असली गुरु | भोजपुरी लघुकथा | धनंजय तिवारी

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परनाम ! स्वागत बा राउर जोगीरा डॉट कॉम प, आयीं पढ़ल जाव गुरु पूर्णिमा के अवसर पर धनंजय तिवारी जी के लिखल भोजपुरी लघुकथा असली गुरु, रउवा सब से निहोरा बा कि पढ़ला के बाद आपन राय जरूर दीं, अगर रउवा धनंजय तिवारी जी के लिखल रचना अच्छा लागल त शेयर आ लाइक जरूर करी।

महशूर उद्योगपति अनिल कुमार के मिल के अहाता में बड़का जलसा के आयोजन भईल रहे। गुर पूर्णिमा के अवसर पर उ एकर आयोजन कईंले रहले अउरी एकर प्रयोजन ई रहे कि उ ऐ पावन दिन पर अपना जिनगी के सबसे बढ़िया गुरु के सम्मानित करे वाला रहले। अनिल के उमिर ज्यादा न रहे अउरी बड़ा तेजी से उ तरक्की के सीढी चढ़ल रहले। पढ़ाई पूरा कइला के 10 साल के भीतरे उ देश के अग्रणी उद्योगपति में शामिल हो गयीं ले।

ऐगो अत्यंत निर्धन परिवार के आदमी अतना कम समय मे अतना तरक्की के लेउ त निसंदेह ओकरा सफलता के पीछे ओकरा साथे साथे कुछ और लोग के हाथ जरूर होइ अउरी ई बात भले दूसर केहु माने भा न माने लेकिन अनिल जरूर मानस अउरी अपना सफलता के श्रेय अपना गुरु लोग के देस।

नियत समय पर कार्यक्रम शुरू हो गयील। अनिल के पढ़ावे वाला लगभग सब गुरु लोग मौजूद रहे अउरी सबके मन मे कौतूहलो रहे अउरी उम्मीदों कि सर्वश्रेठ गुरु के सम्मान त हमरे मिली।

प्राइमरी के गुरु ई सोच के ख़ुश रहले कि नींव त हमरे नु तैयार कईल ह। त हमहि एकर असली हकदार बानि। ओने उ कोचिंग इंस्टीटूट के संचालक अउरी प्रोफेसर साहब के इत्मीनान रहे कि हमरा अलावा केहु होईये नयीखें सकत। हमरे नु कोचिंग से उ पढ़ के इंजीनियर बनले त आजु अतना आगे बढ़ गयीले। इंजीनियरिंग कॉलेज के प्रिंसिपलो के इहे विचार रहे अउरी ओ प्रबंधन स्कूल के प्रिंसिपल के भी जहां से अनिल MBA कईंले रहले। साथे साथ सबके इहो उम्मीद रहे कि आजु अपना कॉलेज ला बड़का डोनेशन लेके जाएब जा।

सब केहु से आकुलता से अपना नाम के घोषणा के इंतजार करे लागल। लेकिन नाम के घोषणा में बिलंब होत रहे। बार बार अनिल के नजर गेट पर चल जाउ। उनका केहु के प्रतिक्षा रहे।

आखिर उन कर प्रतिक्षा पूरा भईल अउरी उनकर इंटर के विज्ञान के अध्यापक मुरली जी फाटल कुर्ता धोती अउरी कंधा पर झोला लेहले अहाता में प्रवेश कईनी।

अनिल मंच से लगभग दौड़त गईले अउरी मुरली जी के पैर छू के ऊपर लियईले।

सब केहु अचरज से देखे लागल।

अनिल पोडियम पर आके खड़ा हो गयींले अउरी सबके निगाह उन पर टिक गयील।

उ बोलल चालू कईंले- एईजा आजु उ हर गुरु मौजूद बा जेकरा से हम कबो न कबो शिक्षा ग्रहण कईनी लेकिन अगर हम बात करि असली गुरु के त एईमे से बस एके आदमी उ कहलाये के हकदार बा।

बाकी सब केहु गुरू भईला के बादो अपना शिष्य से व्यापार के रिश्ता राखल।

प्राइमरी के मास्टर साहब एक बार समय से फीस न देहला के वजह से हमके 2 घण्टा धूप में खड़ा रखनी त इंजीनियरिंग अउरी प्रबंधन स्कूल में जले हम आपन फीस न जमा कईनी पढ़े के अनुमति न रहे।

इंटर पास कईंले के बाद जब हम इंजीनियरिंग के नामी कोचिंग में दाखिला लेबे गईनी त 2 हज़ार रुपया कम भईला के कारण हमके दाखिला न मिलल।

हम निराश होके गांवे लौट अयिनी अउरी जब ई बात हमरा ओ गुरू के पता चलल जे छठवी से बारहवी तक हमके इंजीनियर बनावे के सपना हमरा से कही ज्यादा देखले रहे त उ चुपे आपन जमीन बांहे रख के जाके हमार दाखिला करा दिहल अउरी एके राज राखल। हमके बता देहनि कि हम फीस में छूट दियवा दिहनि ह।

अगर हम ओ कोचिंग में न गयील रहती त शायद आजु ऐ मुकाम पर ना पहुचल रहिती। त रऊवा सभ बताई असली गुरु कहाये के हकदार के बा- उ जे गुरु भईला के बादो अपना शिष्य से व्यापार के संबंध राखल भा उ जे ऐगो होनहार अउरी गरीब छात्र के भविष्य खराब न होखे, ओकरा ला आपन जमीन बंधक राख दिहल।
टेंट में बईठल भीड़ से एक मत में आवाज आयिल- जे खेत बंधक राख दिहल।
अनिल पोडियम से हट के मंच पर बईठल मुरली जी के ओरी बढ़ गयीले अउरी उहाँ के खड़ा करा के कहले – हमार असली गुरु इहाँ के हयीं।

सबके ताली के गडग़ड़ाहट से पूरा अहाता गूंज उठल अउरी बाकी के गुरु जी लोग के चेहरा उतर गयील।
“गुरु जी, हयीं रऊवा जमीन के कागज बा अउरी रऊवा संचालन में हम ऐईपर ऐगो स्कूल खोले चाहतानी जईमे गरीब छात्र कुल पढ़के आगे बढ़ सन। हमके त रऊवा जईसन गुरु मिल गयील लेकिन एइसन लाखो छात्र बाड़ सन जवनी के असली गुरु के आवश्यकता बा नाकि शिक्षा के व्यापारी के। अपना शिष्य के तरफ से ई गुरु दक्षिणा स्वीकार करीं।
जबाब में मुरली जी कुछ कहले त ना लेकिन खुशी से उनके आंखी लोरा गयील रहे।

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