धनंजय तिवारी जी के लिखल भोजपुरी कहानी शिवचर्चा

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धनंजय तिवारी जी
धनंजय तिवारी जी

गावे अयिले एक दिन से ज्यादा हो गईल रहे, पर राधाकिशुन बो भौजी के अबे ले दर्शन ना भईल रहे। वैसे त उ ना हमरा पट्टीदारी में के रहली ना हमरा बिरादरी के ही, पर दुवार के ठीक सामने उनकर घर भईला से उनका से प्रगाढ़ रिश्ता रहे। राधाकिशुन बो भौजी के उमर पैसठ साल से तनी ऊपर ही रहे। उनकर लड़का सुबशवा हमार हमउम्र और बचपन के संघतिया रहे। उम्र में भले ही बड़का गैप होखे पर रिश्ता उ एकदम देवर भौजाई वाला ही रखस और हमके देखके बिना मजाक कईले बिना ना रहस। हमनी के गाव जवार के एगो अलग परंपरा बा जेकर निर्वाह सब लोग बड़ा मन से करेला। अयिजा माई इया के उम्र के औरत राउर भौजाई हो सकेली, रउवा से बीसन साल बढ़ आदमी भी राउर गोड लाग सकेला अगर रउवा रिश्ता में चाचा या काका लागी, हो सकेला की रउवा जनम से पहिले ही रउवा नाती पनाती के जनम हो गईल होखे।

धनंजय तिवारी जी
धनंजय तिवारी जी

बहुत हद तक इहो संभव बा की चाचा और भतीजा एके साथे उघारे घुमे लोग और इहो संभव बा की राउर बेटा रउवा के स्कूल में छोड़े जा या रउवा बियाह में सोहबलिया बनके जाउ। एयिजा रिश्ता में एतना विविधता और पेचीदगी बा की शहर के लोग इ सब देखके पगला जाई। वोइजा त बेटा भी बाबूजी के तुम कहिके बोलावेला और बेटी भी। देहात के संस्कृति से भला ओ लोग के का तुलना. खैर बात राधाकिशुन बो भौजी के होत रहल ह।

“भौजी कहा बाड़ी रे किशनवा ?” हम शाम के सुबशवा के बेटा से पूछनी।

“चाचाजी, अम्माजी नैहर गईल बानी” किशनवा के जगह ओकर माई जबाब देहली।

“पर उ त नैहर ना जात रहली ह ?” हम सोचत कहनी।

“अब पहिले वाला बात नइखे। मामीजी के मरला के बाद उहा के हर महिना नैहर जातानी। दू चार दिन में आ जाएब”

हम ओकरा जबाब से संतुष्ट हो गईनी और अन्दर घर में आ गईनी तैयार होखे खातिर। अभी हमके नेवता में पास के गाव में जाए के रहे। वोइजा बाबूजी के परम मित्र किहा अष्टजाम के समापन रहे। बाबूजी सुबह से कई बार रिमाइंडर देले रहनी. बाबूजी पहिले से ही तैयार बैठल रहनी।

काहो राजू कहा खातिर मोटरसाइकिल निकलता?” हम जैसे ही मोटरसाइकिल दुवार पे उतरनी, लालू भाई पूछले। उहो बनठन के कही साइकिल से जात रहले।
“दीनानाथ मास्टर किहा.” हम कहनी।

बाबूजी आँख तरेरनी की इनका के बतवला के का जरूरत रहल ह।

“हमहु त वोहिजा जातानी. चल ठीके भईल ह की हम पूछ लेनी ह” लालू भाई खुश होके कहले “ रूक हम आपन साइकिल ध के आवतानी। हमहु तहरा साथे ही चलेब.”
“पर तीन जाना अयिपर कैसे जईहे?” बाबूजी खिसियात कहनी।

“का चाचा का बात करतार” लालू भाई बाबूजी के गुस्सा के अनदेखा करत कहले “ भिरगुवा अपना भिक्की पर चार आदमी के बैठा के टान लेता, फिर इ बुलेट पर तीन आदमी ना जा पयिहे”

लालू भाई के तर्क दमदार रहे। अगर बाबूजी उनका बात के कटती त फिर भिरगुवा के भिक्की के सामने उहा के बुलेट के शिकायत हो जाईत। बाबूजी आपन मौन स्वीकृति दे देहनी और लालू भाई साइकिल रखे चल गईले।

हम त एकरा से परेशान हो गईल बानी.” बाबूजी क्रोध से ही कहनी “सबेरे शाम बस हमरे घर के तरफ एकर नजर रहता। कभी मुफ्त के चाय पिए खातिर, त कबो मोटरसाइकिल पर बैठे खातिर। तहरा एके बतवाला के का जरूरत रहल ह.”

जबाब में हम कुछ कहती एकरा पहिलेहि लालू भाई आ गईले। दीनानाथ जी किहा पहुचे में करीब बीस मिनट लागल। बाबूजी के देखते मास्टर साहब अकवारी में भर लेहनी। दुनु मित्र लोग बहुत दिन बाद मिलल रहे लोग। मास्टर साहब देर से अयिला खातिर उलाहना देहनी और फिर हमनी के नाश्ता खातिर बईठ गईनी जा।
“आगे के का प्लान बा?” लालू भाई पूछले।

“प्लान का बा ? खाना खाए के बा और चल देबे के बा.” हम जबाब देहनी।
“खाना खाके ही काहे चल देब.” पास में ही बैठल एगो पहचान वाला कहले “ शिवचर्चा के भी आयोजन बा। उ देख के जाई.”
“शिवचर्चा ?” हम आश्चर्य से कहनी “इ का ह ?”
“रउवा नईखी जानत?” उ हमरा अल्प ज्ञान पे लगभग हसी उडावत कहले।
“इनका का मालूम होई.” लालू भाई कहले “ गाव छोडले इनका दस साल से ज्यादा हो गईल। शिव चर्चा त एकरा बाद से ही शुरू भईल बा.”
“अयिमे भगवान शिव और माता पार्वती के तमाम किस्सा के गा गा के बतावल जाला.” एगो दुसर आदमी कहले।
“कहा के पार्टी आवता जी ?” लालू भाई बेसब्री से पूछले.
“शिवदेनी के पार्टी ह.”
“इ त बहुत नामी पार्टी बा.” लालू भाई चहकत कहले “ एयिमे त आपन गाव के राधाकिशुन भाई बो भी बाड़ी.”
“राधाकिशुन भाई बो ?’ हम चौक के कहनी “उ त नैहर गईल बाड़ी न?”
“इ तहके के बतावल ह?” लालू भाई पूछले।
“किशनवा के माई.”
“उ दुष्ट कहबो का करी। सब त वोही के वजह से भईल बा। बेचारी के घर छोड़े पे मजबूर क देहलस। अब सबसे इहे झूठ बोल्तिया.”
हमरा त इ सुनके बड़ा झटका लागल। राधाकिशुन भाई बो के भी घर से केहू निकले पे मजबूर क सकेला। वोइसन बहादुर औरत त हम अपना जिंदगी में ना देखले रहनी। मन उचट गईल और बस मन में एकही इच्छा रह गईल राधाकिशुन भाई बो से मिले के। दिमाग फिर से पुरनका समय में वापस लौट गईल।

राधाकिशुन भाई बो, जब सुबशवा पाच साल के रहे तभिये विधवा हो गईली। राधाकिशुन भाई के लीवर ज्यादा दारू पियला से फेल हो गईल और ओकरा बाद उनके गाव से निकाले के परयास चालू हो गईल। ए सब के सूत्रधार रहले राजबली, राधाकिशुन के पितियावुत भाई। राधाकिशुन एकलौता रहले और दू बीघा जमीन भी रहे उनका लगे। राधाकिशुन भाई बो के चल गईला पर वो जमीन के स्वाभाविक उत्तराधिकारी राजबली ही रहले। राधाकिशुन भाई बो के हटावे के सबसे बढ़िया तरीका उनकर दुसर वियाह करवावल ही रहे। राजबली के खुद के शादी ना भईल रहित त उ खुदे शादी क लेते। दूसरा शादी खातिर उ राधाकिशुन भाई बो के नैहर के लोग के भी तैयार क लेहले।

“गाव के लोगन के राय बा की राधाकिशुन भाई बो के दुसर बियाह हो जा। भगवान इनका साथे घोर अन्याय कईले बाड़े। पर एही उम्र में विधवा होके बैठ गईल भी त उचित नईखे.” भरल पंचायत में जमादार बाबा कहले।

“गाव के लोग के इ राय बा की राजबली और उनका शुभचिंतक लोग के?” राधाकिशुन भाई बो कहली “ हमरा साथे जवन भईल बा अयिमे भगवान के कवन हाथ बा, इ सब त हमरा आदमी के कुरहन के फल बा.”

हम त तोरा भलाई खातिर कहत रहनी ह.’ राजबली गरमात कहले।

“तू हमार चिंता छोड़ के आपन सोच। पाच गो औलाद बा काल्ह तहरा साथे का होई ओइपर ध्यान द.”
“एकर मतलब ते दुसर शादी ना करबे.” पंडीजी खिसिया के पूछनी।
“ना.” राधाकिशुन भाई बो दृढ़ता से कहली “जवन हमरा करम में लिखल रहल ह, उ भईल ह। दुसर वियाह से का करम के लिखल मीट जाई। अगर कही दुसरका मर्द भी मर जा त फिर हम तीसरका वियाह करेब?”

राधाकिशुन भाई बो जबाब से सबके बोलती बंद हो गईल।
“बात त एकदम सही बा.” बाबूजी कहनी “शादी से ही दुःख दूर हो जाई इ सोचल गलत बा.”
“जवन भईल ह वोइमे खाली करम के ही दोष नईखे बल्कि इ धरम के पालन ना कईला के भी परिणाम ह.”
पंडीजी कहले। उनकर साफ़ साफ़ इशारा राधाकिशुन भाई बो के पूजा पाठ ना कईला के तरफ रहे। पूरा गाव में एगो उहे रहली जे पूजा पाठ ना करस।
“पंडी जी एकदम सही कहतानी। धरम के ना मानले, आदमी के नाश होला.” जुवाला भाई कहले।

“पर पंडीजी के सयान नाती काहे मर गईले। इहा के त रोज पूजा पाठ करेनी। साल के छः महिना तीर्थ धाम भी जानी.” राधाकिशुन भाई बो कहली।
सबके साप सूंघ गईल। एगो अनपढ़ औरत से अइसन दमदार जबाब के केहू के उम्मीद ना रहे।

बात एकदम स्पष्ट रहे। राजबली और उनकर हितैषी लोग राधाकिशुन भाई बो के गाव से निकाले पर तुलल रहे लोग त, दुसरो तरफ राधाकिशुन भाई बो ना निकले पर अडल रहली। बाबूजी और हमरा टोला के कुछ लोग राधाकिशुन भाई बो के साथै रहे। अब सारा निगाह , राधाकिशुन भाई के माई पर रहे। बेटा के मौत के बाद घर के मालिक उहे रहली और उ अपना पतोह के ही साथ देहली। राधाकिशुन भाई बो गाव छोड़ के ना गईली।

सारा गाव के लोग जहा धर्म करम में लागल रहे , उ अपना कर्म के ही धर्म बनवली। पूजा पाठ त कबो ना कईली पर खेत में कुदारी चलवली, भईस पलली पर केहु किहा मजूरी ना कईली। सुबाशवा के बढ़िया से पालन पोषण कईली और सासु के जिम्मेदारी से सेवा। इ अलग बात बा की सुबाशवा के पढ़े में मन ना लागल और उ पहिले माइ से चोरा के गिरवा माटी के मजदूर बनल और फिर बाद में राजमिस्त्री। पढ़ लिखके कुछ बने के अपना माई के सपना उ भले ही पूरा ना कईलस पर बाप के दशा और माई के कड़ाई से उ नशा ना करे के सिखलस। पूरा गाव में ओकरा जइसन आज्ञाकारी बेटा दूसर ना रहे और सब माई लोग ओकर उदहारण दे

ओइसन बेटा के रहते ओकरा माई के घर छोड़ जाए के पड़ल, इ सुनके त विश्वास ही ना होत रहे। शिवचर्चा करे वाला मंडली जेने बइठल रहे ओने बढ़ गईनी। हमके दूर से देख के, राधाकिशुन भाई बो हमरा तरफ बढ़ अइली।
“भउजी तू एईजा ?”
“सब करम के लेख बा ?” राधाकिशुन भाई बो कहली। उनकर आँख गिल हो गईल रहे।
“पर तू त सारा जिंदगी धरम के विरोध कईलू , कभी पूजा पाठ ना कईलू और अंत में ओहि के शरण में आवे के पड़ल।
“बाबू हम धरम के विरोध कबो ना कईनी। हम हमेशा अपना फायदा खातिर धर्म के इस्तेमाल के खिलाफ रहनी। आज तक हम जवन बात केहु के ना बतवनी, आज तहके बतावतानी। शादी से पहले हमहू भगवान के खूब पूजा पाठ करी, शंकर भगवान के रोज़ जल चढ़ाई, काहे से की सब लोग कहे की अईसे की निमन आदमी मिलेला। पर सुबाश के बाबूजी कईसन रहले, इ तुहु जान तार। फिर हमके समझ में आयिल की जवन करम के लेख बा ओके केहु नईखे मिटा सकत। फिर अपना स्वार्थ खातिर काहे भगवान के पूजी। सब केहु बस कवनो ना कवनो अपनी इच्छा पूर्ति खातिर धर्म के आडम्बर करता। बस ए आडम्बर से हम अपना के दूर रखनी। भगवान हमेशा से हमरा मन में रहले। पर जिंदगी खातिर हम पूजा पाठ से ज्यादा अपना पौरुष पे भरोसा कईनी। आज भी हम करतानी। हम अपना आप के भगवान के क्रिपा पर नइखी छोड़ले। बुढ़ापा शरीर कमजोर हो गईल बा। अब ज्यादा मेहनत नईखे सकत ऐ वजह से भगवान के गान क के आपन जीविका चलावतानी। ”
“पर सुबाशवा जइसन आज्ञाकारी बेटा , माई के कईसे घर से जाए देहलस ?”
“बाबू एगो बहुत पुरान कहावत ह , बेटा शादी होते पराया हो जाला और बेटी दूर गईला के बाद भी जिंदगी भर ना पराया होले। अइमे कवनो आश्चर्य नईखे। केहु जल्दी छोडेला केहु बाद में , हमार बेटा तनी देर से पराया भईल ह। ” इ कहत कहत , उनका झर झर लोर बहे लागल।

बात त उनकर एकदम सच रहे। आस पास नजर दौड़वानी त एकाध लोग ही नजर आयिल जे अपना माई बाबूजी के साथै रहे या साथे रहला के बाद भी सम्मान और प्यार देले रहे।
केकरा से बतियावतारु ? शिवचर्चा के बेरा हो गईल बा। ” पीछे से केहु कहल
हम पीछे देखनी त विश्वास ही ना भईल। इ राजबली रहले।
“अरे भाई तुहु ?” हमरा मुह से निकलल।
“हां बाबू, हमू अब शिवचर्चा ही करेनी। ”
“पर तू त सारा जिंदगी लूट खसूट क के एतना संपत्ति बनवल और आज ओहिके उपभोग नइख करत ?”
“उ जेकरा खातिर बनवनी, उ करता। अब ओ लोग के इच्छा नईखे की हम साथे रही त शिवचर्चा ही सही। आखिर ओकनी से उ कुल छीन केके भी केकरा के देब। आदमी चाहे केतनो जतन करे पर औलाद के मोह भी त ना जाई। ”

बात त उनकर एकदम सच रहे पर का अइसन औलाद के औलाद कहल जा सकेला जे बुढ़ौती में अपना माई बाप के शिवचर्चा करे पे मजबूर क दे। ओइजा से आईला के बाद इहे सवाल हमरा मन रहे।

रउवा खातिर 
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