कन्हैया प्रसाद रसिक जी के लिखल शऊर

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जबान कीमती बा तउल के बोलऽ
सोच समझ के आपन मुँह खोलऽ

लोग का से का समझ लेता , बिना कुछ समझवले
बात के अर्थ निकाल लेता , बिना कुछ बतवले

प्यार के परिभाषा मिट गइल बा
सभ प्यार तन पर सिमट गइल बा
हाहो दइया लागल बा नोट खातिर
चेहरा पो उदासी फिट भइल बा

रिस्ता नाता तार तार भइल जाता
अपने खातिर सभ कइल जाता
पुरनिया के पैर छुवल भुला गइल बा
देखलऽ इ नयका जमाना आ गइल बा

घर के खाना निमन नइखे लागत
देखऽ लोग होटल में बा भागत
दाल भात तरकारी आउट औफ डेट हो गइल बा
देखऽना पिज्जा खा के बबुआ अप टू डेट हो गइल बा

चुप ना रहऽ का टरटराइल बाड़ऽ
धीरज धरऽ का घबड़ाइल बाड़ऽ
रसिक छोड़ऽ कविता लिखल
जांगर चलावऽ काहें मेहराइल बाड़ऽ

एह पोस्ट पऽ रउरा टिप्पणी के इंतजार बा।

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