मन काँव-काँव करके बोलावेला

श्वेताभ रंजन
श्वेताभ रंजन

श्वेताभ रंजन
श्वेताभ रंजन
काल आँगन के कोन से उ बोलवत रहे
काँव-काँव करके आवाज़ लगावत रहे
सर्दी के काली रात से सूरज निकल के
ओस के समंदर के भगावत रहे
काल आँगन के कोन से उ बोलवत रहे

उकर आवाज़ के जोर ,बार-बार इ शोर
हमरा के जगावत रहे
दुवरा नीम के पतइ ,सर्दी में सिकुड़ा के
हलके धुप के निहारत रहे
काल आँगन के कोन से उ बोलवत रहे

सर्दी में ठिठुराइल इ
मन के जगावत रहे
सायेद इ कहे खातिर
गला फाड़ के चिलावत रहे
काल आँगन के कोन से उ बोलवत रहे

काहे मौसम के मिज़ाज़ से बदल
जाला ,इ मन
सोच के विचार के सब ,फिर
बिसर जाला ,इ मन
काहे ना हर सोच के
मकसद तक पहुँचावेला

सायेद एही से ,मन काँव-काँव
करके बोलावेला
काल आँगन के कोन से उ बोलवत रहे
काँव-काँव करके आवाज़ लगावत रहे

– श्वेताभ रंजन (आखर के फेसबुक पेज से)

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