दिलीप पैनाली जी के लिखल भोजपुरी लघुकथा गरीब के आह

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जब तक रउआ पूण्य के पुरी ना करार,
सव अवगुण माफ बा कर लीहीं हजार।

रोअत रोअत बहादुर के हाल बेहाल रहे। होखो काहे ना आठ महिना हो गइल रहे वेतन मिलला। वेतन के बात पूछला पर प्रधानाध्यापक एके गो बात कहस “आरे बेहुदा जाले स्कूल सर्टिफिकेट ना देबे ताले वेतन कइसे मिली।

“सर अपना घरे ठीक से खोजीं, सर्टिफिकेट रउए लगे होई।काहेकि आठ साल पहिलहूं ना मिलत रहे त रउआ के दू हजार रोपेया खोजेला दीहले रहीं। आ ओह घड़ी रउआ कहले रहीं जे बहादुर तोर सर्टिफिकेट हमरा लगे सुरक्षित बा जब दरकार होई मिल जाई।”कर जोड़ले बहादुर कहलें।

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अतना सुनते रज्जु नाथ माटसाब पायजामा से बाहर हो गइनी। आ कहे लगनी ” जो अब तोर काम हमरा से ना होई, जेकरा से मन होखे ओकरा से करवा ले।बेमतलब हमरे पर आरोप लगावेतारे, हमरा लगे रहीत त दे ना देतीं।

जइसे तइसे ब—-हा—दु—र लिखे वाला आदमी के पहुँच अतना त रहे ना जे आफिस से संपर्क करके आपन काम करवा लेवो। ओहू में तब जब अरंगा लगवावे में रज्जु नाथ आ भज्जु नाथ के हाथ होखे। भज्जु जे रज्जु के बड़ भाई रहस। उनकर दिन आफिस का चमचागिरी में बीते।

सुरा के शौकीन भज्जु का जिम्मे बस एके गो काम रहे,चम्मचागिरी। जे उनका के पिए खाए के ना पूछे उनकर वेतन उप परिदर्शक कार्यालय बा ट्रेजरी में कवनो ना कवनो तिकड़म लगा रोकवा देस।आ ओकरा बाद पइसा अइंठस। शिक्षक लोग के बेवजह स्थानांतरण करवावे में आ झुठा आरोप लगवा कारण बताव नोटिस भेजवावे में सिद्ध हस्त भज्जु से गांवोवाला परेशाने रहस। कय बेर कुटलइलो का बाद उनकर लुफुत ना छूटे।

दूनु भाई का दुष्टई का पाश में बन्हाइल बहादुर के दशा पइसा बिना बहुत खराब हो गइल। आठ महिना हो गइल रहे वेतन मिलला। एकदिन उ रज्जु के गोर छान के रोए लगलें “सर हमार काम करवाईं ना त अब हमार बाल बच्चा भूखले मर जइहें सन, कवनो उपाय लगाईं।

“देख बहादुर काम त तोर होई, हम आफिस से बात कइले बानी बाकिर रोपेया लागी पनरे हजार।”
बाप रे! सर हतना रोपेया!!!!! हम कहाँ से ले आएम अतना।
“तब त सर्टिफिकेट ले आवऽ

अगर मैट्रिक का सर्टिफिकेट के बात रहित त निकलियो जाइत। बाकिर पाँचवा पास के सर्टिफिकेट, उहो सन ६२ के, आवो त आवो कहाँ से?

निरूपाय बहादुर कहलें “सर अगर रउआ से रोपेया के जोगाड़ हो जाता त रउए दे दीहीं। तनी मनी जवन सूद लागी हम दे देब।”
“तनी मनी ना पाँच रोपेया सैकड़ा के सूद लागी मंजूर होखे त कहऽ बात चलाईं” रज्जु कहलें। बहुत गुणा भाग कइला का बाद ओतनो सूद देवेला बहादुर तइयार हो गइलें।करस त करस का लाचार मजबूर आदमी।

दिलीप पैनाली जी
दिलीप पैनाली जी

अब त दोकानदारो बाकी देहल बंद कर देले रहे।खैर पनरे दिन जइसे तइसे बीतल। सोरहवा दिने बेतन आइल आ रजिस्टर में बहादुर सोरह हजार पर हस्ताक्षर कइलें। लेकिन भेंटल एको पइसा ना। काहेकि पनरे हजार आफिस में घूस, दु स चाह पिआई आ आठ स सूद में देहला का बाद बचबे ना कइल कुछुओ। डबडबात बहादुर कहलें ईश्वर के जवन मरजी, अब अगिला बेतन का आस में समय कटावहीं के पड़ी।

गरीब के तड़पावल आ ओकर पइसा हड़पल रज्जु आ भज्जु का बहुते महंग पड़ल। भज्जु का पाप के फल उनका परिवार का अवकाश ग्रहण का पहिलहीं से मिलल शुरू हो गइल रहे। एगो लइका उहो काबिल ना।लाख इलाज करवइला का बादो उनकर मेहरारूओ ना बचली।जवने समय में मेहरारू के बेसी जरूरत होला ओही समय में उ साथ छोड़ दीहली।अपना करनी पर भज्जु का पछतावा त होत रहे बाकिर समय बीतला का बाद कवनो उपायो त ना रहे।

अवकाश ग्रहण का छव महिना बादे भज्जुओ चल बसलें।अब बारी रहे रज्जु का करनी का फल के त इनको मिलबे कइल। गरीब के तड़पावल इनका लइका पर पड़ल आ उ जवानिए में चल बसल।कहाँ कहाँ ना इलाज करवइलें? लाखों खरच कइला का बादो बचा ना पवलें।बिधवा पतोह के देख रज्जु भीतरे भीतरी टूट गइल रहस।उनका अपना करनी पर बहुत पछतावा होत रहे। लेकिन समय हाथ से निकल गइल रहे। अवकाश पइला का दू साल बाद रज्जुओ चल बसलें। गलत तरीका से कमाइल पइसा दुनु भाई के सुख चैन खा गइल। सांच कहीं त बहादुर जस गरीब के आह दुनु भाई के तबाह कर दीहल।

दिलीप पैनाली

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