भोजपुरी कहानी भरबीतन

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एगो रहले भरबीतन । बीत्ता भर के देह, सींकिया शरीर । अपना माई के दुलरुआ एकलउत । भरवीतन के जनमते, बाप दुनिया छोड़ि देले रहलन । एह से भरबीतन अपना माई के आँखि के जोन्हीं रहले

भरबीतन जब वीत्ता भर के भइले, त गाँव के सँघतियन के आपन-आपन भइँसि चरावत देखले । भरबीतनो अपना महतारी से जिद करे लगले- हमहूँ भइँसि चराइब । उन्हुकर बीत्ता भर के देह-धाजा देखिके माई मना कइली, वाकिर भरवीतन ना मनले । आखिरकार माई के भइँसि कीनि के देबे के परल । भरबीतन सँघतियन का सँगें भसि चरावे चलि गइले ।

भोजपुरी कहानी भरबीतन
भोजपुरी कहानी भरबीतन

कुल्हि सँघतिया अपना-अपना भइँसि के पीठ पर फानि के चढि गइलन स । भरबीतन पाछा से अपना भइँसि के पीठ पर चढ़े खातिर ओकर पोंछि धऽ के लटकि गइले । ओही घरी भइँसि गोबर कइलस आ भरबीतन के देहिए पर गोबर के चोत एह तरी गिरल कि गोबर का चोत के नीचे दबा गइले । उन्हुकर सँघतिया खोजे लगलन स. बाकिर उन्हुकर कवनो अता-पता ना मिलत रहे । संजोग से गोबर बीनेवाली किछु मेहरारू जब अइली स, त गोबर के चोत उठावत खा भरबीतन ओही में दबाइल मिलले । घरे गइला पर उन्हुकर माई नहवा-धोवा के दोसर कपड़ा पहिरवली ।

जब भरवीतन के सँघतिया खेत में हर जोते लगलन स, त भरवीतनो माई से जिदिया के बेरि-बेरि हर जोते खातिर रिरिआए लगलेहारि-पाछिके माई के हर-बैल कौनहीं के परल । खेत में ले जाके हर-बैल नधइलन स । भरवीतन हर के परिहथ के मुठिया पर उचकि के बइठि गइले । बैल चले लगलन स, खेत जोताए लागल । आवे-जाए वाला लोग अचरज से देखे लागल । हरवाह लउकते ना रहे आ बैल अपने-आप चलत खेत जोतत रहलन स । परिहथ के मुठिया पर बइठल भरबीतन के हती चुकी देह केहू के लउकते ना रहे ।

ओही घरी राजा के बियाह के बरियात निकलत रहे । सभ-के-सभ बरियतिहा लगलन स आँखि फारि-फारि के ओनिए देखे । खेत जोतत बैलन के जोड़ी आ परिहथ के मुठिया पर बइठल भरबीतन । अब राजा के बरियात से धियान हटाके सभके निगाह भरबीतन पर जमि गइल । राजा खीसी अगिया बैताल हो गइले आ भरबीतन के ढकेलि के हर-बैल अपना महल में भेजवा दिहले ।

घरे आके भरबीतन माई से सभ खिस्सा बतवले । माई झूठ दिलासा दियवली, बाकिर भरबीतन ना मनले आ राजा से लड़िके आपन हर-बैल वापिस लेबे के तय्यारी करे लगले । माई राजा के हैसियत-सामरथ के बखान करत भरबीतन के औकात बतवली, बाकिर भरबीतन कवनो हाल में हार माने खातिर तय्यारे ना रहले । सींकि के गाड़ी बनवले, गाड़ी खींचे खातिर मूस के मनवले आ चलि दिहले राजा से लड़ाई करे ।

राह में जब गोजर के नजर एह अचरज पर परल, त पूछि बइठल, “का बात बा, भरबीतन भाई ?”
भरबीतन कहले,
“सींक के मोरे आरी गाड़ी,
मूस जोतिके जात बानी,
रजवा सरवा हर चोरवलस,
ओह से लड़े जात बानी !”

भरबीतन के दुस्साहस पर गोजर के अभिमान भइल कहलस, “हमहूँ तहग एह लड़ाई में साथ देब । हमहूँ तहरा सँगें चलल चाहत बानी ।”

“गोजर-गोजर आजा, कान में समा जा !” भरबीतन बोलले आ गोजर उन्हुका सँगें लागि गइल ।

एही तरी बिच्छी सवाल कइलस, साँप सवाल कइलस । हाड़ा-बिरनी सवाल कइलन स । जरत-बरत आगी सवाल कइलस । आन्हीं-पानी के सवाल पूँजल । भरबीतन सभ केहू के बस एके बात बतवले :

“सींक के मोरे आरी गाड़ी, मूस जोति के जात बानी,
रजवा सरवा हर चोरवलस, ओह से लड़े जात बानी !”

फेरु त सभे भरबीतन का सँगें चलि दिहल । साँप-बिच्छी, गोजर, हाड़ा-बिरनी, आगी आ आन्हीं-पानी के सँग-साथ भरबीतन के होसला बढ़ा दिहलस । जब सिवान पर जाके राजा आ उन्हुका मंतिरी, फौज के ललकरले, त सभ उन्हुकर खिल्ली उड़ावे लगलन स ।

ई अनेति आन्हीं-पानी से बरदास ना भइल आ अइसन बवण्डर का सँगें मूसरधार बरखा शुरू भइल कि चारू ओर त्राहि-त्राहि मचि गइल । एही बीच साँप-बिच्छी, गोजर, हाड़ा-बिरनी राजा आ मंतिरी के घेरि लिहलन स । ओह लोग के त सिट्टिए-पिट्टी गुम हो गइल । ओने आगी मए फौज के अपना चपेट में ले लिहलस ।

अब त का सिपाही, का मंतिरी आ का राजा ! सभ-के-सभ लागल चिरौरी करे आ गोहार लगावे-

“माक करऽ भरबीतन भाई !
हर-बैल अबही लवटाइब !”

हर-बैल का सँगें साँप-बिच्छी, गोजर, हाड़ा-बिरनी, आगी, आन्हीं-पानी के लेले सींक के मूस जोतत गाड़ी में जब भरबीतन अपना घर का ओर लवटत रहले, त अइसन जनात रहे, जइसे उन्हुका बियाह के बरियात निकलत होखे । भरबीतन के जबान पर बस इहे बात रहे :

“रजवा सरवा हर लवटवलस,
सउँसे कुदरत साथ निभवलस !”

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