सरकार की अस्पष्ट भाषा नीति भारतीय भाषाओँ के विकास में बाधक

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भारत में भूमंडलीकरण का प्रभाव जहाँ उद्योग, शिखा, कृषि के साथ साथ हमारी भारतीय भाषाओँ पर स्पष्ट दिखने लगा हैं। 1990 से भारत में शुरू हुयी वैश्वीकरण के धीमी गति की प्रभाव अब २४ वर्षो के सफ़र में परिणाम के साथ सामने आने लगा है। देश में भाषा नीति की अनुपस्तिथि ने भारतीय भाषायों को पनपने में क्या मदद किया या उसे मारने के कोई कसर छोड़ा जगजाहिर है। हिंदी कि हालत भी दिन ब दिन पतली हुयी है और हो रही है फिर बांग्ला, मराठी, तमिल या अन्य कैसे अछूता नहीं हैं। होगी भी क्यों नहीं? अब इस परिस्तिथि में भारतीय भाषाओं के भीतर जन भाषाएँ, लोक भाषाएँ और आदिवासी भाषाओँ का क्या हाल है इसे देखें।

राजनीती के वजहों से आज संविधान के 8 वीं अनुसूची में २२ भारतीय भाषाएँ शामिल हैं। भारतीय भाषाओँ के गृह मंत्रालय ने मान्यता दे दी फिर साहित्य अकादमी ने इन भाषाओँ को मान्यता देती है इसके अलाव अकादमी राजस्थानी और इंग्लिश (अंग्रेजी) को मान्यता देती है जिसके लिए अकादमी यह बतलाने पर तैयार नहीं कि किस नियम के तहत इन दो भाषाओँ को मान्यता दी गयी है। अकादमी का यह सकारात्मक रूप केवल इन दो भाषाओँ के लिए ही क्यों? भारत कि अन्य लोक भाषाओँ, जन भाषाओँ या आदिवासी भाषाओँ के लिए क्यों नहीं? इन जनभाषाओं वैसे भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी या अन्यों के लिए दोहरा मापदंड क्यों? साहित्य अकादमी के अध्यक्ष लोक साहित्य में शिष्ट साहित्य आवर्धक लेन्स लगा कर देखते हैं। शायद कबीर, रैदास, मीराबाई, तुलसी दस, जायसी की भाषा को शिष्ट साहित्य मन लिया है पर दूसरे लोग जो इन जन भाषाओँ में लिखते हैं वे जंगली या गँवार हैं?

आज भाषाओँ के साथ सरकार के सौतेला व्यवहार साफ दिखाई दे रहा है, कुछ भारतीय भाषाओँ को इलीट भाषा बनायीं जा रही है और दूसरी भाषाओं को मरने पर मजबूर किया जा रहा है। उसके संरक्षण या बढ़ावा हेतु कोई भी कदम नहीं उठाया है कोई नीति नहीं। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने 8 वीं अनुसूची कि कुछ भाषाओँ को इलीट या क्लासिकल (शास्त्रीय/प्राचीन) भाषा होने का ठप्पा लगाना शुरू किया है नतीजा यह हुआ है कि अनुसूची में सम्मिलित भाषाओँ में प्रतिस्पर्धा शुरू हो गयी है। तमिल (2004), संस्कृत(2005), कन्नड(2008), तेलुगु(2008) एवं मलयालम (2013) को इलीट भाषा घोषित कि गयी है, उन्हें ये गौरव संस्कृति मंत्रालय ने 2004 से 2013 के बीच प्रदान दी गयी हैं परिणाम स्वरुप अन्य सूचीवद्ध भाषाएँ जैसे मराठी, बंगाल, उड़िया आदि इलीट भाषा बनाने के होड़ में लगी है वही हिंदी एक किनारे खड़ी है? फिर सवाल ये है कि भोजपुरी जैसे जन भाषा को सरकार क्या समझती है? जिसे ना गृह मंत्रालय, ना संस्कृति मंत्रालय, ना साहित्य अकादमी ना ही यूजीसी मान्यता देती है।

भारत सरकार जो कर रही है वो तो कर रही है राज्ये सरकारों के कार्यकलाप देखें। झारखण्ड ने १२ भाषाओँ को द्वितीय राज भाषा कि दर्ज दी जिसमे आदिवासी और क्षेत्रीय भाषाएं हैं परन्तु वही भोजपुरी, मैथिली, अंगिका और मगही को बाहर का रास्ता दिखलाया जबकि मैथिली संविधान की 8 वीं अनुसूची में शामिल है। सरकार यह भाषा नीति राजनीती से प्रेरित है, वही बिहार या उत्तर प्रदेश जहाँ भोजपुरी भाषा भाषियों कि संख्या करोड़ों में हैं वहाँ द्वितीय राज भाषा की दर्जा प्राप्त नहीं है। बिहार में भोजपुरी अकादमी (1978) बनी है पर उत्तर प्रदेश में अब तक नहीं। दिल्ली सरकार ने 2008 में मैथिली से साथ भोजपुरी कि अकादमी बनायीं हैं वही भोपाल में मध्य प्रदेश सरकार ने 2013 में भोजपुरी साहित्य अकादमी बनी पर सारी की सारी अकादमी भाषा बचाने में लगी है ऐसा नहीं लगता। राजनीति से प्रेरित ये अकादमी अभी मूल कार्य में नहीं लगी है। दिल्ली कि मैथिलि भोजपुरी अकादेमी में भोजपुरी- मैथिली कि पत्रिका के लिए कोई संपादक नहीं। सरकार ने दो सालो से सचिव पद पर कोई भर्ती तक नहीं की। यहाँ तक वहाँ विद्यापति या भिखारी ठाकुर के जन्मदिन के बारे में कर्मचारियों को पता नहीं। भाषा की अकादेमी में उस भाषा से जुड़े विद्वानों से मरहूम है और लोग जो हैं वे बस अपनी नौकरी कर रहे हैं। दूसरी बात दिल्ली अकादेमी सदस्य को देखे वे बस नाम भर के सदस्य।

पीपुल्स लिंगुस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया कि एक रिपोर्ट (2013) में आयीं उसके प्रमुख डॉ गणेश दवे के अनुसार “भोजपुरी भहरात में सबसे तेजी से बढ़ने वाली भाषा है पर यह किसी राज्य विशेष की भाषा नहीं इसलिए यह तेजी धीरे धीरे क्षय हो जायेगी।”

दवे साहब कि बात ठीक भी लगाती है भारत सरकार/राज्य सरकार कि अस्पष्ट भाषा नीति इसके लिए जिम्मेवार हो हैं साथ में इसके बोलने वाले भी.
एक पीढ़ी, दो पीढ़ी, और तीसरी पीढ़ी के बाद या आने वाले 25-30 सालों में इसके बोलने वाले कम होंगे जैसा कि कैरेबियन देश सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद टोबैगो, या मारिसस जैसे देशों में देखें। मारिसस में भोजपुरी वाले 12-15 % ही बचे हैं। क्रिओल और फ्रेंच के मार से कराह रही मारिसस के लोगों ने भोजपुरी का त्याग कर हिंदी अपनाया।

विचारणीय प्रश्न यह है भोजपुरी कि संवैधानिक मान्यता कि माँग 1966 से शुरू हुयी पर अब तक का परिणाम ढाक के तीन पात. छोटी छोटी आंदोलन सफल हो गयी हमारी भाषा की आंदोलन का परिणाम क्यों नहीं? सामूहिकता कमी दिखती जरुर है।

वैश्वीकरण के इस दौर में भोजपुरी कि जरुरत किसे है, हिंदी जरुरत भर कि भाषा है और पढ़ाई कि भाषा अंग्रेजी बन रही है, सत्ता पर, सरकार पर, शाषन पर हर जगह मौजूद, भोजपुरी क्षेत्रों में भी सबको मुहँ चिढ़ाते रानी बनीं हुए है। पिछड़ेपन की मार, विकास से कोसो दूर, पलायन का दर्द झेलता और हीनग्रंथि से स्राव से त्रस्त भोजपुरी क्षेत्र में अंग्रेजियत इस कदर हावी ही कि वहाँ गाँव और कसबों में अंग्रेजी माधयम कि विद्यालय गली गाली विद्यमान हैं। सरकारी उपेक्षा का आलम हैं कि भोजपुरी किसी स्तर पर विद्यालय में पढ़ाई का माध्यम नहीं है। भोजपुरी जब विद्यालय के प्राथमिक स्तर पर नहीं है फिर क्या समझा जाए भोजपुरी बच जायेगी जब हिंदी कि स्तिथि संदिग्ध है. जिन विश्व विद्यालयों में भोजपुरी है वहाँ छात्रों कि संक्या नगण्य या फिर उगलियों पर गिनती करने लायक। कारण एक और है भोजपुरी से बी. ए., एम. ए., या पीएच- डी करने के बाद नौकरी कहाँ है? भोजपुरी के विकास में लगी संस्थाओं को देखें स्वार्थ और जाति के, राजनीती के परिधि में घिरी हुयी है उन्हें भाषा विकास से कुछ लेना देना नहीं। संस्था चलने वालों के बच्चे भोजपुरी तक नहीं बोलते फिर दूसरे से अपेक्षा क्यों? दिल्ली जैसे महानगरों में भोजपुरी बस एक से दो पीढ़ी के बाद भविष्य की बात हो जायेगी। हमारे बच्चे भोजपुरी को बच्चा ले ऐसा सोचना सपना भर है। भाषा बचने कि गारंटी उसके बोलने वाले देते है पर उनके घर में ही उसे सम्मान नहीं तो उसके बचने की सम्भावना कम ही दिखती है।

सरकार की अस्पष्ट भाषा नीति और हमारी भाषा के प्रति अगम्भीरता भाषा विकास में सबसे बड़े बाधक हैं।

लेखक – संतोष पटेल
भोजपुरी ज़िन्दगी पत्रिका के संपादक हैं
ईमेल – [email protected]

एह पोस्ट पऽ रउरा टिप्पणी के इंतजार बा।

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