गारी

” गारी ”

– प्राचीन काल से चलल आ रहल एगो अईसन परम्परा ह जवना के लोग हिसाब से जगहि देखि के मोका प प्रयोग करेला ।

– गारी प्राचीन काल से बिआ आ आगे जब ले सुरज आ चनरमा रहिये तब ले एकर प्रयोग होत रही ।

– अईसे त गारी गवाला , गारी दिअईबो करेला , गारी खियावल जाला , गारी सिखावल जाला , गारी सुनावल जाला , गारी गरियावल जाला ।

– केहु सवखे देला केहु दुखे देला केहु बात बात प गारी देला त केहु नापि जोखि के गारी देला कतना लोग खाति गारिये पारन ह त कतना लोग के खाना तब ले ना पचेला जब ले उ केहु के गरियाओ जनि , आ समधि लो त बिना गारी के खईबे ना करेला लो ।

– बाबुजी गरियवले त आसिरबाद भईल केहु दोसर गरियावल त सराप , बाबुजी के गरियावाला प बेटा डेरा जाला आ केहु अनका के गरियावला प मडर हो जाला ।

– केहु के सुधार देला त केहु के बिगाड देला , केहु सोझ हो जाला त केहु टेढ हो जाला , केहु सटहा लेखा होला त केहु बेहाया हो जाला ।

गारी के रुप- गारी कबो तीत त कबो मीठ होले , गारी कबो फुहर त कबो नीक होले । लोग गारी , लोगन के काम के परतोख ले के त कबो रिस्ता नाता के हिसाब से त कबो जाति के हिसाब से देला ।

गारी , मजबुर , असहाय , गरीब , अबर दुबर के हथियार ह त बेहाया बदमास लंठ दबंगन के श्रृंगार ह ।

गारी कबो कबो झगडा के शुरुवात ह त भोरभोरे बाबुजी के मुह से निकले वाला प्रवचन के सौगात ह ।

गारी मोका प नीमन से सरिहार के लागे वाला दिआउ त जेकरा खाति दिआला उ सोझ हो जाला बाकी खने खन गारी दिआउ त गारी देबे वाला के मुह खराब हो जाला ।

गारी सिखावेले, गारी रिगावेले , गारी पिनिकावेले ,गारी भडकावेले , गारी कबो नीमन त कबो बाउर कहाले ।

गारी रउवा खाति एगो बरिआर हथियार ह एकरा के हिसाब से मोका प निकाले के चाही ई बहुत मारक असरदार दवाई ह जवना मे देहि के बकियवा कवनो अंग काम ना करे एह काम मे खलिहा मुह आ जीभ चलेला , गारी करेजा से निकले त सामने वाला के करेजा चीर देले ।

एहि से गारी के सम्हारि के सरिहारी के जगहि आ बेरा देखि के देबे के चाही , काहे कि जे खने खने गरियावेला उ छुतिहर , बउचट , बम्मड , लतखोर आ बद कहाला ।

रउवा खातिर:
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