वेटिंग टिकट | भोजपुरी कहानी | संजीव कुमार सिंह

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का फायदा बा मेहरारू के दिल्ली ले गईला के, कि ट्रेन में उ खड़ा होके, आ केहु अउर के सीट के किनारे तनी मनी जगह में एडजस्ट कइके जाये के पड़ो, एतना कष्ट में ओकरा दिल्ली जाये के पड़ो….।

आम तौर पर दिल्ली कमायेवाला अपना ईहा के लोग के इहे हाल बा। आव ना देखी लो ताव, बस दिल्ली जाये के भुत सवार बा, वेटिंग टिकट ले ले के, पुरा रिजर्वेशन बोगी के जनरल बोगी बना दिही लोगss। बिहार से खुलेवाला लगभग सब ट्रेन के इहे हाल बा। वेटिंग टिकट से यात्रा करी लोs, अपने कष्ट में जाई लोs, लेकिन रेलवे के इनकम जरूर बढ़ाई लोss, देशहित सरवोपरि जे वावे…।

वेटिंग टिकट | भोजपुरी कहानी | संजीव कुमार सिंह
वेटिंग टिकट | भोजपुरी कहानी | संजीव कुमार सिंह

पुरबिया एक्सप्रेस में रंजन हाजीपुर से सिवान खातिर आवत रहलन। एगो नव जोड़ा भी जात बालो, नया नया बियाह भईल होई, दुनु जना के हथवा में एंड्राइड मोबाईल, लेकिन ट्रैन में सीट कन्फर्म नाहि बा, वेटिंग टिकट लेके दिल्ली जा रहल बालोs। उ लोग दुनु जाना स्लीपर बोगी में साइड अपर में आराम से बईठल रहवे लोग, लेकिन छपरा जंक्शन पर दुगो नौजवान चढ़ल लोग, ओहिमे एक जाना के सीट रहे, और दूसर जाना उनकरे संगे वेटिंग टिकट लेके एडजस्ट करते, नवजोड़ा के निर्मोही खानी उतार दिहल लोSS।

अब उ दोनो नवविवाहिता मरद और मेहरारू नीचे उतर के खड़ा बालो। लोग के चोर नजर से केतना बचसss, आपन चेहरा ढक के, चोर नजर से बचे के परयास करत रहली..। केहु भी आवे त धक्का मार के चल जाव। चाय बेचे वाला, कुरकुरे बेचेवाला सन के त लरी लागल रहे। सबके धक्का, मुक्की से बचे के परयास में परेशान रहली, कबो साड़ी के पल्लु सरियावत, नजर आवसss।
रंजन बगल के सीट पर बईठल रहलन।
कष्ट देख के उ लड़कवा से पुछsलन….
“भाई सीट तहार कन्फर्म नईखे का”
“ना, कन्फर्म ना हो पाईल हवे”
“त ई बतावS कि, जब कन्फर्म ना भईल हs, त काहे अपना मेंहरारु के हेतना भीड़ और कष्ट में ले जाते बाड़s।”
तनी उ शर्मा गईलन।

रंजन उनकरा के अपना पास में बइठईलन।

उ आपन सब बात धीरे धीरे कहे लगलन, की इहे जिद कइके कहत बाड़ी की हम घरे ना रहब, घरे रहब त हमरा सास ससुर के सेवा करे के पड़ी, हम नया दुल्हिन बानी, रउआ बिना अकेले ना रह सकबs, हम दिल्ली अपने के ही संगे रहब, एहीसे इनकर जिद्द के चलते ले जात बानी, ना त हम नु बिना कन्फर्म सीट भइले, ना ले जईती…।

अब बात तनी खुल के होखे लागल, संयोग से रंजन जवन साइड लोअर सीट पर बईठ के जात रहलनs, उ सीट वाला उनकर फेसबुक फ्रेंड निकल गईलन।

रंजन कहलन, की भाई, हई दुनु जाना में से ई जनानी के रउआ तनी एगो किनारे बईठ के जाये देहब, बेचारा लोग, बड़ी कष्ट में दिल्ली जा रहल बावे लोग। उ फेसबुक फ्रेंड, रंजन के बात मान गईलन, कहलन की ठीक बा बइठ जईहन… रउआ सिवान उतरब, ओकरा बाद ई लोग के हम बईठा देहब, रंजन के बड़ा अच्छा लागल, की सोशल मीडिया के दोस्त से भेंट भ गईल, अउर बात भी मान लिहलन।

सचमुच आजो के जमाना में परोपकारी लोग बा अउर मित्रता के मान रखे वाला लोग बा। रंजन अपना के बड़ा खुशनसीब मनलन।
अब उ नवविवाहित जोड़ा से बात होखे लागल।
हाथ मे एंड्राइड मोबाइल रहे, त फैशन लउकत रहे।
रंजन पुछलन…
“भाई, दिल्ली में कवन काम होखेला।”
“एगो दुकान में रहेनी, 15000 रुपया ले, कमा लेवे नी, यार लोगन के संगे एगो रुम किराया पर ले ले बानी।”
“पन्द्रह हजार में से कुछ बच जाला कि ना बचेला”, रंजन पुछलन।
“ना कुछो ना बचेला”
” कुछो ना बचेला अउर मेहरारु ले जात बाड़SS..।”
“अब मन बा त ले जात बानी, यार दोस्त लोग, कहले बा कि बियाह भ गईल त मेहरारु के संगे रखे के, घर मे ना छोड़े के, ना त लोग उल्टा पुल्टा कहे लागी।”
“अच्छा, ई बात बा, माने आमदनी अठन्नी अउर खरच रुपईया होई, परिवार ले जात बाड़s त खरचा त बढ़ जाई, केहु लेखान तहार पचीस से तीस हजार महीना के खरचा हो जाई, रुम तहरा अकेले लेवे के पड़ी, सब समान खरीदिये के खाये के पड़ी”, रंजन कहलन।
अब त उ मुड़ी खजुआवे लगलन।
” ई त हम सोचबे नईखी कईले, हम त ओहिजन जा के फस जाईब, केतना अच्छा ई घरे रहली हवे, हम उ यारन के फेर में पड़ के त सब गड़बड़ करे जात बानी, हम माई बाबुजी से झगड़ा कर के मेहरारु के ले जात बानी, बाबुजी कहत रहल हउअन की पहिले दिल्ली में व्यवस्था कर ले बढ़िया से रहे के अउर कउनो बढ़िया काम सिख ले, तबे नु तोर सेलरी 30 हजार हो जाई, तब ते आपन कनियवा के ले जईहे, हमरा त दिमागे काम ना कईल सs।”

“तब अब दिमाग काम करत बानु, घरे केतना जमीन जायजाद बा” रंजन पुछलन।

“घरे 12 बिगहा खेत बा, जवना में से आधा में उंख रोपाला, बाकि में धान, गेहूं, मकई, आलु ई सब रोपाला, बाकिर अब बाबुजी बुढ़ हो गईल बाड़न, से अब खेती ना करेलन, माई कुछ कुछ साग सब्जी रोप देवे लेs”

“भाई हेतना रुपया घरे छोड़ के, आ बाहरा उधार के जिनगी जीये जा रहल बाड़S” रंजन कहलन।

“उ केंगान, तनी हमरा के बताई, हमार दिमाग खोल दी, हम रउआ से निहोरा कर रहल बानी, हमरा के राह दिखाई”
” देखS भाई, ईंख नकदी फसल हवे, बढ़िया से 6 बीघा में लगा देहबs, त उ सलाना दु से तीन लाख आमदनी दे दिही, और बाकी 6 बिगहा में धान, गेंहू,मकई अउर साग सब्जी लगा देहबs त उ 1 से 2 लाख सालाना दे दिही, अउर आराम से घरे रहबss, अपना बाबुजी माई के सेवा भी कर लेहबss, उ लोग के आशीर्वाद भी तहरा दुनु के मिली, गांव जवार में इज्जत भी बनल रही, गांव से शहर कवनो बढ़िया ना होखेला, शहर में खाली प्रदूषण बा, लोग खाली अपना बारे में सोचेला, बीमार हो जइब त केहु ना पूछी, शहर में केहु के लगे टाइम ना होखेला, एक दिन अइसन आई कि लोग शहर से गांव की ओर भागीलोSS, काहे से कि गांव में शांति बा, लोग एक दूसरा के दिल से मदद करेला, सरकार के कई गो योजना बा , जवना के लाभ तहरा मिली।”

“रउआ हमनी के आंख खोल दिहनी, अब हमनी दिल्ली ना जाईब”

अब उनकर लुगाई भी कहे लगली की हम दिल्ली ना जाईब, हम घरे रहबss, अपना सास ससुर के सेवा भी करब।

रंजन कहलन की भाई सुनss, अभी नया नया शादी कईले बाड़ss, अभी ले जा, घुम आवss, अभी इंकर दिल मत तोड़ss, इनकरा दिल्ली घुमा त इनकर दिल मत तोड़ss, तहरा लोगन के बईठ के जाये के इंतजाम हो गईल बा, आराम से बईठ के जा, लेकिन याद रखिहss, वेटिंग टिकट पर मेहरारु के आगे से मत ले जईहss…।

तले, सिवान स्टेशन आ गईल, अब रंजन,फेसबुक यार से हाथ मिला के विदा भईलन, अउर उ दुनु जाना भी परनाम करके सीट पर बईठ गईल लोss, रंजन के जाते देखत रह गईल लोग….।

रंजन भी मन ही मन ई सोचत गेट से बाहर निकल गईलन की एगो बिखरल परिवार एक हो जाई, एगो बुढ़ माई बाप के बेटा बहुरिया मिल जाई, खेत के उत्तम किसान मिल जाई, जवन देश के कृषि में योगदान बढ़ाई।

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