल चटाई आ पानी पिये खातिर कटिया वगैरह के इंतजाम कइल। बाबा के ई दूनूं जाना पहिलका चेला रहे। एह गांव में एहि तरहे रहत-रहत करीब १० बरिस बीत गइल। तब ओह जगहा पर एगो कुटिया गांव के लोग बनावल आ एगो यज्ञ के आयोजन कइल, जवना में बहुते साधु-फकीर लोग जुटान भइल। आ खूबे रामायण ,भजन, आ किरतन भइल। एह तरहे साधु बाबा का नचाप कुटिया में रहत-रहत करीब २५ बरिस बीत गइल। बाबा एतना दिन तक ले नियम से दूनूं सांझ दू-दू घंटा लोग के वेद वाणी सुनाईं आ ढ़ेर-ढ़ेर उपदेश दिहिं। उहाँ के रात में सुती ना, ओमकार ब्रह्म के उपासना करत रहीं। इहाँ का बडका सतसंगी रहीं। इनकर गुरु बाबा ज्ञानानंद जी रहीं। काहें कि इहाँ के बनावल एगो छंद से मालूम होता जे इनकर गुरु ज्ञानानंद जी महाराज रहनी।
मनहर छंद……

भारत के देसवा में,सारण बा जिला एक। डाक घर एकमा के जानत जहान बा।
मौजे नचाप गांव के, पछिम बागहि में। लहुरी मन का तीरे, एगो सुनर स्थान बा।।
निर्पक्ष वेदांत सागर के उत्पति हवे। जहवां से हो के जग में चलान बा।
यही के अध्यक्ष अलखानंद स्वामी नांव हवे। ज्ञानानंद स्वामी जी के शिष्य जे सुजान बा।।

एह छंद से मालूम होता जे नचाप गांव के पछिम बगइचा में लहुरी मन के तीरे बाबा के रहे खातिर कुटिया बनल आ एहि जा इहाँ का निर्पेक्ष वेदांत सागर नांव के पोथी लिखनी। उनकर गुरु जे औघड़ रहले तेकर नांव ज्ञानानंद जी रहे।

स्वामी अलखानंद जी कवनो जियादे पढ़ल लिखल ना रहनी बाकि देश दुनिया के खूबे देखले सूनले रहनीं। उनकरा साधु-संत से सतसंग आ ज्ञान चर्चा काफी रहे। ई बात उनका बतकही से मालूम होखे। इहाँ के गुरू ज्ञाननंद जी ओह घरी सारण जिला के आखिरी छोर पर चंपारण के जंगल में रहत रहीं। जंगल हथुआ राज के कन्हौली गांव में रहे। अलखानंद जी स्वामी के चार गो परधान चेला रहन जिनकर नांव हरदेवानंद, मुलुकराज दास, मसदी दास, आ रामानंद रहे। जवना में रामानंद जी के मरन सबसे पहिले भइल,आ पीछे हरदेवा नंद जी भी मरि गइलें। ओकरि बाद उहो दूनूं जना मरि गइलें। बाकि ओह में बाबा हरदेवा नंद जी के कई जाना चेला रहन जे लोग पचुआ, पचरूखी, नचाप, कथवलिया, उखहीं, में मठिया पर रहेलन। ई लोग भजन भाव आ दावा-बीरो के धंधा करेलन। ओह चेलन में मसहूर चेला सच्चिदानंद, अखंडानंद, नित्यानंद, कृपाला नंद, जगदीशानंद, विवेकानंद वगैरह लोग रहे।

बाबा अलखानंद स्वामी के मृत्यु ७० बरिस के उमिर में भइल रहे। कहे वाला कहेला कि एक दिन उनकरा माथा में चक्कर आवे लागल, आ माथा से गोड तक बाथा उठ गइल। लोग उनकर सेवा टहल में लाग गइल। बाकि दू घंटा के भीतरे उहां के आपन चोला छोड़ि चलनी। एह तरे स्वामी अलखा नंद जी १९३२ में एह ऊसर संसार के छोड़ के परम धाम में चहूंप गइनी।

स्वामी अलखानंद जी के कृतित्व

स्वामी जी के कई गो किताबन के रचना कइले बानी,जवन अबहीं छपल नइखे। बाकिर दूं गो किताब उहाँ के लिखल छपल बा। जेकर भाषा भोजपुरी आ अपभ्रंश खड़ी बोली में बाटे। पहिलका के नांव हऽ “निर्पेक्ष वेदांत राग सागर” आ दूसरका के “औषधि सागर” हऽ । दूनूं किताब १९३० ई० में छपाइल बाटे। ‘निर्पेक्ष वेदांत राग सागर’ में रकम-रकम के छंद आ पद में भजन कीर्तन आ गीत बा। ई सब गाना के आधार वेद,पुराण आ उपनिषद के विषय बाटे। एह में रकम-रकम के गीत संगीत के साथे राग-रागिनी के भेद आ ओकनी के उदाहरण देहल बा। सब गीत साकार आ निराकार ब्रह्म के बारे में बाटे। कुछ छंद में कबीर दास के बाणी के पुट बा। एह से बुझा ता कि बाबा नीमन गवनिहार साधु रहनी। निर्पेक्ष वेदांत राग सागर ४६ सर्ग में लिखाइल बा। एह किताब में कुल २४८ पन्ना बा। एह किताब में नीचे लिखल राग आ छंद बारन सन – ध्रुपद, तेवरा, खमाच, सारंग, सोहनी, भैरवी, कहरवा, प्रभाति, भैरव, विहाग, दादरा, शेर, भैरव-भैरवी के दादरा, आसवरी, घनेश्वरी, परज, विरासत, टोड़ी, नट दीपक, तीलाना, कान्हरा, केदार, चौतीसी, चतुरंग, सारिगम, रेखता, गज़ल, सोरठ, असरावही, अलैया, स्वर हीन, झंझोटी, घनाश्री, कौवाली गज़ल, कजली, वाख, खेमटा, षटरीत, बारहमासा, चतुरमासा, ठूमरी, सोहर, राग श्री वगैरह।

औषधि सागर में स्वामी जी के बनावल तरह-तरह के रोगन के तरह-तरह के दवा भोजपुरी छंद में लिखले बानी। जवना में ढ़ेर जड़ी बूटी के भी नांव लिखल बा। ई किताब देहात खातिर बड़ा उपयोगी बा। जवना में पइसा कम लागे आ फायदा ज्यादे होखे। ई दवाई के किताब दोहा आ चौपाई छंद में बा। एह में २४५ पन्ना बा।

“निरपेक्ष वेदांत राग सागर” में वर्णीत कुछ राग रागिनी

(क) राग – (धुरपद चार ताल)

सहज समाधि के पार अविचल, अकट गति निराकार ये।
इंगला पिंगला नाहिं नाड़ी सुस्मणा,ज्ञान विराग के पार ये।।
नाहिं हृदय त्रिकुटी मंडल, नाहिं सोहं तार ये।
नाहिं जोग न ध्यान जप तप, महातत्व नहीं अहंकार ये।।
प्रकृति पुरुष न तम रज सत्य, पंच तत्व नहिं पसार ये।।

(ख) उपराग रागनी के नांव (दोहा छंद में)

झंझोटी,जंगला,बारवा, पिल्लू धानी तपलंग।
सोहर, सोहनी, सिंध, आसा,लहरी, लुहर,घाटाअंग।।
ध्वनी, गरा, गोधुनी,गरभा,धवल,विरहा, भटियार।
झूलन,कजली, जौनपुरी,सनम, साजगिरी योगियार।।
रारछड़दा, नारेज गमन,लावनी,अहंग साहान।
जंगी उसाखी,पवन्तिका,वाकरेज कोकिलान।।
उपराग इति भयउ, देश देश जो विख्यात।
गाना भेद अनेक निधि,कोउ नहिं पार को जात।।
नाद रुपी सिंधु पार में,जाने को अविलाख।
सरस्वती पौरे तुम्बी पर, सोभी पार नहिं भाख।।

(ग) सात स्वरों के नांव (दोहा छंद में)

षडज,रीसभ,गंधार अरु, मध्यम पंचम जान।
धैवत आ निसाध मिली,यहि सात स्वर वखान।।
षडज के स्वर हौ म्युर क, पपीहा रीसभ के जान।
बकरा स्वर गंधार क, सारस मध्य के तान।।
कोइल पंचम के बोलत, मेंढ़क के धैवत जान।
हाथी बोलत निषाद के, इहे सातो स्वर मान।।

(घ) भूयंग प्रयात छंद (मंगलाचरण)

अखंडम,अडंडम,अरुपम, अनुपम।
अगेहम,अदेहम,अमवनम, अचूपम।।
अजीतम अभितम,अतीतम अनादम।
नमो अलखा नंदम,नमो अलखा नंदम।।१।।
अवाकम,अतापम, अपापम,अपारम।
अमापम,अजापम, अथापम अकारम।।
अवेधम अखेदम, अभेदम, अतौलम।
नमो अलखा नंदम,नमो अलखा नंदम।।२।।

(ड) भोजपुरी “औषधि सागर” के कुछ पद (दोहा छंद में)

(१) सब ज्वरों पर दोहा….
पित पापड़ा कंजा कुटकी,खस गोखरू कंटकार।
सब औषधि सम तूल ले के काढ़ा करिये सम्हार।।
पित्त ज्वर दाह श्रम छय मूर्छा सबको विनसाय।
अलखा नंद स्वामी कहत हैं, धन्वन्तरि लेख पार।।

(२) मक्खी आ भेभ बिस चिकित्सा…….
सोंठ सेनहा काली मीरीच,बन तुलसी रस माँही।
पीस कर लेपन कीजिए तो ततया बिस जाही।।
केसर तगड अरु सोढ़ही, जल के साथ पिसाय।
मधुमखी के पिस कै,लेप करो पिस जाय।।

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