गरीबी

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कामेश्वर भारती
कामेश्वर भारती

बाबु के लागल
बुखार मितवा।
मिले ना दवाई
उधार मितवा।
काढ़ा बनाइले
बाबु के पिआइले।
होखे ना तनिको
सुधार मितवा।
डाक्टर सरकारी
चलावे आपन क्लिनिक
लेके पगार मितवा।
बाबु के लागल
बुखार मितवा।
बिनु दवाई मर
जाले बाबु,
लिखल ईहे
लिलार मितवा।
गँउवा गिरावँ
के ईहे कहानी,
आजो “पथिक,
बा झोपरी
अन्हार मितवा।
बाबु के लागल
बुखार मितवा।

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