विवेक सिंह जी के लिखल भोजपुरी लघुकथा ललका रंग

विवेक सिंह जी
विवेक सिंह जी

फागुन के महीना मे चरो ओर उमंग के लहर दऊरे ला, हर कोई मस्ती के रंग मे रंगल नजर आवेला !

चाहे इंसान होखे य़ा जानवर य़ा फिर काहे न प्रक्रति के शोंदर्य ? सब कुछ मे फागुन आपन रंग के फुहार छोर देवे ला !!!

मन मारे राह के एकटक ताकत शुभद्रा अपना चऊखट के ओट तर बईठल बाड़ी. फगुनहट के हवा कबो-कबो देह मे अईसन झौका मारता, ज़ईसे ऊफनत आग मे कोई ओर पुवाल डाल के लहोक के तेज कर देवे !!

शुभद्रा के अन्दर आज अइसने लहोक लहकता, जोन की अपना खुद के बिनाश के कारन होला ! मन के स्थीरता मे पता न आज कईसन अस्थीरता ‘चंचलता’ आ गइल बा. की शुभद्रा के अाखन मे ख़ुशी के छोर आशु उमड आईल बा ?

ओकर आखी के सामने बितल पहलू उभर आईल और ओकर चेहरा पे हलका सा मुस्कान के रेखा खिच गईल ! ई ख़ुशी सालभर पहीले के ह जब ओकर हाथ मे मेहदी लागल और ओकरा मांग मे अमर के नाम के सेन्दुर भरल रहे. ओर अपना बाबू से बिदा होके ससुराल आईल रहे ? और कुछ अईसने दिन-महीना रहे फागुन के जोन बिहाअ बाद पहीलका होरी अपना पती के साथ खेलले रहे !!

ऐगो अलग ही मजा ऐगो अलग ही उमंग, ई सब ऊहे बता सकता ज़े बिहाऐ के बाद अपना पती अपना जीवन सखा के साथ पहीला होरी खेलले होई ! अमर थल सेना मे सिपाही रहे, जोन अपना मातृभुमी से बहुत प्यार करत रहले ! अमर कबो-कबो शुभद्रा से कहें कि अगर हम अपना मातृभुमी के सेवा करत-करत विरगती के प्रापत होजाई त तु दुखी न होईह, रोईह जन , न त हमरा आत्मा के बहुत दुख होई!

किसमत के दस्तुर और खेल अइसन भ्ईल की जोना चौकसी पर अमर रहे. ओही पर आतंकवादी हमला कर देलसन और अमर आतंकवादीयन से लड़ते-लड़ते देश खातीर अमर हो गईल? आज पूरा एक साल हो गईल ई घटना के और फागुन फिर होरी के रंग बिखेरत आ पहुचल शुभद्रा के पास! लेकिन शुभद्रा के सजल-सजावल ई रंग समये के पसंद न रहे. और ओकर रंग के फिका कर देलस !!

शुभद्रा चऊखट के ओट मे बईठल मद-मद मुस्कुरात बिया ओर ओकर अखिय़ा मे अलग ही चमक बा . और ओकर अपना मन के उदगोश मे ऊहे सुंदर दृस्य लउकता की अमर हाथ मे ललका रंग लेके हमरा के लगावे आवतारे ???

रउवा खातिर:

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