प्रभाकर पांडेय गोपालपुरिया जी के लिखल की अउर रावन जरि गइल!

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हर सालि दसहरा में रावन जरावल जाला पर इ केइसन रावन बा की जरि के भी ना जरे। एक दिन रातिखान सुतत समय हमरी दिमागे में इहे चलत रहे की रावन आ गइल। सपना में आइल की साँचों के आ गइल, पता नइखे पर रावन आइल। रावन की अवते हम खटिया पर उठि के बइठि गइनी अउर रावन से कहनी की रावन! तूँ बतावSकी हर सालि तोहके जरावे के काहें परे? रावन ठहाका लगावत कहलसि, “सालि में एक्के बेर दसहरे में काहें! हमके रोजो, हर घड़ी, हर पल, लाखन आदमी जरइहें तब्बो हम जरि के भी ना जरबि।” हम पूछनि, “काहें? का तूँ अमर बाड़S?” रावन तनि गंभीर हो के कहलसि, “ना हो अमर त नइखीं, पर तहई लोग हमके अमर बना देले बाड़S जा।” रावन के ई बाति हमरी समझ से परे लागल। हम अपनी दिमागे पर बिना जोर डलले रावन से पूछनी की उ कवनेगाँ? रावन कहलसि की जेयादे सोंचले के ताक नइखे। हमके जरावे खातिर दसहरा की एक महीना पहिलहीं से तूँ जवन घोर-माथ क के, तइयारी क के दसहरा मनवलS ह अउर हमके जरववलS हS, ए ही पर विचार क लS। ई लगभग एक-डेढ़ महीना की समय में तूँ जवन भी काम कइले बाड़S, ओ ही पर विचार करS, तोहके तोहरी सवाल के जबाब मिल जाई। एतना कही के रावन नपत्ता हो गइल। हम पिछला एक महीना की गतिविधियन पर नजर दउड़ावे लगनी। आईं, एक महीना पहिले ले चलतानी।

अच्छा त सबसे पहिले हम इयार-संघतिया मिली के जोरदार तरीका के दसहरा मनवले पर विचार कइनीं जाँ। तय इ भइल की इ बेरी दसहरा में गर्दा-गर्दा मचा देवे के बा। लाखन रूपया खरच होई पर रावन एइसन बनी की लोग देखते रहि जाई। गाँव-जवार का जिला में ओइसन रावन केहू के ना रही। केहू के रावन छोट बनेला त के हू के लमहर, केहू के मोट होला त केहू के पातर पर हमनी जान के रावन एकदम्मे रावन लेखा रही। फेर तय इ भइल की ए बेरी चंदा वसूलले में तनको कोतहाई नइखे बरते के। अउर बिहनईं से चंदा वसूलले के काम सुरु।

सबेरहीं नहा-धो के, झारि के जइसहीं घर में से निकले लगनी, माई खांसत कहलसी की ए बाबू, बिहाने-बिहाने कहाँ चलि देहलS? आजु हमार तबियत ठीक नइखे, गोबर-गोहथारि क लS अउर अपनी बचवा के इस्कूले छोड़ि द, ओकरी बाद कहीं जइहS। तनि हमरा रिस बरल। हम कहनी की माई बचवा एक दिन इस्कूले ना जाई त असमान ना टूट परी। अगर गइल जरूरी लागि त बाबूजी से कहि के छोड़वा दिहे अउर सुन, गोबर-गोहथारि तें बाबुएजी से करवा लिहे। एतना कहत, कालर टाइट करत हम घर में से निकली गइनीं। रमेसर काका की दुआरी पर हमार गोल एकट्ठा भइल रहे, फेर बिना देर कइले एगो लमहर रसरी लेहले हम अपनी गोल की साथे चउराहा पर निकल गइनीं।

चउराहा पर पहुँचि के दुगो संघतिया रसरी पकड़ि के सइकिलिहन की साथे-साथे उहाँ से गुजरेवाला हर राहगीरन, गाड़ियन के रोके लागल अउर हमनी जान लगनी के चंदा वसूले। जिन चंदा देहले में जेयादे नाकुर-नुकुर करें उनसे हाथापाईं कइले में भी हमनीजान परहेज ना करींजा। जबरजस्तियो चंदा वसूलाए लागल। कुछ लोग डेरा के, जवन मँगा, उ दे दे। का जाने कवनेंगा चंदा वसूलइले के भनक एगो सिपाही के लागि गइल। उ मोटरसाइकिल दउड़ावत चउराहा पर आ गइल। हमार गोल तनि सकपका गइल। उ सीधे मोटरसाइकिल लिया के हमरी लगे रोकलसि अउर कहलसि की को हो बाबा, बहुते चंदा वसूलाता। हम अबहिन कुछ कहहीं के रहनीं तवलेक उ हँसत फेरु तनि धीरा के कहलसि, “वसूलS जा पर दिनभर में जेतना वसूलिहS जा ओकर 20 परसेंट हमके दे दिहS जा।” एतना कहि के उ मोटरसाइकिल दउड़ावत आगे निकलि गइल। अब त हमनीजान के पुलिस के सह
भी मिल गइल रहे। लाठी-डंटा ले के सड़की पर खड़ा हो के जोर-सोर से चंदा वसूलल सुरु क देहनी जाँ।

जब दिन डूबे लागल त एगो संघतिया कहलसि की चउरहवन पर जवन दोकानि-सोकानि बानिसन, ओहू लोगन से चंदा लिया जाव। ओकरी एतना कहते हमनी जान दोकानदारन से भी चंदा वसूलल सुरु क देहनी जाँ। दोकानदार लोग जवन अपनी मोन से देव लोग, ओतना ना लिआव, जबरजस्ती ओ हू लोगन से वसूलाए लागल। एगो पेड़े की नीचे एगो मोची बइठल रहे। हम अपनी एगो संघतिया की साथे ओकरी लगे पहुँचनी अउर कहनी की दसहरा के चंदा दे दS। मोची बोरी की नीचे से 10-5 रूपयन में से एगो दस के नोट निकालत कहलसि की बाबू, एतने ले जा जा। आजु अबहिन ले 40-50 रुपया ही कमइले बानी। इहाँ से घरे गइले की बाद लइका के दवाई करावे खातिर चउरहवे पर ले आवे के बा। मंगरू डाक्टर के अबहिन 300 रुपया उधार बा। कहत रहने हँ की जवलेक पीछे के चुकता ना करबS, तोहरी लइका के दवाई-बिरो ना करबि। मोची के इ बाति सुनी के हमरी मुँहें में से निकलि गइल की तोहार लइका, मरो-भा- जियो, ओ से हमनीजान के का करे के बा। चुपचाप कम से कम पचास गो रुपया द तब्बे तोहार जान बची ना त तोहार सामान-ओमान फेंकि-फाँकि देइब जाँ। उ मोची आँखि में पानी लेहले पास में एगो पेंचरसटहा से 25 रुपया करजा लेहलसि अउर कवनोंगाँ साटि-सुटी के पचास रुपया थमा देहलसि।

दसहरा खूब अच्छा तरे मनल, रावन भी एक नंबर के बनल रहे। गाजा-बाजा की साथे रावन दहन भइल। एक-आधगो बड़ नेता भी आइल रहे लोग। ओ ही राती रावन जरले की बाद चंदा में बचल रुपया से मुर्गा-सुर्गा आइल रहे। खूब खवाई भइल अउर चाँपि के पिआई भइल। फेनु इ तय भइल की अगिला बरिस ए हू से अच्छा तरे रावन के जरावल जाई। अरे इ का पिछला एक-डेढ़ महीना के बिरतांत अबहिन सोंचल खतमे भइल रहे की रावन फेनु आ गइल अउर ठहाका मारि के कहलसि-

जरा के भी हमके जरा ना पइबS जा, हर गल्ली-मोहल्ला में खाली रावन ही रावन पइबS जा,
अरे मन खोलि के देखS जा, हम ओतना बुरा ना रहनीं जेतना तोहS लोगन बाड़S जा,
हम त खालि रावन रहनीं, एगो राक्सस, पर तोह लोगन रावन के बाप बाड़S जा,
जरावत रहS जा रोज रावन के अउर रावन के बाप बनि के बइठल रहS जा, रहS जा, रहS जा।

प्रभाकर पांडेय गोपालपुरिया
भोजपुरी नगरिया
9892448922

एह पोस्ट पऽ रउरा टिप्पणी के इंतजार बा।

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