जगदीश खेतान जी के लिखल भोजपुरी कहानी इंसानियत

जगदीश खेतान जी
जगदीश खेतान जी

घड़ी के एलारम बाजे लागल। हम हड़बड़ा के उठलीं आ बइठ गइलीं। आजे हमार बी.काम के फाइनल परीक्षा खतम भइल रहे।परीक्षा समाप्त होते भर मे मन मसतिस्क के सगरो बोझा उतर गइल रहे। विश्वविद्मालय से परीक्षा देले के बाद खाना खा के अढाई बजे के एलारम लगा के सूत गइल रहलीं कि जगले के बाद मैटिनी सो के सिनेमा देखब।

परीछा के तनाव दूर करे के इहे सबसे नीक उपाय सूझल रहे।येसे निम्मन दूसर कवनो मनोरंजन भी ना रहल। ओ समय के परंपरा के अनुसार पहिले दाढी के सेव कइल सुरू कइलीं। कांहें कि परीक्षा मे बझल रहले से दाढी पुरा बढ गइल रहे।सेव कइले के बाद दूसर कपड़ा पहिने लगलीं तबले सीसा मे रमेस के चेहरा लउकल।उ जान बूझ के ही अइसहीं आइल कि ओकर चेहरा हमके सीसा मे दिखाई दे जा।

हमरे चेहरा घुमवते भर मे उ पूछलस:-“कहां जाये के तैयारी भइल बा?”

“तू आपन मतलब बताव।बुझाता कहीं जाये के तैयारी कई के आइल बाल?” हम जवाब देहलीं।

” हां सिनेमा देखे जाये के विचार बनल बा। सोचलीं कि तोहू के साथे ले लीं।अकेल देखले मे मजो ना आवेला।” रमेस उतावली देखावत बोलल।
“कौन फिलिम देखल जाई ? हम सवाल कइलीं।

” सुनात बा कि दिलीप कुमार के “इंसानियत” नीम्मन फिलिम बा। वइसे तोहार कौन फिलिम देखे के विचार बा उहो बता द ?” उ फिर बेचैनी से घड़ी ओर देखत बोलल।

हम रमेस पर एहसान देखावे खातीर कहलीं :-“अगर तू इहे विचार कइके आइल बाल त हमहूं के तोहार साथ देवही के पड़ी।उहे फिलिम देख लेब।हमरे आ तोहरे पसंद मे का फरक पड़ता।”
आखिरकार दूनो जनी इंसानियत फिलिम देखे खातीर निकल गइलीं। गली के मोड़ पर रवीनदरा टोक देलस बाकी ओके अनसुनी कइके हम लोगन आगे बढ गइलीं।

हम लोगन एगो रेकसा के खातीर चारो ओर निगाह दौड़ावे लगलीं। लेकिन दूर-दूर ले कवनो रेकसा ना लउकत रहे ।रमेस रीस मे आके बोलल :—“सगरो रेकसा वाला जाने कहां मर गइल बान कि एको रेकसा वाला ना लउकत बा।”

हमहूं कहलीं:–“अइसे त हजार रेकसावाला मिल जालं बाकी जरूरत पड़ले पर येगो रेकसा भी नाही मिलेला।बाकी अगर आज फिलिमीये देखे के रहल ह त कुछ पहिले आवे के चाहत रहल ह।”
रमेस जवाब देहलस:—“हम और पहिले आवे के विचार कइले रहलीं बाकी कुछ अइसने मजबूरी फंस गइल कि देरी हो गइल।”

हम पूछ देलीं ” अइसन कवन मजबूरी आ गइल रहल । बरदेखुआ आ गइलं ह का?”

रमेस कहलस:–“का बताईं।बाबूजी के साहब आज न जाने कहां से टपक गइलं।उनहीं के आवभगत मे येतना देर हो गइल।उहो त टरे के नावे ना लेत रहलं।”
हम कहलीं:-“बुझाता न्यूजरील देखे के ना मिली।”

रमेस बोलल:—“न्यूजरील भला के देखेला?”

हम बोल उठलीं:—“अइसन बात नाही बा।सुनत बानी कि येमे भारत और आस्ट्रेलिया के बीच खेलल गइल क्रिकेट मैच देखावल जाता जवने मे भारत आस्ट्रेलिया के उपर एतिहासिक विजय कइले बा।येही मे जसू पटेल आस्ट्रेलिया के दूनो पारीयन मे मिला के चौदह विकेट चटकवले बा।”

“तब त न्यूजरील छूटले के हमहूं के के कम अफसोस ना होई।” रमेस बोलल।

तब तक दूर से दू तीन गो रेकसावाला आवत देखाईं देलं लेकिन नगीचे अवले पर मालूम भइल की सगरो रेकसा मे सवारी भरल बा।हम झुंझलाये लागल रहलीं।

तबले रमेस बोल उठल:–“कहीं अइसन न होखे कि हमलोगन के पहुंचले के पहिलवें हाउसफुल न हो जा आ हम लोगन के बैंरंग वापस आवे के पड़े।”

“नाहीं अइसन कवनो संभावना नाही बा। फिलिम चलले कई महीना हो गइल फिर मैटिनी शो मे त भीड़ वइसहीं कम होला काहें कि मैटिनी सो या त छात्र देखेलं या उ देखेला जेकरे खातीर समय बितावल येगो समस्या होला।” हम जवाब देलीं।

सिनेमाहाल काफी दूर रहल आ पौने तीन बज गइल रहे।फिलिम सुरू भइले मे बस पंदरह मिनट बाकी बचल रहल।तबले सामने से येगो खाली रेकसा आइल, आ आके खड़ा हो गइल। ओही रेकसा पर आंख मूंद के हम लोगन बैठ गइलीं आ सिनेमाहाल के नाम बता देलीं।बाकी इ का ? रेकसा त बड़ा धीरे-धीरे सरकत रहल।हम लोगन दम साध के कई मिनट तक प्रतिक्षा कइलीं की रेकसा के चाल मे कुछ सुधार दिखाई दे लेकिन चाल मे कवनो जियादा अंतर ना आइल।

रेकसावाला के देहीं पर कहे भर के येगो हाफ पैंट आ येगो फटहा बनियाइन मात्र रहल।बनिआइन के भीतर से हड्डीयन के उभार साफ लउकत रहल, जवने के एक-एक हड्डी गिनले पर गिना जात। कपारे के आधा बार उज्जर हो गइल रहल आ आधा उज्जर होखे के अगोरा करत रहल।

हमके अपने उपर झुंझलाहट होखे लागल आ पछतावा होखे लागल की बिना रेकसावाला के देखले हम लोगन रेकसा पर काहें बैठ गइलीं।बाकी अब का हो सकत रहल।हम लोगन पिंजरा मे बंद पंक्षी के लेखां बेबस हो गइल रहलीं।एक बेर हम सोचलीं की ये रेकसावाला के कुछ पैसा दे के कवनो दूसर रेकसा ले लीहल जां।बाकी जेठ के चिलचिलात घामे में दूर-दूर तक कवनो रेकसा के नामोनिसान तक ना दिखात रहल।येंहर रेकसावाला भी गरमी के मारे पसीना से तर बतर होत रहल।

हम रमेस से कहलीं:-” तनी देखब.सब रेकसावाला त आगे बढत चल जात बान बाकी अपनीये रेकसावाला न जाने कइसे चलावता की पछुआत चल जात बा।”
हम सोचलीं की येतना कहले से हो सकेला कि रेकसावाला के उपर कुछ असर पड़े आ उ रेकसा तेज चलावे लागे।लेकिन ओकरे उपर कवनो असर ना पड़ल आ उ ओही रफतार से चलावत रहे।या त ओके सुनाई ना पड़ल या ओकरे काने पर जूं तक ना रेंगल।

हम आपन ध्यान हटावे खातीर दूसरे विसय पर बात करे लगलीं कि जेसे रसता त नीमने बिना टेंसन के कट जा आ कवनो अफसोस न होखे।मिर्जा गालिब येही पर येगो सेर भी कहले बान:-
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन दिल को खुश रखने का गालिब ये ख्याल अच्छा है।

हम रमेस से पुछलीं:-“यूपी लाटरी के रिजल्ट कबले निकले के बा?”

“आजे त निकले वाला बा।हो सकेला अबले अखबारे मे आ गइल होखे। ।टिकट तुहू लेले बाल का?हमरे घरे सबके नाम से एक-एक टिकट लिआइल बा।” रमेस जवाब देलस।
हम कहलीं:- “हमहूं दू टिकट लेले बानी।वइसे हमके लाटरी पर तनीको विसवास न होला।हमार त इ राय बा की लाटरी के आयोजन करे वाला ही ढेर इनाम अपनीये जान पहचान वाला के नाम से निकाल ले ला।”

रमेस चुप्पीये मरले रहल।हमके अइसन बुझाइल कि उ हमरे विचार से सहमत ना रहल।वइसे उ लाटरी के हर ड्रा मे दू-चार टिकट अवश्य खरीदत रहल।

बुझाता रेकसावाला हमलोगन के बात सूनत रहल काहें कि उहो बीच मे बोल उठल:-“बाबूजी, हमहूं लाटरी के येगो टिकट कीनले बानी।”

हमलोगन ओकरे ओर उपेक्षा भरी दृष्टि से देखलीं आ मन ही मन अपने आप से कहलीं की भला येकर इनाम का निकली, इ त येगो टिकटवे लेले बा।हम रमेस के ओर देखलीं त ओहू के चेहरा पर उहे भाव रहल।हम रेकसावाला के उपरी मन से कहलीं:—“नीक कइले बाल।इनाम त केहू के निकल सकेला।”

दू बज के पचपन मिनट हो गइल रहे आ सिनेमाहाल अबहीन एक किलोमीटर से भी ज्यादे रहल।हम झुंझलाये लगलीं।आखिर हकीकत से मुंह मोड़के कबले अपनेआप के खुस रखतीं?हम लालच देके काम बनावल चहलीं आ रेकसावाला से कहलीं कि अगर समय से पहुंचा देब त दूना केराया देब।लेकिन इहो कहल काम ना कइलस।

आखिरकार हम झुंझला के कहलीं :-“हूं, यैरा गैरा, नत्थू खैरा जेकर मन करता उहे रेकसा चलावे लागता, भले देहीं मे जांगर न होखे।अइसन बुझाता की येतना आसान कवनो कामे ना रही गइल बा।”

आदमी सब कुछ सह सकेला लेकिन अपने अहं के उपर लागल चोट सहन कइल बड़ा कठिन होला फिर रेकसावाला कौनो जानवर त रहल नाही।तैस मे आके उ तेज गति से रेकसा चलावे लागल।हमके अपने कहले के उपर दुख आ पछतावा होखे लागल कि हम बिला वजह रेकसावाला के येतना कठोर वचन बोल देलीं। गलती त हमन के भी रहल जो आन्हर होके अइसने रेकसा पर बैठ गइलीं जवने के चलवइया येतना कमजोर रहल।अब अगर तेज चलवले के फेर मे रेकसा कहीं लड़ गइल त लेना के देना पड़ जाई।

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येंहर रेकसावाला अब पैडिल मरले मे हांफे लागल रहल आ पसीना से लथपथ होत रहल बाकी आपन पुरा जांगर लगा के रेकसा चलवते जात रहल।कई बेर त रेकसा लड़त-लड़त बचल।एक बेर त मन मे आइल की धीरे चलावे के कही दीं बाकी जबान पर त जइसे ताला लग गइल रहे।फिर एक बेर तेज चलावे के खातीर उतेजित कइले के बाद रफ्तार धीमा करे के कहल भी युकतीसंगत ना बुझात रहे अतः चुपचाप रहलही मे आपन भलाई समझलीं।हरीकिरपा से गनीमत इहे भइल की रेकसा कहीं लड़ल नाही।

तीन बजे वाला रहल आ हमार मंजिल याने की सिनेमाहाल सामने दिखाई देवे लागल।हमलोगन मनवे मन मे प्रफुल्लित होत रहलीं कि तबले रेकसा मे ब्रेक लागल आ रेकसावाला एक ब एक जमीन पर जा गिरल।गिरते भर मे उ मुरछित हो गइल।हमरे लगे पिये वाला पानी रहल ओही मे से पानी लेके ओकरे उपर छिड़कलीं त ओकर चेतना वापस आइल।तबले कहीं आसपास अखबार वाला के आवाज़ सुनाई देलस।उ चिल्ला-चिल्ला के कहत रहल कि:—“यूपी स्टेट लाटरी के पहिला इनाम सुखारी रेकसावाला के मिलल बा।”

हमहूं अखबार के एक प्रति खरीद के देखलीं त समाचार सोलहो आना सच रहल। हम मन ही मन सोचलीं की होई कवनो रेकसावाला।भला येगो रेकसावाला के येतना बड़वर इनाम मिलल कौन जरुरी रहल? हम मन ही मन भगवान के कोसे लगलीं।तबले रेकसावाला कराह उठल

आ बोलल–:-“पानी।”

हम ओके थोड़ा सा पानी पिअवलीं काहें कि ज्यादे पानी ओके नोकसान पहुंचा देत।उ पानी पी के अपने आप के संयत कइ के बोलल सुरू कइलस:—” बाबुजी हमार मेहरारू एक महीना से बीमार रहल।हम आपन काम धाम छोड़ के दिन रात ओकर सेवा कइलीं।डाकटर के भी बोला के देखवलीं आ दवा दारू भी करवलीं बाकी भगवान के ओकर जिंदा रहल मंजूर ना रहल।तीन दिन के बादे उ दुनिया से कूच कइ गइल।”

फेर पानी मंगलस।ये बेरी हम ओके पहिले से ज्यादा पानी पिअवलीं।ओकर आंख डबडबा गइल रहे।हमके लागल कि ओके आपन मेहरारु के याद आ गइल रहे।उ टूटल कड़ी जोड़त फेर कहे लागल:—” बाबूजी, हम गरीबन के भी दिल होला। ओकरे मुअले के सदमा से हम पागल नीअर हो गइलीं।ओकरे बीमारी मे सब रूपया खतम हो गइल।तीन दिन से हमरे पेट मे पानी के सिवा कुछ ना गइल।आज सोचले रहलीं की रेकसा चला के कुछ कमाइब त आपन पेट भरब लेकिन भगवान के त कुछ अउर मंजूर रहल।लेईं इ लाटरी के टिकट।हमरे नाम सुखारी ह।येकरे इनाम के रूपया से रउवा लोग ओ गरीबन के उपर खरच कई देब जे हमरीये लेखां मजबूर होके भूख आ बीमारी से लाचार होके भी काम पर जाये खातीर विवस हो जाला।इहे हमार अंतिम अभिलासा बा।अब हमहूं ओंहीं चलतानी जहां हमार मेहरारु हमके अगोरत होई।”

येतने कहले के बाद उ येगो लमहर हिचकी लेलस आ ये दुनिया से नाता तूड़ देलस।

धीरे-धीरे भीड़ छंटे लागल।हम लोगन टिकट लेके सिनेमाहाल मे घुसलीं।हाल मे अउर भी जान पहचान वाला दिखाई देलं।रमेस उनसे बातचीत मे उलझ गइल।

टन–टन–टन-टन घंटी बजल आ हाल मे अंधेरा छा गइल।सामने के परदा चमक उठल — – – –निर्माता — – – – – निर्देसक- – – – कलाकार- – – – संगीत अउर हमार अन्तर्मन चीत्कार कर उठल——-तु——तू——इंसानियत से सून्न, मनोरंजन के दास तू “इंसानियत” देखब ?तोहके इहां बइठले के भला का अधिकार बा और न जाने कब हम हाल मे से बाहर आ गइलीं।हमार कदम ओ ढलती दुपहर के लू मे अपने घर के ओर बढत रहल।अंतर बस येतने रहल कि अब हम रेकसा पर नाही बल्कि पैदल रहलीं अउर हमरे हाथे मे यू.पी.लाटरी के जीतल टिकट रहल ह, जेकर रूपया असली इंसानियत के काम मे लागे वाला रहल।

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