सौरभ कुमार जी के लिखल तीन गो भोजपुरी कविता आ गीत

सौरभ कुमार जी
सौरभ कुमार जी

प्यार ना करती

जानती की तू बेवफा बनबू ता प्यार ना करती
दिल के धड़कन ना बनाईती ताहरा पर ना मरती
हमरा मन के चमन में बसल रहलु तू बुलबुल बनके
हमार बाग उजाड़ देहलु बागवां बनके ।

साथ छोड़ दिहलु नाता तोड़ दिहलु
दिन – रात दिल में आह ना भर्ती
जानती की तू बेवफा बनबू ता प्यार ना करती ।।

हमार जिनगी रहल पानी तू साथ रहलु धारा बनके
हमार नीलगगन के छोड़ दिहलु तू तारा बनके
तोहरे याद में चुप- चाप रहती आँख से नीर ना बहाइति
जानती की तू बेवफा बनबू ता प्यार ना करती ।।

तू भूल गइलू हमके तहरे याद के हम बसवले बानी
हम रहनी राजा तू रहलु हमरा दिल के रानी
जर गइल उ किताब जवना में रहल लिखल आपन जिनगी के कहानी
धोखा खा चुकल बानी अब ना धोखा खाइब केहू के दामन पर मरके
तू हमके याद करतु ता बिरहा के आग में ना जरती
जानती की तू बेवफा बनबू ता प्यार ना करती ।।

तोहरे याद के शाया बनाके दिल में बसाइब
तोहर बेवफाई के कीसा पवन अर्पित विनोद रंजीत के सुनाइब
खूबसुरत ज़ालिम होला अब जा के बुझाइल
तोहार खंजर पीठ में चलावल कबो ना भुलाइब
तोहर याद में जख्म के नासूर बनाइब
रहेला कइसे जख्मी दिल सहेला कइसे ज़ुल्म सितम के
टूटी जब दिल ता तोहके बुझाई
मिलल रहित रहित वफा के बदले वफाई ता सौरभ इ किसा ना सुनाइती
जानती की तू बेवफा बनबू ता प्यार ना करती ।।।

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हम छोड़ दी

सोचनी की लिखी तहार तारीफ
लिख देहलश कलम वफा के बदले बेवफाई
लिखल छोड़ दी की कलम तोड़ दी

सोचनी लिखी गीत तहरा पाजेब के धुन पर
आवे लागल अवाज बेवफा बेवफा
आवाज सुनल छोड़ दी की पाजेब तोड़ दी

गइनी बहारे चमन में देखनी गुलाब
खिलल फूल रहे जवानी पर शबाब
चूम लेहलश कदम के काँटा
जख्म भर दी की फूल तोड़ दी

सोचनी की बैठी निल गगन के निचे
जहाँ भईल रहे वादा जीवन कियारी के सीचे
वक्त भी गुजर गइल जैसे हाथ से रेत
वक्त के भी तहार याद गवारा नइखे
वक्त के मोड़ दी की याद के छोड़ दी

सोचनी की चाँद से चेहरा के हो जाई चाँद में दीदार
काली घटा के भी रहे चाँद से प्यार
ले लेहलश चाँद के अपना आगोश में
काली घटा के तोड़ दी की इंतज़ार छोड़ दी

साँस के भी बा तहरे नाम के सहारा
कैसे होइ आब बाकी ज़िन्दगी के गुजारा
ज़ालिम जमाना मारत बाटे ताना
याद बहुत आवत बा हमार वफा के तराना
साँस ली की लेहल साँस छोड़ दी ।

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पिता

आ गइनी पिता जी जब औलाद पर मुसीबत आईल
ना कवनो मज़बूरी रोक सकेला
ना कवनो मुसीबत रोक सकेला

आ गइनी पिताजी जी जब भी औलाद याद कईल
ना पिता जी के कवनो मिल के दुरी रोक सकेला
ना कवनो जेठ के दुपहरी रोक सकेला
ना कवनो भादो के मेघ रोक सकेला

आ गइनी पिताजी स्नेह के झाव बनके
ना कवनो पिताजी के आसमान से बीजूरि रोक सकेला
ना कवनो पैसा रोक सकेला
ना कवनो पईचा रोक सकेला

आ गइनी पिताजी माई के गहना गिरवी करके
ना कवनो पिताजी के लोर के सिंदूरी रोक सकेला
ना कवनो मोह रोक सकेला
ना कवनो धन के लोभ रोक सकेला

आ गइनी पिताजी विशाल हिर्दय लेके
ना पिताजी के कवनो धन के तिजोरी रोक सकेला
आ गइनी पिताजी जब औलाद पर मुसीबत कबहुआइल
ना कवनो पवन के झकोरा रोक सकेला
ना कवनो सागर के हिलकोरा रोक सकेला

आ गइनी पिताजी कांटा से भरल पथ पर
ना कवनो पाव में पड़ल छाला रोक सकेला ।।
हर दुःख मुसीबत के पिताजी हँस के झेल जानी
औलाद पर आवे मुसीबत पिता जी मौत से भी खेल जानी।

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