देवेन्द्र कुमार राय जी के लिखल दू गो भोजपुरी कविता

देवेन्द्र कुमार राय जी
देवेन्द्र कुमार राय जी

कवन बात हम सीखीं

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केकरा से जीनीगी के बात हम सीखीं।
भईल समाज कनईल के फेंड़,
उगल बा सगरो बेवहार के रेंड़।

संस्कार के जलकुंभी हरिआता,
चारो देने खाली कुश बोआता।

मानवता के दुबि ना लउके,
स्वार्थ के घोडा़ सरपट धउगे।

ग्यान के गगरी गईल सुखाय,
बिचार के माटी बलुआईल जाय।

करनी के सिकुड़ल जाता बधार,
झूठ प चढ़ल जाता निखार।

अब कवन नाया कहानी लिखीं,
केकरा से——बात हम सीखीं।

जेने देखीं धुंआईल लउके,
सभ केहु अझुराईल लउके।

अझुरावे वाला खुब परिछाले,
सझुरावे वाला लातन धंगाले।

जे करी पंचईती ठीक,
सभ कहे उ गईल बा बिक,
लागे मधु छोडि़ मरीचईए बिकी,
केकरा से——-बात हम सीखीं।

सगरो मचल बा आपाधापी,
चरक गईल बिश्वास के बैशाखी।

आस के बांस कहवां खोजी,
उठे ठेंगुरी कहवां खोजी।

कवन शास्तर के पोथी बांची,
भरल बा अविश्वास के खांची।

जतना बुझाईल पतवार खींचाईल,
हमरो ग्यान के समुन्दर सुखाईल।

रउवे कहीं अब का हम लिखीं ,
केकरा से——-बात हम सीखीं।

जीनीगी के कईसन गीत

केहु भीरी सुंघे के ना एको दाना बा,
त केहु भीरी भरल खजाना बा।

बैंक के हिंसाब करत केहु के छुटे पसीना,
भूख से तड़पत केहु के दुभर भईल बा जीना।

केहु सुंघ के छोडे़ला छप्पन भोग,
ना मिले दु कौर केहु के ई कईसन संजोग।

केहु पिघलत अलकतरा प चलेला,
त केहु एसी में समय बितावेला।

धनि बिधाता धनि रचल बिधान,
कईसन ई रचल जमाना बा,
केहु भीरी सुंघे———–भरल खजाना बा।

बान्हि चले तलवा में केहु पलास के पत्ता,
त केहु के उड़न खटोला भी लागेला सस्ता।

केहु के मोट गलैचा प नींद ना आवे,
त केहु टुटही खटियो ना पावे।

हमरा से मिले केहु आवे ना दुआर,
केहु से मिले खातीर पुलिस के आभार ।

चारो देने अजबे रंग घोराईल बा,
लिखेवाला जाने कईसन दिवाना बा,
केहु भीरी सुंघे———-भरल खजाना बा।

देखीं सभे केहु रोपेया के आंच में जरे,
त केहु चार दाना खातीर जीनीगीभर मरे।

हमरा फटही प केहु के आवेला घीन,
उन्हुकर पेवन लागल केहु ले आवेला कीन।

जीनीगी के लिखल कहानी के राय,
ई कईसन बहाना बा,
केहु भीरी सुंघे के ना एको दाना बा
त केहु भीरी भरल खजाना बा।

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