दूल्हा के परछावन | भोजपुरी कहानी | तारकेश्वर राय “तारक”

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चिरई-चुरुंगो खातिर तरसत बसीठ काका के दुवार आज मुण्डे-मुण्ड ठका ठेच भरल बा। दुवार के, के कहे, ओसार दलान दरखोल तक ले भरल बा । काहे ना रही इहे त कुल मोका हउवन स जब हित नात आ आजकाल त घरहुँ के सवांग लोग एके संगे बटोरालन | फुवा भतीजी के भेंट मुलाकात के सुखद संजोग बनी जाला, बेटी बहिन लोग के जुटान होइला से घर गुलज़ार हो जाला । बसीठ काका के पेट पोंछवा बेटा बिकाश के बियाह ठानल बा । एह भूमंडलीकरण जुग में जब सउँसे संसार पजरा आके एक दुसरा से सटी के एगो बिश्व ग्राम के रूप अख्तियार कई चुकल बा, ओहिजे मनई-मनई के दिल के बिच क दरार दिन प दिन बढ़ते जाता ।

तारकेश्वर राय जी
तारकेश्वर राय जी

इयारी-दोस्ती, भर-भवद्दी, हितई-नतई, कुल्हिये “अरथ” के तरजुइ पर तोला रहल बा । सगरी दुनिया के एसो-आराम खाली आपन एकल परिवार हमहमार मेहरारू संतान खातिर जुटावे में बाझल बा आदमी । अरथ के बिना बेअरथ बा । छूछा के पूछवइया कमे लउकता । सयुंक्त परिवार में केहू के दुःख तकलीफ जवन पहाड़ नियन बुझात रहे एक एक सवांग सवांगी अइसे आपुस में साझा क लेत रहे के रुई नियन हलुक होके दुःख बिला जात रहे । अभावो में आदमी बम बम रहे, अकेल ना परत रहे ।

बसीठ काका आपन बिकाश के छोड़ के दुनो लइका लइकी के बियाह अपना महटरी के नौकरी के बेरा ही ओरिया देले रहलन, बाकी बिकाश के जिद उनका के हरा देले रहे । बिकाश के परन रहे, जब उ अपना पैर पर निक से खाड़ हो जइहन तबे बियाह करीहन ओहिसे त आजकाल एगो परिपाटी चलता की बियाह जोग लइका लइकी से पुछला प इहे सुने के भेटाता की “रउवा सभे के काहें फिकिर दबवले बा बियाह के, होइ न” । राह ताकत ताकत बसीठ काका महटरी के नौकरी से रिटायर हो गइलन । उनकर मन में बड़ा आस रहे की बिकास के माथे मउर देखि लेंत । अब जा के उ शुभ घरी आइल बा । आस पूरा होखे से संजोग बनल बा । सांझी के बरियात जाइ एहि खातिर सभे बटोराइल बा । चारु ओरी हंसी मजाक आ हंसी ठिठोली के बयार बही रहल बा ।

कबो सुनाता – अरे फुवा जी बड़ी दिन के बात रवुवा से भेंट भइल बा, रउवा त दिन प दिन छोकड़ी होखत जा तानी ।

ना हटबू हमहीं भेटइनी हं तोहके मजाक करे के । हंसी चारु ओरी छीटा जाता ।

लइकन के गोड़ में जइसन पहिया लागल बा घर दुवार धउर धउर अचरज से चारु और देखतान स, हेतना आदमी कुल्हिये एहि परिवार के ।

हर जगह बतकही छिड़ल बा । रेवतीपुर वाला फूफा जवन बंगलौर में नौकरी करत रहलन उ हरखू बाबा से कहलन की ये बाबा देखते देखते समय केतना बदल गइल । अब त खुदे लइका लइकी आपन जीवन साथी तय क लेता लोग न जात पात देखाता न धर्म देखाता । अब तुहि बताव अइसन बियाह में पितर न्योतनि के का जरूरत । परिवार के लोग के बियाह के टोटरम नइखे करेके पड़त । पंडी जी आपन पतरा अभी खोली के शुभ दिन के गणना कई नइखन पावत की कोर्ट कचहरी में बियाह के दिन रखा जाता । कोहार कलशा देवे के आस लगवले रही जाता, नाउ, धोबी, जजमनीका जात देखी के अपना सेलून आ प्रेस के दुकानि में बइठ गइल लोग । बारी, कमकर अउरी पवनी पजहर के पुछवइया बा ।

ठीके कहतानी – ना मामा के इमली घोटावे के परता ना ससुर भसुर ना बाजा बरात के जरूरत बा अइसन बियाह में । हरखू बाबा अपना चश्मा के साफ़ करत कहलन ।

फूफा कहलन – ये बाबा कुछ रीती रिवाज के त बदले के भी जरूरत बा समय के अनुसार ओखर, मूसर कहाँ से आई । भरसाई कहाँ खोजाई लावा भुजे के ? एह टेक्टर के जुग में गोरु के कान्ह पर धराये वाला जुआठ के मिलल मुश्किलें बा बिना जुआठ के लइका बा लइकी के नहछू-नहान कइसे होइ । ओहिसे इ कुल गते गते खतमे हो जाइ ।

एहि गहमा गहमी में माट्साब के आवाज सुनाइल – चले के तइयार होखे के गाडी आ गइली स । सभे तइयार होखे चल देहल ।

बिकाश के गाडी भी तैयार हो के दुवारी पर लागी गइल रहे । सहबला के रूप में बबलुवा अपना के कवनो भी आई पि से कम ना समझत रहे । अपना चाचा के बगल में आसन जमवले रहे । सबेरे से गइल लइकी मेहरारू ब्यूटी पार्लर से तइयार होके आ गइल रहली स, बरात जाए के तइयार रहली स । फुवा चाची बड़की माई अजिया कुल्हिये परिछावन के गीत गावत रहे लोग । नइकी गावे वाला के मुहं की और ताकत रहनी स । अइसहूँ अब के लइकी मेहरारू के मोके कहाँ भेटाता की रीती रिवाज के चीन्हे जानो ।

तवले बड़की माई के आवाज आइल – कहवाँ बा रे लोढ़ा द स रे दूल्हा परिच्छे के बा ।

सबसे पाछे खाड़ रहे चाची के दिल्ली वाली पतोह । बड़की माई कहलस – ये दुल्हिन तोहरे से कहतानी, हाली ले आव लोढ़ा देरी होता ।

उ ओहिजे खाड़ रह गइली उनका चेहरा साफ़ बतावत रहे उनकरा बुझाइल ना का मंगाता ?

जेकरा से सिली पर मशाला चटनी पिसाला उहे, बड़की माई समझवलस ।

चाची उनकर परेशानी के समझ लिहली आ कहली – ये जीजी आजकाल के बेटी पतोह कहंवा सिली प मशाला पीसत बाली स की लोढ़ा चीन्हि स । आज काल त घर घर में मिक्सी बा जवन इ कुल्हिये काम बड़ी आसानी से क देता । रुकीं हम ले आवत बानी ।

त ले आव लोग मिक्सीये ओकरे से दूल्हा परीछ देहल जाव अउरी ले आव जा पढ़ल लिखल शहरी मेम । बड़की माई खिसि बोललस ।

एह मशीन आ बिज्ञान के जुग में अब लोढ़ा कहाँ खोजाई पितर नेवते के आ दूल्हा परिच्छे के ?

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