कवि ह्रदयानन्द विशाल जी के लिखल कविता फटक के लऽ फटक के दऽ

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बोलत नइखीं त बुझतारअ की
सबसे लमहर घाँक बा
ताहरा कवनो गरजे नइखे त
हामरा कवन ताक बा

काम निकल जाला तहिये से
गिरगिट नियन बदल जालअ
राम राम सुनला के बादो
मुह फेर के चल जालअ

प्रेम जाताईं के ताहरा से
कइ बार बनल मजाक बा
ताहरा कवनो गरजे नइखे त
हमरा कवन ताक बा

प्रेम के भार असहनीय होला
सहे खातिर छमता चाहीं
राम जी हमके प्रेमी बनवनी
अउरी हमके का चाहीं

बिना हरि किरपा के केहु के
मिलल ना एको छटाक बा
ताहरा कवनो गरजे नइखे त
हमरा कवन ताक बा

ह्रदयानंद विशाल ई भाँसा
सब केहु के बुझाइल ना
प्रेमी धरमराज ई झागरा
सबका से फरियाइल ना

शशीकान्त स्वारथ मे कटल
सुपनेखिया के नाक बा
ताहरा कवनो गरजे नइखे त
हामरा कवन ताक बा

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