रत्नेश चंचल जी के लिखल भोजपुरी गजल

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शहर में रह के सकुताइल रहीला
गांवें जाए बदे अकुताइल रहीला ।

रोजी रोटी के फेरा जवन ना करावे
एही से त हम चुप लगाइल रहीला ।

परानी छोड़ आपन परदेश में बानीं
दु पइसा के बंधन में बन्हाइल रहीला ।

बाबुजी फोन पे कुछ कह ना पावें
बोली माई के सुन के धधाइल रहीला ।

याद आवे चबूतरा बरम बाबा के
हर घरी हम ओहीजे खिंचाइल रहीला ।

खेत खरीहान आपन विराना भइल
बारह घंटा इहां हम जोताइल रहीला ।

उ बचपन के संगी बोलावें हमें
इहां भीड़ में हम भुलाइल रहीला ।

ओह माटी के गंध कबो ना बिसरे
जवना याद में हम सनाइल रहीला ।

भाग दौड़ के जिंदगी से उब गइल बानीं
अब अपने आप से कोहनाइल रहीला ।

रत्नेश चंचल
वाराणसी
संपर्क-9335505793

एह पोस्ट पऽ रउरा टिप्पणी के इंतजार बा।

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