विमल कुमार जी के लिखल तीन गो भोजपुरी कविता

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आदमी आदमी के खाई तनिको ना सकुचाई

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मनई के देहि छोट होखे
लाद बढ़ल खुब जाता,
खा गइले सभ चिरई चुरूंग
बिरिछो कइले नपाता।
बदरी के बुढ़ारी आईल
उठल बइठल न जाये,
सुरूज आग उगिला तारे
पानियो छटपटाये,
धरती के तन झुरा झुरा के
फाट गइल बेवाई,
आदमी आदमी के खाई
तनिको ना सकुचाई।

मुदई मोखालिफ के नाम प
हिते लगावे फंदा,
देह जान अब कइसे बांची
खूने बा जब गंदा।
पसर रहल बा रोग कुकरम
बनि के तगड़ा धंधा,
सभ कुछ देखियो के लोगवा
बनल आँख के अंधा,
पइसे के अब महल पिटाता
इजत प दागि लगाई,
आदमी आदमी के खाई
तनिको ना सकुचाई।

केहु अफरे केहु लाद ध के
जाति पाति में बँटल,
केहु जोंक केहु अँठई बन
चुसे खातिर बा सटल।
लसरी निकाल मानवता के
फँसरी पा लटकावे,
टुपुना चुआ के उ घरियारी
ओठ प जीभ फिरावे।
गोटा ता गोटा होखेला
भतियो प जीभ चलाई,
आदमी आदमी के खाई
तनिको ना सकुचाई।

बाचल खुचल हरियरियो के
मोटरी अब बन्हाता,
खिलल जिंदगी के बगइचा
तड़प तड़प मुरझाता।
स्वारथ के सूनामी आके
सभ कुछ लिल जाई
पथले के मकान सभ लउकी
सभ सरजांव तँवाई।
लरिका नोचिहे स माई के
मइयो जमते चबाई,
आदमी आदमी के खाई
तनिको ना सकुचाई।
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अँखिया से बहे झर झर लोर

छोट फुदगुदी खेले अँतरा,
का जाने का होखे खतरा,
बाझ नोचलस ओकर ठोर
अँखिया से……..

पाँखि ध फेरु बाहर खिचलस,
बहसी बन के फिर तन चिखलस,
गाँव शहर में मचल पुरा शोर
अँखिया से……….

देह नोच के कइलसि गुदरी,
खूने के धार पसरल सगरी,
ले आइल एगो दुखद भोर
अँखिया से………..

कुकरमी कई कुकरम भागल,
सुतल मानवता कहाँ जागल,
तड़पे हिया सिहरे तन मोर
अँखिया से……….

मनई जिम्मे सभ गिरल करम,
गेयानी होलन टूटल भरम,
अन्हेर मचल बा चारो ओर
अँखिया से………..

चिरई परि गइल चलल न जोर,
टुकी टुकी कइलस हाथ गोर,
टूट गइल तब साँस के डोर
अँखिया से………
×××××××

होई जीवन हराभरा

ना कबो केहू प भार बनीं।
ना काँट कूश हथियार बनीं।
करीं प्यार सभका से खुबिये,
अउर बनाईं हँसि के जतरा,
तब होई जीवन हरा भरा।

बितल बात प पाछताईं मति।
कठिन घड़ी में घबराईं मति।
नेक करम से मति दुर भागीं,
चाहे आवे कतनो खतरा,
तब होई जीवन हरा-भरा।

बाते – बाते में मति रोईं ।
आपन दीद रवा मति खोईं।
घुम-घुम के खुशी बाँटल करीं,
मति परल रहीं कबो अधममरा,
तब होई जीवन हरा -भरा।

आम नीम अउर जामुन बनीं।
सरफ शैंपू कबो साबुन बनीं।
छाँहो दिहीं मइल साफ करीं,
घाम लगे भा होखे कचरा,
तब होई जीवन हरा- भरा।

जरि के खुबिना परकास करीं।
देश के नामे इ माँस करीं।
मरियो के हो जाईब अमर,
रोई धरती बरसी बदरा,
तब होई जीवन हरा – भरा।
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