विद्या शंकर विद्यार्थी जी के लिखल भोजपुरी गजल

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लोग कुछ भी कहे

वोजह कवनो रहे बात त चलते रहे
लोग कुछ भी कहे बात त चलते रहे

ऐने हप्ता दिन से कुछ अनबन रहल
बाधा रहे त रहे मुलकात त चलते रहे

काहे केहूके बा अनबन जाने के मन
खुदकी चले जले शरारत त चलते रहे

दिन में भले ना चले मिले सोहाये के
चाननी रात तऽ सोहात त चलते रहे

दर्द बढ़ेके रहे ना दिलके कहेके विद्या
समय के साथ से ओरात त चलते रहे।

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अंगार अबहीं तलफल बा

लहर त बुत गइल अंगार अबहीं तलफल बा
कहीं हवा बा बेसी रफ्तार अबहीं हलचल बा

लपेट में कमे आवेला आग के हवा देबे ओला
धरा गइल उहे जे बेगुनाह अबहीं निश्छल बा

शीशा के चूर क देलस ढेला बा औरी ताक में
होखे के पता चाहीं राह में अबहीं दलदल बा

पूरा भरोसा कइल मुनासिब ना होला कबहूँ
आदमी उहे बा नीयत में अबहीं कलछल बा

बस्ती बस्ती आ शहर में चलल चर्चा बा विद्या
शोर कमल बा पर गली में अबहीं गलबल बा ।
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काहे केहू आसरा देला

जाला बाहर तऽ काहे केहू आसरा देला
लोर ढरका देला काहे केहू आसरा देला

बिहँसे के साध ना केकर हउए दिल से
दिल बिहरा देला काहे केहू आसरा देला

दिन तिके के होला त रात होला झखे के
आश चिहिका देला काहे केहू आसरा देला

दिन गिनती कइल कठिन होला अँगुरी प
रोज कुहूँका देला काहे केहू आसरा देला

अंग फरके त बढ़े लागेला धड़कन विद्या
समय बिता देला काहे केहू आसरा देला ।

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